कुल 30 कहानियाँ

  • 24 Mar
    Oyindrila Basu

    वे बॉलीवुड मूवीज जिन्होनें मानसिक समस्याओं को लेकर जागरूकता बढ़ाई ।

    priyanka chopra

     

    बॉलीवुड विश्व की सब बड़ी फिल्म इंडस्ट्री है, और ये एक ऐसा स्तर हैं, जो हमारे समाज और उनके लोगों को काफी हद तक प्रभावित कर सकता है।
    हर शनि और रविवार को मल्टीप्लेक्स की टिकट विक्रय इसका प्रमाण है।
    हमारी युवा पीढ़ी बॉलीवुड के सितारों से प्रभावित है, यहाँ तक की बुज़ुर्ग और बच्चे भी। बड़ी संख्या में दर्शकों तक पहुँचने का जरिया है ये बॉलीवुड ।
    उनपर गंभीर जिम्मेदारी बनती है कि वह फिल्मों में क्या दिखा रहें है, इससे समाज में अच्छे और बुरे दोनों प्रभाव पड़ते हैं ।
    खुश किस्मती, से आजकल, फिल्मों में काफी परिवर्तन आ रहा है। घर घर की कहानी से हट कर निर्माता समाज के गंभीर मुद्दों पर फिल्म बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे हम रीयलिस्टिक सिनेमा कहते हैं। और इन्हीं में एक मुद्दा है, मानसिक प्रतिबंध।
    समाज में, मानसिक रोगियों को लेकर जो कलंक या हीन भावना है, उसके विरुद्ध लड़ने में बॉलीवुड हमारी मदद करता है।
    बर्फी, तारे ज़मीन पर, ब्लैक, गुज़ारिश, और मार्गरिटा विथ अ स्ट्रॉ जैसी फिल्मों में मानसिक रोग को एक ख़ुशी, एक क्षमता की तरह दिखाया गया है।
    बर्फी में एक गूंगे और बहरे इंसान को हम खुशहाली से ज़िन्दगी बिताते देखते हैं, हँसते मुस्कुराते देखते हैं, तो हमें लगता ही नहीं की ये कोई दुर्बलता हो सकती है। दूसरी तरफ उसी फिल्म में झिलमिल जो की एक ऑटिस्टिक लड़की हैं, प्यार और रिश्तों की परिभाषा बताती है। और जब ये चरित्र हमारे पसंदीदा कलाकार रणबीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा निभा रहे हैं, तो हमें ये मानसिक बीमारी कलंकित नहीं लगता। उनका मज़ाक बनाने के बजाए, उनसे जुड़ जाते हैं, और हमदर्दी से हम फिल्म को और अभिनेताओं को सराहते हैं।
    पर अच्छी बात यह है, की मानसिक रोग के प्रति हमारा नजरिया बदलता है।


    guzaarishगुज़ारिश में ह्रितिक रोशन एक अद्भुत जादूगर की भूमिका में नज़र आते हैं, जिनको व्हील चेयर ने जकड़ लिया है, और इसलिए वे खुद ज़िन्दगी को अलविदा कहना चाहते हैं, पर ख़ास है, उनका रवैया। ज़िन्दगी के आखिरी दिन तक, वह सम्राट की तरह जीतें हैं, और ज़िन्दगी का मज़ा उठाना किसे कहते है, हमें बताते हैं।
    मानसिक या शारीरिक रूप से दुर्बल व्यक्ति हम और आप की तरह आम इंसान हैं, वह भी सांस लेते हैं, जीना चाहते हैं, उनके जज़्बात अलग नहीं है, ये हमें बॉलीवुड की फिल्में खुले स्वभाव से बताती हैं।


