• 25 Feb
    Oyindrila Basu

    दीपिका पदुकोने - मेहनत, लगन, कोशिश और दृढ़ संकल्प से इंसान आगे बढ़ता है


    Deepika Padukone

    एक चुटकी आत्मविश्वास, साथ में चम्मच भर कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प, उसमें अगर अपनों का साथ घुल जाये, तब जा कर बनती है, सफलता की सही रेसिपी।

    मेहनत, लगन, कोशिश और दृढ़ संकल्प से इंसान आगे बढ़ता है, और साथ में अगर माता पिता का साथ मिल जाए, तो सफलता को कोई नहीं रोक सकता। पर, जो काम हम कर रहे हैं, उसपरखुद को विश्वास होना ज़रूरी है।


    हाल ही में हमने देखा, अभिनेत्री दीपिका पदुकोने फिल्मफेयर के मंच पर श्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीतीं, और तभी उन्होंने सब के साथ अपने पिताजी की एक चिट्ठी पढ़ी, जिसमें उन्होनें बेटियों को कड़ी मेहनत, लग्न और दृढ़ता की सीख दी है।


    आज हम दीपिका की सफलता को सराहते हैं, लेकिन उनका सफर कम कठिन नहीं था। और इस लम्बे सफर में, उनके पिताजी, उनके लिए प्रेरणा रहे हैं।


    "पीछे मुड़के देखता हूँ, तो ये महसूस होता है, कि मेरी बचपन से खासियत थी, की किसी भी चीज़ को लेकर शिकायत ना करना। हफ्ते में जितने घंटे मिलते थे खेलने के लिए, मैं उसी के लिए शुक्रगुज़ार था। हर मौके का पुर्नउपयोग किया है मैंने, ज़िन्दगी को खुलके जिया है। छोटी छोटी चीज़ों पर अफ़सोस जताने से ज़िन्दगी छोटी पड़ जाती है। अपनी कड़ी मेहनत से जितना भी है, उसे और बड़ा बनाओ। अगर आप अपने काम से प्यार करते हैं, तो कोई और बात मायने नहीं रखती, न ही शोहरत और न ही टीवी पर खुद को देखने की चाह। " प्रकाश पदुकोने अपनी बेटियों को खत में लिखते हैं।


    दीपिका के दृढ़ निश्चय को देखते हुए हमें पता चलता है, की वे अपने पिताजी के बुद्धिजीवी कथन से काफी प्रभावित हैं।
    उन्होंने ज़िन्दगी में जो भी किया है, अच्छे से किया है। पहले वे बैडमिंटन खिलाडी थी, और उन्होंने कम उम्र से ही नेशनल गेम्स में भाग लिया है।
    पर फिर उन्हें अपने सपने को पूरा करना था, इसलिए वह मॉडलिंग की दुनिया में आयीं।
    क्लोज अप जेल का वह विज्ञापन याद है? वह साधारण सी लड़की आज कृष्ण-नारी की हकदार हैं।


    शुरुआत में, उन्होंने ने अपना करियर कन्नड़ फिल्मों से शुरू किया, वह उन्हें ज्यादा सफलता तो नहीं दे पायीं, पर उन्होंने हार नहीं मानी, उन्हें खुद पर भरोसा था, और ये साहस उन्हें अपने पिताजी से हासिल हुआ-


    "जब तुमने हमें बताया की तुम मॉडलिंग करना चाहती हो, तो हम काफी चिंतित थे, कि तुम इतनी छोटी हो, मुंबई जैसे शहर में कैसे अकेली रह पाओगी, और खास कर ऐसी इंडस्ट्री में, जिसके बारे में हम ज्यादा नहीं जानते थे। पर हमने सोच लिया, कि तुम्हे हम रोकेंगे तो वह गलत होगा। तुम्हे अपने सपनों को पाने कि कोशिश ज़रूर करनी चाहिए। अगर तुम सफल होती हो, तो हम गर्व करेंगे, पर अगर नहीं भी हुयी, तो ये अफ़सोस नहीं रहेगा कि तुमने कोशिश नहीं की।" दीपिका के पिताजी बताते हैं।


