कुल 30 कहानियाँ

  • 04 Apr
    Oyindrila Basu

    प्रत्युषा बनर्जी-क्या अवसाद उनकी आत्महत्या का कारण बना?

    pratyusha banerjee suicide

     

    #बालिका वधु-कच्ची उम्र के पक्के रिश्ते, Colours TV पर आने वाला ये शो, बेहद लोकप्रिय हुआ और इसके माध्यम से इंडियन टेलीविज़न इंडस्ट्री को कई नए चेहरे, और कई नए कलाकारों  से परिचय कराने का मौका मिला। नई प्रतिभा जो उभर कर सामने  आई थीं , उनमें एक थी हमारी नयी #आनंदी, यानी जमशेदपुर की प्रत्युषा बनर्जी जिसे भारत की आम जनता ने अपनी बेटी बनाया, और कुछ ही दिनों में ये लड़की हर घर की लाडली बन गयी।

    रातों रात सफलता मिली, उसने कई सीरियल में काम किया, #बिग बॉस में भाग लिया जिससे उसकी लोकप्रियता और बढ़ गयी।

    उसके दोस्त और सहयोगी बताते हैं की वो काफी हंसमुख थीं। Twitter और Instagram पर हमेशा उसके पोस्ट्स आते थे। तो फिर ऐसा क्या हुआ कि, इतनी  कम उम्र में प्रत्युषा ज़िन्दगी से मायूस हो कर आत्महत्या की ओर चली?

    1 अप्रैल को उसके अपार्टमेंट में पुलिस को  सीलिंग से लटकती प्रत्युषा मिली । ये घटना आश्चर्य जनक थी, कोई यकीन नहीं कर पा रहा था, फिल्म और टेलीविज़न की जानी-मानी हस्तीं भी इस दुखद घटना से परेशान  थे।

    लेकिन प्रत्युषा ने ऐसा क्यों किया?

    उनके दोस्त उन्हें आज भी हंसती-खेलती, फुदकती प्रत्युषा के रूप में ही पहचानते हैं, लेकिन काफी दिनों से उन्होंने सब से दूरी बना ली थी। किसी से बात नहीं करती थीं।

    सोशल नेटवर्क पर भी नहीं आती थीं ।

    डॉक्टर श्याम मिथिया बताते है, "जब कोई इंसान अपने जान पहचान वालों से दूर हो जाता है, इसका मतलब वह किसी मानसिक समस्या से जूझ रहा है, और जब ये एक सेलिब्रिटी करता है, तो और भी अस्वाभाविक है, क्योंकि वे लाइमलाइट में रहने के आदी हैं, सब से घुलना मिलना यही उनकी ज़िन्दगी है, तो ऐसे में कोई एक दम से चुप हो जाता है, तो साफ़ है कि वह  निराश है, परेशान है"

     

    प्रत्युषा की ज़िन्दगी में, उसके राहुल सिंह के साथ सम्बन्धों को लेकर कुछ समस्या थी। वे उनसे शादी करने वाली थी, लेकिन कुछ हफ्ते पहले उन्होंने Twitter पर कहा, "मर कर भी तुझसे मुंह ना मोड़ेंगे", जिससे साफ़ पता चलता है वे अभिमान और उदासी में ऐसा कह रहीं थीं।

    कुछ महीने पहले उन्होंने कुछ लड़कों पर अश्लील व्यवहार का आरोप लगाया था। उनके साथ कुछ न कुछ समस्या आ ही रही थी।

    लेकिन एक इंसान हताश के किस मक़ाम पर पहुंचकर ज़िन्दगी को ही खत्म करना चाहता  है, ये हम शायद समझ ना पाएं।

    डॉक्टर मिथिया बताते हैं "जब कोई WhatsApp पर कुछ पोस्ट करता है, तो वह किसी न किसी प्रकार से उससे जुड़ा हुआ होता है, वे खुद को उस बात से संबंधित कर सकते हैं, इसलिए पोस्ट करते हैं"

    अगर कोई गाने के बोल भी हम पोस्ट करते हैं इसका मतलब यही होता है कि या वह बोल हमारी स्थिति को बेहतर बयान करते हैं, या फिर वह हमें पसंद है, और हम दुनिया को ये बात बताना चाहते हैं।

    कोई इंसान जब काम के लिए अपने परिवार से दूर रहता है, तब भी उसकी  मानसिक स्थिति पर गहरा असर होता है। वे खुद में मायूस रहते हैं, अपनी तकलीफ किसी को बता नहीं पाते, इससे हताश हो जाते हैं, और निराश उन्हें घेर लेती है।

     