    taare zameen par"तारे ज़मीन पर" एक ऐसी फिल्म है, जिसमें Dyslexia जैसी बीमारी पर चर्चा की गई है, और ये शिक्षक और माता-पिता को एक सीख देती है, की बच्चों को समझकर उनकी सहायता करनी चाहिए। अव्वल आने की दौड़ में धकेलना गलत है, और जब आमिर खान जैसे सितारे हमें सीख देते हैं, तो हमें अवश्य सही लगता है। :)
    ये कहना गलत नहीं होगा, की फिल्मों की सफलता, हमारी हमदर्दी से जुड़ी होती हैं, पर अगर इस हमदर्दी से हम कुछ नया सीखते हैं, और समाज में सुधार आता है, तो यह बिलकुल गलत नहीं है।
    लगान जैसी कुछ फिल्मों में विकलांगता को हथियार बनाया गया है, जहां फिल्म का एक पात्र कचरा, पोलियो की वजह से लूला है, अपंग है, पर उसकी यही क्षमता, उसे अच्छा स्पिन बॉलर बनाती है, और मैच में जीत हासिल होती है।


    u me aur humयू मी और हम, Alzeimer’s Disease से जुडी समस्याओं को दर्शाता है, लेकिन एक रोगी को आपकी सहायता की ज़रूरत है, धैर्य की ज़रूरत है, ये भी हम वहीँ से समझ पाते हैं।
    बॉलीवुड की सफलता आज सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, कुवैत, और अमरीका जैसे देशों में भी फैला हुआ है। इस लिए, हर प्रकार के समाज में एक जागरूकता लाना, एक नई सोच को शुरू करना फिल्मों का नैतिक कर्त्तव्य है।
    इस प्रचेष्टा में बॉलीवुड आज तक सफल रही है, और हम आशा करते हैं, आने वाले दिनों में भी, बॉलीवुड ऐसे मुद्दों पर समाज में जागरूकता फ़ैलाने का काम करेगा।

  • 24 Mar
    Oyindrila Basu

    हनी सिंह और बाइपोलर डिसऑर्डर

    honey singh

     

    हम सभी ने कभी न कभी 'लुंगी डांस' और 'पार्टी शूज' जैसे गानों  पर पैर थिरकाया है। ऐसे कई अनगिनत गाने हैं, जिन पर उनके शब्दों ने कुछ ऐसा जादू बिखेरा, कि हर एक क्लब में सिर्फ उन्ही का नाम चर्चा में रहा। जी हाँ हम बात कर रहे हैं, पंजाब दा मुंडा, यो हनी सिंह जी की, जिन्होंने कुछ ही समय में सफलता की उन ऊंचाइयों को छुआ है, जहाँ बड़े बड़े संगीतकार भी उन्हें ईर्षा के पात्र बनाते हैं।

    हनी सिंह जी के गानों ने, अच्छे संगीत की परिभाषा ही बदल दी। गाना यानी, ताल, और उन पर शब्दों का खेल, यही है, हनी सिंह के रैप गाने। ये ताल का चक्कर युवा पीढ़ी पर खूब चला, और यो यो हनी सिंह हर कॉन्सर्ट और लाइव शो के पसंदीदा सितारे बन गए।

    लेकिन क्या काफी समय से हम वह सुर, वह ताल मिस नहीं कर रहे? जी हाँ, लगभग दो सालों से हनी सिंह जी इस शान-ओ शौकत से गायब हैं।

    अचानक उन्होंने संगीत से, बिना किसी को कुछ बताये विराम ले लिया। और आज 18 महीनों के बाद वे अपनी समस्या के साथ मीडिया के सामने आएं, और स्वीकारा, कि उन्हें बाइपोलर डिसऑर्डर था, और वे नशेड़ी थे, जिसकी वजह से घर तो क्या कमरे से भी नहीं निकल पाते थे।

    नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेन्टल हेल्थ बताता है, कि बाइपोलर डिसऑर्डर का मतलब है, एक ऐसी मानसिक स्थिति जिसमें इंसान का मूड, या मिज़ाज घड़ी घड़ी बदलता है, वह समाज से डरता है, और शंका में जीता है। शराब और नशेड़ी चीज़ों से ये समस्या बढ़ सकती है।

    "वह 18 महीने मेरी ज़िन्दगी के सबसे अँधेरे दिनों में से थे, और मैं किसी से बात करने की स्थिति में नहीं था”, हनी सिंह बताते हैं।

    अजीब लगता है, हंसमुखता के प्रतीक दिखने वाले एक संगीतकार जब खुद को मानसिक रोगी बताते हैं।