    इन शब्दों में, बेटी पर भरोसा, विश्वास और समर्थन झलकता है, जो दीपिका के लिए बहुत महत्व रखता है।

    हार से निडर होना, उन्होंने अपने पापा से सीखा है। क़ाबिलीयत एक दिन ज़रूर रंग लाती है।
    बॉलीवुड में अपना डेब्यू फिल्म "ओम शांति ओम", के बाद, दीपिका को पीछे मुड़ कर नहीं देखना पडा ।
    एक के बाद एक हिट फिल्में आती गयी, और उन में उनका अभिनय सराहा गया।


    2014 उनके लिए खास रहा है। एक तरफ उन्होंने आइफा अवार्ड्स में 'हीरोइन ऑफ़ द ईयर" का खिताब जीता, जो अहम भूमिका रखता है, क्योंकि वे पहेली अभिनेत्री थी जिन्होंने ये खिताब जीता।
    दूसरी तरफ, उसी साल वे गंभीर निराशा कि शिकार हुयी। उनके मानसिक संतुलंत ने उनका साथ नहीं दिया। सब कुछ था फिर भी इस मानसिक रोग से वे नहीं जूझ पा रही थी।
    पर हिम्मत ए बंदा तो मदद ए खुद।


    आत्मविश्वास के आग को जलाये रखा उन्होंने, और धीरे धीरे वे जिस प्रकार इस रोग से उबरी, वह प्रशंसा के काबिल है।


    इतनी शोहरत प्राप्त होने पर भी, दीपिका अपनी मिट्टी से दूर नहीं हैं। आज भी वह अपने दोस्तों से साधारण जगह पर मिलना पसंद करती है। इसकी सीख उन्हें घर से मिलती है।


    "जब तुम घर आती हो, तुम अपना खाना खुद परोसती हो, बर्तन खुद उठाती हो, और घर में मेहमान हों, तो ज़मीन पर सोती हो। ....तुम्हे अगर कभी लगे कि हम तुम्हारे साथ सेलिब्रिटी जैसा व्यवहार क्यों नहीं करते, तो याद रखो, की तुम पहले हमारी बेटी हो, और बाद में फिल्म स्टार ।" प्रकाश जी।


    हार उन्हें कभी हरा नहीं पायी। ज़िन्दगी की मुश्किल घड़ियों का डट कर सामना करते हुए वे आगे बढ़ती चली गयीं। अपने जज़्बे को अपना हौसला बना लिया। क्योंकि उन्हें याद था, "हमें ज़िन्दगी में सब कुछ नहीं मिलता, जीत हमेशा हासिल नहीं होती"
    करियर की शुरुआत में जो मेहनत हम करते हैं, रिटायरमेंट के वक़्त तक भी उतनी ही मेहनत करना है, यह मान कर वे चलती हैं।


    ये माता-पिता और बच्चों के लिए एक सीख है, कि कैसे कोई एक अपना भी आपके साथ हो, आपको समझे, तो कितनी सहायता होती है। और अपनों का विश्वास ही हमें सफलता के शिखर तक पहुंचाता है।
    सकारात्मक विचार बनाये रखें। परिवार और अपनों का आदर करें, क्योंकि अंत में वही हमारे पास रह जाता है। अपने काम से प्यार करें, पर सबसे अहम बात, खुद पर भरोसा रखें। इन सब को सही मात्रा में मिलाएंगे, तो पकेगा सफलता का सही नुस्खा।

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  • 21 Feb
    Oyindrila Basu

    प्रीती शेनॉय-कुछ भी हो, 'द शो मस्ट गो ऑन'

    preeti shenoy

     

    "आज मैं जो भी हूँ मेरे पिताजी की वजह से हूँ। पर 7 सितम्बर 2006 को मुझे एक फ़ोन कॉल आया, कि वे गुज़र गयें हैं... मेरी दुनिया जैसे थम सी गयी... मैं मुस्कुरा नहीं पाती थी, किसी से कुछ बोल भी नहीं पाती थी, इस घटना ने मुझे निराशा में डुबा दिया था । अचानक मैं खुद को बहुत अकेला महसूस करने लगी। ...."प्रीती शेनॉय (TEDx)