    आज इस दुखद घटना के बाद #करण जौहर कहते हैं "ये सिर्फ एक जागरूक सूचना है, आज भी जो दोस्त और परिवार निराशा को एक समस्या नहीं मानते, वे अपनी सोच बदलें और डिप्रेशन को गम्भीरता से लें"

  • 25 Mar
    Oyindrila Basu

    मैथयू रिकार्ड-ख़ुशी आत्मकेंद्रिक मानसिकता से परे हो कर ही मिल सकती है।

    matheu record happiness

     

    69 साल के बौद्ध साधू आज विश्व में खुशहाली happiness के प्रतीक बन चुके हैं। उनका मानना है, खुद से नज़र हटाकर दूसरे की हित में सोचेंगे तो आत्मप्रसन्नता मिलेगी।


    आम लोग जब अपने छोटे-छोटे दुःख और निराशा से परेशान हो कर ख़ुशी की तलाश में घूमते हैं, पर ख़ुशी नसीब नहीं होती, तब मैथयू रिकार्ड ख़ुशी को काबू में कर पाये हैं, इसलिए वह आज सबसे खुश इंसान हैं।


    उन पर वैज्ञानिक शोध द्वारा देखा गया है, कि साधना के समय उनके प्रीफ्रंटल कोर्टेक्स में ज्यादा गतिविधि होती है, और इससे कुछ ऐसे गामा वेव्स उनके दिमाग में उभरते हैं, जिनके द्वारा वह नकारात्मक विचारों को दूर कर पाते हैं, और सकारात्मक विचारों को खुद में बनाये रख पाते हैं।


    मैथयू जी कहते हैं कि

    "हम अकसर ख़ुशी और अभिराम(मजा) में अंतर नहीं कर पातें। जैसे थोड़ी मात्रा में मिठाई स्वाद देती है,परन्तु ज्यादा खाते हैं तो वही कम स्वादिष्ट और नुकसान करती है । ख़ुशी एक मानसिक परिस्थिति है, जो साथ रहती है, और हम कभी उससे परेशान नहीं होते।" 


    रिकार्ड जी हमें खुश रहने के मंत्र बताते हैं:


    1. खुद के बारे में हर वक़्त चिंता करना छोड़ कर दूसरों पर ध्यान दें:

    हम खुद के बारे में इतने परेशान रहते हैं, खुद के हित में छोटी छोटी चीज़ों को पकड़ कर बैठ जाते हैं, तो इससे दिमाग में स्ट्रेस और एंग्जायटी पैदा होती       है, और खुद की उम्मीदों पर खरे न उतर पाने से हमें निराशा होती है। अगर दूसरों के प्रति सहानुभूतिशील होंगे, और उन पर ध्यान देंगे, तो सब आपको पसंद करेंगे, और इससे आपके मन को भी शान्ति मिलेगी।


    2. दिमाग को नियंत्रण में रखें 

    उनके अनुसार हर किसी के अंदर अच्छे बनने की काबिलियत है सिर्फ उसे निखारना ज़रूरी है। इसलिए दिमाग का प्रशिक्षण ज़रूरी है। उसको अच्छी सोच की तरफ ले जाना, अपने अंदर की अच्छे विचारों का अभ्यास करना ही खुशहाली का रास्ता है।
    बाहरी तत्त्व जैसे आज़ादी, उपलब्धि, अमीरी सभी केवल अवसर हैं, दिमाग के अंदर असल बात है, जो हमें ख़ुशी या ग़म देती है, हमारा दिमाग ज्यादा शक्तिशाली है, और वह हमें जैसा महसूस करवाता है, हम वैसा ही महसूस करते हैं, इसलिए दिमाग को काबू में करना ज़रूरी है।


    3. प्राणायाम का नियमित अभ्यास करें 

    इसलिए वह सभी को दिन में 10-15 मिनट के लिए प्राणायाम करने की सलाह देते हैं। इस दौरान अच्छी चीज़ों के बारे में सोचना ज़रूरी है। उनकी किताब "Happiness: A Guide to Developing Life's Most Important skill", से हम सीखते हैं कैसे ख़ुशी को अपने अंदर तैयार किया जाता है।
    रिकार्ड जी को देख कर हम सब को खुशहाली से जीने की प्रेरणा मिलती है, क्योंकि मानसिक संतुष्टि से ही ख़ुशी मिलती है, ये उन्होंने सिद्ध किया है।

    Image source

     

  • 24 Mar
    Oyindrila Basu

    वे बॉलीवुड मूवीज जिन्होनें मानसिक समस्याओं को लेकर जागरूकता बढ़ाई ।

    priyanka chopra

     