    ये रोग उनकी निजी ज़िन्दगी को तो नुकसान पहुंचा ही रहा था, साथ ही में उनके काम पर भी असर कर रहा था।

    "मैं कमरे से बाहर नहीं आ सकता था। मुझे डर लगता था की ये अन्धेरा मेरे साथ हमेशा रह जाएगा। मैंने दिनों तक बाल नहीं बनाये थे, दाढ़ी नहीं बनाई थी, किसी से मिलने में झिझक होती थी, जो इंसान 20,000 लोगों के सामने जाता था, आज 4-5 लोगों से मिलने में भी कतराता था", अपने अनुभव से बताते हैं हनी सिंह।

    पर अच्छी बात यह है, की वह खुद को इस पीड़ा से बाहर लाने की कोशिश कर रहे हैं, इसीलिए उन्होंने मीडिया से मिलकर अपना हाल-बयान किया। एक स्टार के लिए मानसिक रोग को स्वीकारना आसान बात नहीं है, पर सच को मानने से ही उसका समाधान हो सकता है।

    18 महीनों में उन्होंने 4 अलग डॉक्टरों से जाँच करवाई की, और आज उनकी तबीयत में जो सुधार आया है, वह उनके मनोबल का नतीजा है।

    कहते है, कला में इंसान की खूबसूरती ज़ाहिर होती है। जीवन के मुश्किल क्षण में भी, उनका संगीत उनके साथ था, शायद संगीत ही वह प्रेरणा है, जिससे वे आज उबर पाये हैं।

    "एक दिन जब नींद की गोलियों से भी नींद ना आई, तब मैंने एक गाना "राईस एंड शाइन" लिखा और उस पर संगीत बनाया,   मैंने अपनी माँ के दिल को बहुत दुखाया, आज मैं जो भी हूँ उनकी वजह से हूँ", यो यो कहते हैं।

    तभी हम आशा करते हैं की जल्द ही हम हनी सिंह को फिर से बीट बजाते देख पाएंगे, और उनके गाने देसी और अंग्रेजी हर गाने की लिस्ट को टॉप करेंगे। ये अल्पविराम जल्द ही खत्म होने को है, और आगे सिर्फ वह होंगे, उनके ताल होंगे और म्यूजिक चैनल पर एक ही शोर होगा, "यो यो हनी सिंगा"

  • 13 Mar
    Oyindrila Basu

    मेरा देश बदलेगा, आगे बढ़ेगा

    indian painting

     

     "ऑफिस में मेरा दूसरा ही दिन था। काफी चीज़ें समझना अभी बाकी था। अचानक बॉस का कॉल आया। मैं उनके केबिन में गयी, तो उन्होंने दरवाज़ा बंद कर दिया। और अचानक मुझे अपने करीब खींच कर मुझसे कहने लगे, 'आज रात मेरे घर कॉफ़ी पीने के लिए आओगी ? अगर आओगी, तो हम खूब मज़ा करेंगे, और एक हफ्ते में तुम्हारी प्रमोशन भी पक्की है'...

    कुछ देर के लिए, मेरा दिमाग सुन्न हो गया, मुझ पर परिवार की जिन्मेदारी थी, नौकरी अहम थी, पर ये क्या हो रहा था! लेकिन मुझ में अचानक एक शक्ति आई, मैंने उसे धक्का मार कर चेयर पर गिरा दिया, और झट से जाकर दरवाज़ा खोल दिया, ताकि सब देख सकें, फिर बॉस के करीब जा कर, उसके डेस्क से गिलास उठाया और पानी उसके मुंह पर मार दिया। ऑफिस में सब मुझे साहस के लिए वाह वाही देने लगे, पर साथ में ये भी कहते- 'बड़ी कंपनी में, लड़कियों के साथ छेड़छाड़ तो आम बात है, साधारण है.. पर मैं किसी भी अन्याय को साधारण अवस्था का नाम देकर सह नहीं सकती थी..",

     

    अपने चारो ओर घट रही कई घटनाओं को हम 'आम बात' कह कर उसे स्वीकार लेते हैं। अगर सही नहीं भी है, तो भी हम उसे बदलने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि यह शायद पीढ़ियों से होता आ रहा है, और समाज में, उसे बदला नहीं गया है।