     

    निराशा एक ऐसी स्थिति है, जहां इंसान सच का सामना नहीं कर पाता। वह सब से दूर भागता है, और अकेलेपन से थक कर उनकी ज़िन्दगी जैसे रुक सी जाती है। जीने की इच्छा मिट सी जाती है। और ऐसा अक्सर हो सकता है जब कोई अपना आपको छोड़ कर चला जाये। ऐसा हुआ है लेखिका और कलाकर, प्रीती शेनॉय के साथ। जब कोई करीबी गुज़र जाता है, तो उनका अंश जो आप में था, वह भी मर जाता है, और इस प्रकार आपकी आधी मृत्यु होती है, इसी कारण इंसान निराशा का शिकार होता है।

    पर जैसे राज कपूर जी ने कहा है, "ये दुनिया एक सर्कस है, और हम सब उसमें जोकर ..........और कुछ भी हो, 'द शो मस्ट गो ऑन'"

     

    इसी तत्त्व को मान कर चलने वाली महिला हैं प्रीती शेनॉय। अपनी निराशा से उबरने के लिए उन्होंने कला और साहित्य का सहारा लिया।

    Preeti Shenoy

    पिताजी के गुजरने के बाद उन्हें कोई चाहिए था, जो उनकी बात सुन सके, पर कोई दोस्त उनके साथ नहीं था, पति और बच्चों ने उनका साथ दिया, लेकिन वे कब तक उनके सामने रोती रहती! इससे वह भी निराश हो सकते थे, क्योंकि ऐसे जज़्बात काफी संक्रामक हो सकते हैं।

    इसलिए वे लिखने लगी। ब्लॉग पर अपनी कहानी, अपने जज़्बातों को शब्दों में बयान करने लगी। ये लेख उनके व्यक्तिगत जीवन पर आधारित है, और उनकी पहली किताब भी ।

    'लाइफ इस व्हाट यू मेक इट(Life is what you make it)', इस किताब में अंकिता के रूप में एक ऐसी लड़की कि कहानी है, जिसके पास सब कुछ होता है, पर ज़िन्दगी की कठोर परीक्षा को वह कैसे पार करती है यह सब इसमें बताया गया है ।

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    इस किताब में निराशा(Depression) और बाइपोलर डिसऑर्डर(Bipolar Disorder) जैसे मानसिक रोग के बारे में विस्तार में समझाया गया है।

    प्रीती की हर किताब में, मानसिक दर्द, पीड़ा का ज़िक्र अवश्य होता है, पर अंत, उन समस्याओं का सुन्दर समाधान लाती है, जिससे युवा पीढ़ी को काफी प्रोत्साहन मिलती है।

    उनकी पूरी ज़िन्दगी हम सब के लिए एक प्रेरणा है। एक साधारण लड़की कैसे अपने कोशिश से, खुद में छुपी प्रतिभा को महसूस करती है, और जीत हासिल करती है, यह हम प्रीती से सीखते हैं, । कलाकार और लेखिका होने के अलावा, प्रीती बास्केटबॉल की खिलाड़ी रह चुकी हैं, और टेड एक्स की वीडियो में वे बताती हैं, कि कैसे अपने खेल के जज़्बे को सफल करने के लिए उन्हें स्कूल और कॉलेज में कड़ी मेहनत करना पड़ता था ।

     

    आज वे नए ज़माने की चित्रकार हैं, और उनकी किताबें समाज के लिए बहुमूल्य हैं।

    क्योंकि प्रीती मानती हैं, कि किसी की ज़िन्दगी बचाने से अच्छा काम और कुछ नहीं। जब वे समाज में लोगों के मन में हो रही निराशा के बारे में सुनती हैं, युवा पीढ़ी की समस्याओं को जानती है, तब अपने ब्लॉग के माध्यम से अपनी सोच और समझ को वह समाज तक पहुंचा देती हैं।