    बॉलीवुड विश्व की सब बड़ी फिल्म इंडस्ट्री है, और ये एक ऐसा स्तर हैं, जो हमारे समाज और उनके लोगों को काफी हद तक प्रभावित कर सकता है।
    हर शनि और रविवार को मल्टीप्लेक्स की टिकट विक्रय इसका प्रमाण है।
    हमारी युवा पीढ़ी बॉलीवुड के सितारों से प्रभावित है, यहाँ तक की बुज़ुर्ग और बच्चे भी। बड़ी संख्या में दर्शकों तक पहुँचने का जरिया है ये बॉलीवुड ।
    उनपर गंभीर जिम्मेदारी बनती है कि वह फिल्मों में क्या दिखा रहें है, इससे समाज में अच्छे और बुरे दोनों प्रभाव पड़ते हैं ।
    खुश किस्मती, से आजकल, फिल्मों में काफी परिवर्तन आ रहा है। घर घर की कहानी से हट कर निर्माता समाज के गंभीर मुद्दों पर फिल्म बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे हम रीयलिस्टिक सिनेमा कहते हैं। और इन्हीं में एक मुद्दा है, मानसिक प्रतिबंध।
    समाज में, मानसिक रोगियों को लेकर जो कलंक या हीन भावना है, उसके विरुद्ध लड़ने में बॉलीवुड हमारी मदद करता है।
    बर्फी, तारे ज़मीन पर, ब्लैक, गुज़ारिश, और मार्गरिटा विथ अ स्ट्रॉ जैसी फिल्मों में मानसिक रोग को एक ख़ुशी, एक क्षमता की तरह दिखाया गया है।
    बर्फी में एक गूंगे और बहरे इंसान को हम खुशहाली से ज़िन्दगी बिताते देखते हैं, हँसते मुस्कुराते देखते हैं, तो हमें लगता ही नहीं की ये कोई दुर्बलता हो सकती है। दूसरी तरफ उसी फिल्म में झिलमिल जो की एक ऑटिस्टिक लड़की हैं, प्यार और रिश्तों की परिभाषा बताती है। और जब ये चरित्र हमारे पसंदीदा कलाकार रणबीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा निभा रहे हैं, तो हमें ये मानसिक बीमारी कलंकित नहीं लगता। उनका मज़ाक बनाने के बजाए, उनसे जुड़ जाते हैं, और हमदर्दी से हम फिल्म को और अभिनेताओं को सराहते हैं।
    पर अच्छी बात यह है, की मानसिक रोग के प्रति हमारा नजरिया बदलता है।


    guzaarishगुज़ारिश में ह्रितिक रोशन एक अद्भुत जादूगर की भूमिका में नज़र आते हैं, जिनको व्हील चेयर ने जकड़ लिया है, और इसलिए वे खुद ज़िन्दगी को अलविदा कहना चाहते हैं, पर ख़ास है, उनका रवैया। ज़िन्दगी के आखिरी दिन तक, वह सम्राट की तरह जीतें हैं, और ज़िन्दगी का मज़ा उठाना किसे कहते है, हमें बताते हैं।
    मानसिक या शारीरिक रूप से दुर्बल व्यक्ति हम और आप की तरह आम इंसान हैं, वह भी सांस लेते हैं, जीना चाहते हैं, उनके जज़्बात अलग नहीं है, ये हमें बॉलीवुड की फिल्में खुले स्वभाव से बताती हैं।


    taare zameen par"तारे ज़मीन पर" एक ऐसी फिल्म है, जिसमें Dyslexia जैसी बीमारी पर चर्चा की गई है, और ये शिक्षक और माता-पिता को एक सीख देती है, की बच्चों को समझकर उनकी सहायता करनी चाहिए। अव्वल आने की दौड़ में धकेलना गलत है, और जब आमिर खान जैसे सितारे हमें सीख देते हैं, तो हमें अवश्य सही लगता है। :)
    ये कहना गलत नहीं होगा, की फिल्मों की सफलता, हमारी हमदर्दी से जुड़ी होती हैं, पर अगर इस हमदर्दी से हम कुछ नया सीखते हैं, और समाज में सुधार आता है, तो यह बिलकुल गलत नहीं है।
    लगान जैसी कुछ फिल्मों में विकलांगता को हथियार बनाया गया है, जहां फिल्म का एक पात्र कचरा, पोलियो की वजह से लूला है, अपंग है, पर उसकी यही क्षमता, उसे अच्छा स्पिन बॉलर बनाती है, और मैच में जीत हासिल होती है।


    u me aur humयू मी और हम, Alzeimer’s Disease से जुडी समस्याओं को दर्शाता है, लेकिन एक रोगी को आपकी सहायता की ज़रूरत है, धैर्य की ज़रूरत है, ये भी हम वहीँ से समझ पाते हैं।
    बॉलीवुड की सफलता आज सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, कुवैत, और अमरीका जैसे देशों में भी फैला हुआ है। इस लिए, हर प्रकार के समाज में एक जागरूकता लाना, एक नई सोच को शुरू करना फिल्मों का नैतिक कर्त्तव्य है।
    इस प्रचेष्टा में बॉलीवुड आज तक सफल रही है, और हम आशा करते हैं, आने वाले दिनों में भी, बॉलीवुड ऐसे मुद्दों पर समाज में जागरूकता फ़ैलाने का काम करेगा।