    जातिवाद, दहेज़, यौन शोषण, नारी-भ्रूण हत्या, सांप्रदायिकता, छेड़छाड़ ऐसे ही कई सामाजिक कलंक हैं, जिसका हम प्रतिरोध नहीं करते।

    लड़की को सड़क पर छेड़ा जाता है, तो माँ उसे शिकायत दर्ज करने से मना करती है, 'ये तो आम बात है' कहकर नकार देती है।

    शादी में ऊँची दहेज़ की मांग को 'रिवाज़' और 'आम' तोहफे का नाम देकर समाज में चलाया जाता है, और गैर कानूनी होने के बावजूद, कोई इसके खिलाफ कुछ नहीं बोलता, कहते हैं कि 'ये तो आम बात है'...

     

    किसी भी घटना को हम 'आम' या साधारण कैसे बताते हैं?

     

    १. अगर ये घटना एक चलन है, और किसी ने इसे बदला नहीं है, और हम भी इसका अभ्यास करते हैं।

     

    २. अगर किसी घटना या धारणा को हमारी स्वीकृति मिलती है, और वह भी काफी वक़्त से, तो वह बात 'आम' या साधारण बन जाती है।

     

    अपने सहनशीलता को, इतना भी ना बढ़ने दें, की गलत चीज़ें भी आप को आम लगने लगे। जो बातें, आप को खटक रही हैं, उसे न स्वीकारें, उनका विरोध करें।

    छेड़छाड़ के विरुद्ध हमेशा शिकायत दर्ज करना चाहिए, ताकि, बाद में समस्या ज्यादा गंभीर न हो।

    आपकी चुप्पी समाज में घूम रहे बदमाशों और उनकी बदमाशियों को बढ़ावा देगी ।

    हमारा भारत, 'असहनशील' बुलाये जाने पर भड़क उठता है, पर आज भी सम्मान रक्षा हेतु हत्या को, 'साधारण' मान कर उसे स्वीकार लेता है।

    एक लड़की समझती है, कि परिवार की मर्यादा भंग न हो, और यह उसका ही कर्तव्य है, क्योंकि वही 'आम तौर से' होता है। ऐसी कई गलत धारणाओं को समाज में 'आम बात' के नाम से माना जाता है ।

    शायद सच ही कहा है अंदलीब वाजिद जी ने - "मैं कभी भी किसी बात को साधारण मानकर नहीं चल पाऊंगी"

    इस बात पर हमें याद आती है फिल्म 'टू स्टेट्स' की अनन्या, जो दहेज़ के खिलाफ जाती है, और ड्यूक को ये एहसास दिलाती है, कि सिर्फ लड़का होना ही किसी की काबिलियत नहीं हो सकती। इसलिए लड़के को दहेज़ में गाड़ी और बंगला मिले, 'यह आम बात नहीं है'

    और हमें याद आता है 'पी के' फिल्म के आमिर जी, जो हमें ये अहसास कराते हैं, कि धर्म चलता है वेशभूषा से, मूर्ति की पूजन से। हिन्दू साड़ी पहनेगी, मुसलमान सर पर जाली टोपी पहनेगा, इन धारणाओं को ही हम 'आम तौर पर' धर्म के साथ जोड़ते हैं। पर अगर इन्हें बदल दिया जाये, तो हम लोगों में फर्क नहीं कर पाएंगे।

    ऐसी कोशिशों की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है।

    किसी महान व्यक्ति नें सच कहा है, कि अगर आप साधारण के ऊपर देखेंगे नहीं, तो खुद में असाधारण क्षमता आपको दिखेगी नहीं

    हार का सामना करना अच्छी बात है। पर ये मान लेना कि आप साधारण हैं, और कभी जीत नहीं सकते, ये बुरी बात है।

    हमेशा समाज की भीड़ में, घुले रहना ज़रूरी नहीं है। अपने सिद्धांतों पर भरोसा रखें।

    अगर आपकी कोशिश साधारण से ऊँची होगी, तो आप खुद को एक बेहतर स्तर पर पाएंगे। लाख बाधाओं के बावजूद आज तस्लीमा नसरीन जी समाज में घट रही बुरी घटनाओं के विरुद्ध डट कर लिखतीं है। अगर उनके प्रति भारतीय समाज के रवैये को वह 'आम घटना' मानकर, हार स्वीकार कर लेतीं, तो आज वे विश्व विख्यात लेखिका नहीं होतीं।