    इससे  वह अपने पाठक को निराशा के भँवर से निकलने में मदद करती हैं।

    आज उनके कथन यू ट्यूब पर सबसे ज्यादा देखे जाने वाले Videos में से है।

    हमें सीखना चाहिए, कि कैसे उन्होंने खुद को आगे बढ़ने की प्रक्रिया में ढाल दिया। दुःख, तकलीफ और निराशा, ये सब उनके लिए अनुभव बनते गयें, और उन्होंने उन्हें हथियार बना लिया।

    आप कभी भी खुद की प्रतिभा को सीमित न समझें, खुद पर विश्वास रखें कि आप कर सकते हैं, इससे आपको  काम करने की शक्ति मिलेगी, और खुद को ढालने से ज़िन्दगी की छोटी मोटी निराशा दूर हो जायेगी। और आप ऊंचाई की ओर बढ़ते रहेंगे।

     References 1 2 3 4 5 

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  • 19 Feb
    Oyindrila Basu

    मुनिबा मज़ारी- एक जीती जागती अनुप्रेरणा।

    Muniba Mazari

    "मैं निःसंदेह ये स्वीकारती हूँ कि मैं मेरे शरीर की वजह से कैद हूँ, पर मेरा मन आज़ाद है, और मेरी आत्मा भी, मैं अब भी बड़े सपने देख सकती हूँ.....", मुनिबा मज़ारी।

     

    आज पाकिस्तान की "आयरन लेडी" अपने ३ साल के बेटे के साथ एक खुशहाल ज़िन्दगी बिता रही है, पर पिछले सात साल की लड़ाई आसान नहीं था। २८ साल की मुनिबा, जब वे २१ साल की थीं, तब एक कार क्रैश का शिकार हो गई थीं ।

     

    पर इस खूबसूरत महिला ने इस हादसे से अपने जज़्बे को टूटने नहीं दिया, और तब से आज तक का उनका विकास एक सफर जैसा है, जबकि उनका कद तकनीकी रूप से सीमित हो चुका  है।

     

    मैं जैसा बता रही हूँ, बात उतनी सीधी नहीं थी, लेकिन मुनिबा खुद उस एक्सीडेंट को एक दिन की घटना की तरह मानती हैं, और हम उनके इस नज़रिये को सलाम करते हैं।

     

    "मेरे कलाई की हड्डी टूटी हुयी थी, कंधे की भी... और हॉस्पिटल जाते वक़्त ही मुझे एहसास था कि मेरा आधा शरीर टूट चुका है, और आधा paralyzed  हो चुका है..... एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में भटकने के बाद, कराची में एक हॉस्पिटल ने मेरी जांच की, वहां मैं ढाई महीने तक थी, जीने की कोई वजह नहीं थी, मेरे ३ बड़े और २ छोटे ऑपरेशन हुए", ऐसा मुनिबा खुद बताती हैं।

     

    जब वे घर आई, तब भी सुधार कुछ नहीं था, उन्हें बिस्तर से बाँध दिया गया था, और एक व्हील चेयर थमा दिया  गया था, पर उन्होंने ठान ली थी, की वह किसी पर निर्भर नहीं होंगी, अपनी ज़िन्दगी खुद की शर्तों पर जियेंगी। 

     

    जब सब ने उनका साथ छोड़ दिया था, तो कला ने उन्हें सम्हाला। हॉस्पिटल के दिनों में भी, वे चित्र बनाने लगी थी, और इन चित्र के रंगों ने, उनकी बेजान ज़िन्दगी को थोड़ा सा ज़िंदादिल बनाये रखा। आज वह पहली व्हील-चेयर से जुडी महिला कलाकार हैं। कंटेंट राइटर के काम से भी उन्हें वह संतुष्टि नहीं मिल रही थी, जो उन्हें सामाजिक कार्य करने में मिला ।

     