    अपने आप को आगे ले जाने के लिए, साधारण चीज़ों को एक दूसरे नज़रिये से देखें, अगर वह सही नहीं है, तो उनका विरोध करें, खुद की क्षमता को असाधारण बनाने की कोशिश हमेशा करते रहे, ये ठान लें, कि आप कर सकते हैं।

    Image source

     

  • 04 Mar
    Oyindrila Basu

    लिली सिंह की प्रेरणादायक कहानी।

    lilly singh

    निराशा से लड़ना, "इसमें शर्म की कोई बात नहीं", लिली सिंह।

     

    आप अचम्भित होंगे जान कर, कि जो महिला सोशल मीडिया पर सब से हंसमुख चरित्र के रूप से मशहूर है, जो लड़की सबसे निश्चिन्त और बेपरवाह मन रखने वाली छवि से परिचित है, youtube पर, वह लिल्ली सिंह भी कभी डिप्रेशन या निराशा की शिकार रह चुकी हैं!!!

     

    पर ये सच है, कि यू टूब  पर "सुपर वुमन" के नाम से जानी जाने वाली लिल्ली, निराशा की शिकार रह चुकी हैं, और आज उनके वीडियोस में हम उस वक़्त की लड़ाई के बारे में जान पातें है।

     

    लिली एक पंजाबी परिवार में कैनेडा में पैदा हुयी । साइकोलॉजी में उन्होंने ग्रेजुएशन की। क्योंकि वह निराशा से जूझ रही थी, उसी दौरान अपने जज़्बातों को ज़ाहिर करने के लिए उन्होंने यू टूब को माध्यम बनाया।

    अपनी कमज़ोरियों से लड़ने का जज़्बा ही प्रशंसनीय है, उससे हार मान कर बैठे रहने से ज़िन्दगी नहीं रुकती।

    जब उन्होंने यू टूब पर बोलना शुरू किया था, तब उन्हें पता नहीं था, की उन्हें इतनी सफलता मिलेगी।

     

    उनके शुरूआती वीडियोस में एक है, "Never Say Never" जो जस्टिन बीबर पर एक हास्यानुकृति है। तब उस वीडियो ने 1000 लोगों को आकर्षित किया था। और लिली  को पता चला, की देश के युवा में आकांक्षा है, और उन में वह क्षमता है, जिससे वह युवा तक पहुँच सकती है।

     

    आज वह अपने हँसी ठहाकों से काफी गंभीर मुद्दे पर हँसते-हँसते, मज़ाक में चर्चा कर लेती हैं ।

     

    और उनका हास्य-रस ही लोगों को भा जाता है।

     

    "मेरे सामने कोई लक्ष्य नहीं था। मैं खाना नहीं चाहती थी, मैं बिना बात के ही उदास थी, पर फिर मैंने सोचा, मेरे पास दो रास्ते हैं, या मैं ऐसे ही परेशानी में जियूं, या फिर ज़िन्दगी को बदलने के लिए कुछ करूँ", लिली  कहती हैं।

     

    और तब उन्होंने यू टूब को चुना, जिसके माध्यम से, वह सिर्फ अपना ही नहीं, कई और लोगों की निराशा को भी दूर करतीं है।

     

    उन्हें लगा की उनकी बातों से लोगों को प्रेरणा मिलेगी, और उन्हें बिल्कुल सही लगा।

     

    आज वे ए आई बी जैसे जनप्रिय चैनल के साथ भी वीडियोस  में नज़र आती हैं, और अपने हंसमुख स्वभाव से सबको लुभाती हैं।

     

    उन्होंने कई फिल्मों में रोचक किरदार निभाएं है, और फिलहाल "अ ट्रिप टू यूनिकॉर्न आइलैंड", पर काम कर रही हैं, जो की उनकी ही ज़िन्दगी पर एक डाक्यूमेंट्री है।

     

    आज उनके वीडियोस जगह जगह पर मशहूर हैं, इंटरनेट पर छाये हुए हैं। उनको MTV Fandom और Streamy जैसे पुरस्कार भी मिल चुका है।

     

    पर जब कोई उनसे पूछता है, कि वे कैसे निराशा से खुद को मुक्त कर पायी, तो वे बताती हैं, "मेरा दिमाग  ठनका, दूसरा स्विच जल गया, और मैं आशा करती हूँ की मेरी अगली फिल्म आप सब लोगों के लिए वह परिवर्तन का माध्यम हो", लिली सिंह कहती हैं।

     

    हाँ हम भी यही आशा करते हैं, और आपको बधाइयां देते हैं, ताकि आप भविष्य में भी यूँ ही हमें प्रेरित करती रहें।

     

     

    References:1  2 3 

     

     

  • 25 Feb
    Oyindrila Basu

    दीपिका पदुकोने - मेहनत, लगन, कोशिश और दृढ़ संकल्प से इंसान आगे बढ़ता है


    Deepika Padukone

    एक चुटकी आत्मविश्वास, साथ में चम्मच भर कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प, उसमें अगर अपनों का साथ घुल जाये, तब जा कर बनती है, सफलता की सही रेसिपी।

    मेहनत, लगन, कोशिश और दृढ़ संकल्प से इंसान आगे बढ़ता है, और साथ में अगर माता पिता का साथ मिल जाए, तो सफलता को कोई नहीं रोक सकता। पर, जो काम हम कर रहे हैं, उसपरखुद को विश्वास होना ज़रूरी है।


    हाल ही में हमने देखा, अभिनेत्री दीपिका पदुकोने फिल्मफेयर के मंच पर श्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीतीं, और तभी उन्होंने सब के साथ अपने पिताजी की एक चिट्ठी पढ़ी, जिसमें उन्होनें बेटियों को कड़ी मेहनत, लग्न और दृढ़ता की सीख दी है।


    आज हम दीपिका की सफलता को सराहते हैं, लेकिन उनका सफर कम कठिन नहीं था। और इस लम्बे सफर में, उनके पिताजी, उनके लिए प्रेरणा रहे हैं।


    "पीछे मुड़के देखता हूँ, तो ये महसूस होता है, कि मेरी बचपन से खासियत थी, की किसी भी चीज़ को लेकर शिकायत ना करना। हफ्ते में जितने घंटे मिलते थे खेलने के लिए, मैं उसी के लिए शुक्रगुज़ार था। हर मौके का पुर्नउपयोग किया है मैंने, ज़िन्दगी को खुलके जिया है। छोटी छोटी चीज़ों पर अफ़सोस जताने से ज़िन्दगी छोटी पड़ जाती है। अपनी कड़ी मेहनत से जितना भी है, उसे और बड़ा बनाओ। अगर आप अपने काम से प्यार करते हैं, तो कोई और बात मायने नहीं रखती, न ही शोहरत और न ही टीवी पर खुद को देखने की चाह। " प्रकाश पदुकोने अपनी बेटियों को खत में लिखते हैं।


    दीपिका के दृढ़ निश्चय को देखते हुए हमें पता चलता है, की वे अपने पिताजी के बुद्धिजीवी कथन से काफी प्रभावित हैं।
    उन्होंने ज़िन्दगी में जो भी किया है, अच्छे से किया है। पहले वे बैडमिंटन खिलाडी थी, और उन्होंने कम उम्र से ही नेशनल गेम्स में भाग लिया है।
    पर फिर उन्हें अपने सपने को पूरा करना था, इसलिए वह मॉडलिंग की दुनिया में आयीं।
    क्लोज अप जेल का वह विज्ञापन याद है? वह साधारण सी लड़की आज कृष्ण-नारी की हकदार हैं।


    शुरुआत में, उन्होंने ने अपना करियर कन्नड़ फिल्मों से शुरू किया, वह उन्हें ज्यादा सफलता तो नहीं दे पायीं, पर उन्होंने हार नहीं मानी, उन्हें खुद पर भरोसा था, और ये साहस उन्हें अपने पिताजी से हासिल हुआ-