    हमारे समाज में विकलांग या शारीरिक रूप से दुर्बल लोगों को एक कमज़ोरी का प्रतीक बना के दर्शाया जाता है, उनसे हमदर्दी की जाती है, और ये बात मुनिबा को हरगिज़ गवारा नहीं था। ऐसे ही विकलांग बच्चों को समाज में सही जगह दिलवाने के लिए वे संस्थाओं के साथ जुड़ गयीं।

     

    "हम भी इंसान हैं, हम भी आप की तरह सांस लेते हैं, हमें सहारे की ज़रूरत नहीं है, हम अपनी ज़िन्दगी खुद जीने के काबिल हैं, और हमें वह जीने दें", मुनिबा मज़ारी।

     

    टोनी&गाए के लिए वे ब्रांड एम्बेसडर बनी, और आज वे दुनिया की पहली व्हील-चेयर से जुड़ी, मॉडल हैं। और कुछ ही दिनों में, वे व्हील-चेयर से जुड़ी पहली टीवी संचालक भी बनने वाली हैं।

    और वे अपनी स्थिति से खुश हैं। सराहने वाली बात है, की उन्होंने अपनी कमज़ोरी को अपनी ताक़त बना ली है ।  उनकी हिम्मत और सकारात्मक चिंता को हमारा सलाम। उन्होंने कभी न रुकने की ठान ली है...

    "व्हील-चेयर बहाना नहीं हो सकता, जिससे मैं कोई काम न करूँ," ऐसा वह कहती हैं।

     

    हालातों से मुक़ाबला करके, खुश रहना, ज़िन्दगी का आनंद उठाना यह सब  मज़ारी हमें समझाती हैं।

    ज़िन्दगी बहुत खूबसूरत है, छोटी छोटी चीज़ों का मलाल रखने से हमें कुछ हासिल नहीं होगा। सच कहती हैं, मज़ारी, अपनी कमज़ोरी को ताक़त बनाने की कला आप सीख गये, तो आकाश आपकी मुट्ठी में है..... जियें, खुश रहें, हर पल का मज़ा उठाएं, और अपनी क्षमता को निखरने का मौका दें ।

     

  • 29 Dec
    Shiva Raman Pandey

    चिंता

    chinta kya hai aur isse kaise nipten

    लोग हर समय तनाव और चिंता की बातें करते रहते हैं। हालाँकि उनमें से काफी लोग जब अपने घर जाते हैं और अपने परिवार, मजेदार दोस्तों या अपने शौक में व्यस्त हो जातें हैं तो अपने तनाव को भूल जातें हैं। ऐसा मेरे साथ नही था। मैं हरसमय चिंता किया करता था। हर सुबह अख़बार की तरफ देख कर मैं भयभीत हो जाता था। सभी प्रकार के अपराध,  मौत और दुःख के समाचार अख़बार में होते थे। मैं भयभीत हो जाता था। जब मैं अपने परिवार और दोस्तों से मिलता था, मैं उनके बारे में चिंता करता था। जब मैं पढ़ने बैठता था तो रिज़ल्ट की चिंता करता था।

    मैंने ये सोचना शुरू किया की मेरे साथ कुछ गलत हो रहा है। मैं हमेशा से ऐसा नही था। मेरे साथ ऐसा क्या हुआ? मुझे माँ की मृत्यु से पूर्व के समय का ज्यादा याद नहीं है।  माँ  पिताजी के स्वास्थ्य को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित रहतीं थीं, क्योंकि पिताजी काम के कारण बहुत ज्यादा यात्रा करते थे, जिसका प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर पड़ता था। इसके साथ ,बदलता मौसम और भोजन ,कुछ संचार साधनों के जोखिमों को ध्यान नहीं देना माँ को घंटों विचारमग्न रखता था। वो हमेशा ये चिंता किया करतीं थीं की पिताजी की अनुपस्थिति में हम कैसे सुरक्षित रहेंगें।

    एक दिन मैं स्कूल से वापस घर आया तो दरवजा खुला हुआ था ,माँ अंदर जमीन पर लेटी हुईं थीं......... उनकी गर्दन पर किसी ने चाकू से वार किया था ।  कुछ चोर आये थे, और जब माँ ने उन्हें देखकर ज्यादा शोर मचाने लगीं तो उन्होनें माँ को मार दिया। .......... मैं इतना ज्यादा सहम गया था की मैं कई दिनों तक बोल नही पाया था। वह समय गुजर गया, पिताजी ने दोबारा शादी कर ली। मेरी नई माँ अच्छी है। कम से कम वह मुझे कोई हानि नही पहुचातीं।

    उन्होंने मुझसे कहा की मेरी जो भी चिंताएं हैं । उनके बारे में मुझे परामर्शक से बात करनी चाहिए। उन्होंने मुझे अपने एक मित्र का नाम सुझाया। यहाँ आकर मुझे अपने 'चिन्तात्मक विकार ' के बारे में पता चला, जो माँ की मौत से शुरू हुआ था। मेरे दिमाग में हर समय ये विचार चलता रहता था की यदि मैं चिंता नही करूंगा और सबका ध्यान नही रखूंगा तो वो सब भी माँ की तरह मुझे छोड़कर चले जायेंगें। धीरे -धीरे हमने परामर्श के माध्यम से मेरे विचारों पर काम किया और अब मैं कम चिंता करता हूँ। लेकिन अभी और आगे जाना बाकी है.............l

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  • 29 Dec
    Shiva Raman Pandey

    सोते समय चलना

    sote samay chalna

    मैं शांति का प्रतीक था। कोई भी घटना इतनी बुरी नही होती थी कि मेरा क्रोध नियंत्रण के बाहर हो जाय। हम गंभीर आर्थिक संकटों से गुजर रहे थे, और मैंने अपने माता पिता को खो दिया था। जाहिर है की मैं एक बच्चे की तरह रोया था लेकिन मैंने अपने आप को नियंत्रित किया और फिर से वापस ठीक से जीने लगा। हां मुझे अंदर से महसूस होता था लेकिन मैं ठीक से पढ़ने और काम करने में सक्षम था।

    मेरे घर पर अब  सिर्फ मैं, मेरे भैया और भाभी थे,मेरे माता पिता परलोक सिधार चुके थे। एक सुबह मैं उठा और मैंने पाया की मैं अपने बिस्तर पर नहीं बल्कि बरामदे की बेंच पर हूँ। मैं यहाँ कैसे आया? मैं पूरी तरह उलझा हुआ था। अगले दिन जब मैं उठा तो मेरे हाथ में एक चाकू था।

    मैं और मेरे भैया बहुत परेशान थे। उन्होंने बोला की मै आधी रात को उठ कर बाहर चला जाता हूँ। वह मेरी सुरक्षा के लिए डर गए थे। इसलिए उन्होंने दरवाजे पर डबल लॉक लगा दिया। बंद दरवाजे पर नाराज होकर मैंने रसोईं से चाकू उठा लिया। मेरे भैया ने उसे मेरे हाथ से लेने की कोशिश की ,पर उससे मै नाराज हो गया। तो उन्होंने मुझे आराम से बिस्तर पर चाकू के साथ लिटा दिया।

    पहले हमने सोचा कि यह काला जादू है या कुछ असाधारण हो सकता है ,पर बाद में हमने सोचा की चलो डॉक्टर को दिखा दे। हमे नींद से जुडी समस्याओं के मनोचिकित्सक के पास भेजा गया। उन्होंने बताया की यह सब शुरू हुआ है उन सभी तनावों की वजह से, जिनसे मैं गुजरा हूँ। साथ ही साथ शांत स्वाभाव का होने के कारण मैंने किसी से झगड़ा नहीं किया, इसीलिए यह इस तरह से बाहर आया।

    धीरे-धीरे, मैंने अपने सारे संदेह, भय और दुख प्रकट किये और फ़ूट-फ़ूट के रोया।  लेकिन मैं ठीक हो गया। मैं आराम से सोने लगा और धीरे धीरे मेरी- नींद में चलने की आदत बंद हो गई।                        

     

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