    "जब तुमने हमें बताया की तुम मॉडलिंग करना चाहती हो, तो हम काफी चिंतित थे, कि तुम इतनी छोटी हो, मुंबई जैसे शहर में कैसे अकेली रह पाओगी, और खास कर ऐसी इंडस्ट्री में, जिसके बारे में हम ज्यादा नहीं जानते थे। पर हमने सोच लिया, कि तुम्हे हम रोकेंगे तो वह गलत होगा। तुम्हे अपने सपनों को पाने कि कोशिश ज़रूर करनी चाहिए। अगर तुम सफल होती हो, तो हम गर्व करेंगे, पर अगर नहीं भी हुयी, तो ये अफ़सोस नहीं रहेगा कि तुमने कोशिश नहीं की।" दीपिका के पिताजी बताते हैं।


    इन शब्दों में, बेटी पर भरोसा, विश्वास और समर्थन झलकता है, जो दीपिका के लिए बहुत महत्व रखता है।

    हार से निडर होना, उन्होंने अपने पापा से सीखा है। क़ाबिलीयत एक दिन ज़रूर रंग लाती है।
    बॉलीवुड में अपना डेब्यू फिल्म "ओम शांति ओम", के बाद, दीपिका को पीछे मुड़ कर नहीं देखना पडा ।
    एक के बाद एक हिट फिल्में आती गयी, और उन में उनका अभिनय सराहा गया।


    2014 उनके लिए खास रहा है। एक तरफ उन्होंने आइफा अवार्ड्स में 'हीरोइन ऑफ़ द ईयर" का खिताब जीता, जो अहम भूमिका रखता है, क्योंकि वे पहेली अभिनेत्री थी जिन्होंने ये खिताब जीता।
    दूसरी तरफ, उसी साल वे गंभीर निराशा कि शिकार हुयी। उनके मानसिक संतुलंत ने उनका साथ नहीं दिया। सब कुछ था फिर भी इस मानसिक रोग से वे नहीं जूझ पा रही थी।
    पर हिम्मत ए बंदा तो मदद ए खुद।


    आत्मविश्वास के आग को जलाये रखा उन्होंने, और धीरे धीरे वे जिस प्रकार इस रोग से उबरी, वह प्रशंसा के काबिल है।


    इतनी शोहरत प्राप्त होने पर भी, दीपिका अपनी मिट्टी से दूर नहीं हैं। आज भी वह अपने दोस्तों से साधारण जगह पर मिलना पसंद करती है। इसकी सीख उन्हें घर से मिलती है।


    "जब तुम घर आती हो, तुम अपना खाना खुद परोसती हो, बर्तन खुद उठाती हो, और घर में मेहमान हों, तो ज़मीन पर सोती हो। ....तुम्हे अगर कभी लगे कि हम तुम्हारे साथ सेलिब्रिटी जैसा व्यवहार क्यों नहीं करते, तो याद रखो, की तुम पहले हमारी बेटी हो, और बाद में फिल्म स्टार ।" प्रकाश जी।


    हार उन्हें कभी हरा नहीं पायी। ज़िन्दगी की मुश्किल घड़ियों का डट कर सामना करते हुए वे आगे बढ़ती चली गयीं। अपने जज़्बे को अपना हौसला बना लिया। क्योंकि उन्हें याद था, "हमें ज़िन्दगी में सब कुछ नहीं मिलता, जीत हमेशा हासिल नहीं होती"
    करियर की शुरुआत में जो मेहनत हम करते हैं, रिटायरमेंट के वक़्त तक भी उतनी ही मेहनत करना है, यह मान कर वे चलती हैं।


    ये माता-पिता और बच्चों के लिए एक सीख है, कि कैसे कोई एक अपना भी आपके साथ हो, आपको समझे, तो कितनी सहायता होती है। और अपनों का विश्वास ही हमें सफलता के शिखर तक पहुंचाता है।
    सकारात्मक विचार बनाये रखें। परिवार और अपनों का आदर करें, क्योंकि अंत में वही हमारे पास रह जाता है। अपने काम से प्यार करें, पर सबसे अहम बात, खुद पर भरोसा रखें। इन सब को सही मात्रा में मिलाएंगे, तो पकेगा सफलता का सही नुस्खा।

    Image source