  • 24 Mar
    Oyindrila Basu

    हनी सिंह और बाइपोलर डिसऑर्डर

    honey singh

     

    हम सभी ने कभी न कभी 'लुंगी डांस' और 'पार्टी शूज' जैसे गानों  पर पैर थिरकाया है। ऐसे कई अनगिनत गाने हैं, जिन पर उनके शब्दों ने कुछ ऐसा जादू बिखेरा, कि हर एक क्लब में सिर्फ उन्ही का नाम चर्चा में रहा। जी हाँ हम बात कर रहे हैं, पंजाब दा मुंडा, यो हनी सिंह जी की, जिन्होंने कुछ ही समय में सफलता की उन ऊंचाइयों को छुआ है, जहाँ बड़े बड़े संगीतकार भी उन्हें ईर्षा के पात्र बनाते हैं।

    हनी सिंह जी के गानों ने, अच्छे संगीत की परिभाषा ही बदल दी। गाना यानी, ताल, और उन पर शब्दों का खेल, यही है, हनी सिंह के रैप गाने। ये ताल का चक्कर युवा पीढ़ी पर खूब चला, और यो यो हनी सिंह हर कॉन्सर्ट और लाइव शो के पसंदीदा सितारे बन गए।

    लेकिन क्या काफी समय से हम वह सुर, वह ताल मिस नहीं कर रहे? जी हाँ, लगभग दो सालों से हनी सिंह जी इस शान-ओ शौकत से गायब हैं।

    अचानक उन्होंने संगीत से, बिना किसी को कुछ बताये विराम ले लिया। और आज 18 महीनों के बाद वे अपनी समस्या के साथ मीडिया के सामने आएं, और स्वीकारा, कि उन्हें बाइपोलर डिसऑर्डर था, और वे नशेड़ी थे, जिसकी वजह से घर तो क्या कमरे से भी नहीं निकल पाते थे।

    नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेन्टल हेल्थ बताता है, कि बाइपोलर डिसऑर्डर का मतलब है, एक ऐसी मानसिक स्थिति जिसमें इंसान का मूड, या मिज़ाज घड़ी घड़ी बदलता है, वह समाज से डरता है, और शंका में जीता है। शराब और नशेड़ी चीज़ों से ये समस्या बढ़ सकती है।

    "वह 18 महीने मेरी ज़िन्दगी के सबसे अँधेरे दिनों में से थे, और मैं किसी से बात करने की स्थिति में नहीं था”, हनी सिंह बताते हैं।

    अजीब लगता है, हंसमुखता के प्रतीक दिखने वाले एक संगीतकार जब खुद को मानसिक रोगी बताते हैं।

    ये रोग उनकी निजी ज़िन्दगी को तो नुकसान पहुंचा ही रहा था, साथ ही में उनके काम पर भी असर कर रहा था।

    "मैं कमरे से बाहर नहीं आ सकता था। मुझे डर लगता था की ये अन्धेरा मेरे साथ हमेशा रह जाएगा। मैंने दिनों तक बाल नहीं बनाये थे, दाढ़ी नहीं बनाई थी, किसी से मिलने में झिझक होती थी, जो इंसान 20,000 लोगों के सामने जाता था, आज 4-5 लोगों से मिलने में भी कतराता था", अपने अनुभव से बताते हैं हनी सिंह।

    पर अच्छी बात यह है, की वह खुद को इस पीड़ा से बाहर लाने की कोशिश कर रहे हैं, इसीलिए उन्होंने मीडिया से मिलकर अपना हाल-बयान किया। एक स्टार के लिए मानसिक रोग को स्वीकारना आसान बात नहीं है, पर सच को मानने से ही उसका समाधान हो सकता है।

    18 महीनों में उन्होंने 4 अलग डॉक्टरों से जाँच करवाई की, और आज उनकी तबीयत में जो सुधार आया है, वह उनके मनोबल का नतीजा है।

    कहते है, कला में इंसान की खूबसूरती ज़ाहिर होती है। जीवन के मुश्किल क्षण में भी, उनका संगीत उनके साथ था, शायद संगीत ही वह प्रेरणा है, जिससे वे आज उबर पाये हैं।

    "एक दिन जब नींद की गोलियों से भी नींद ना आई, तब मैंने एक गाना "राईस एंड शाइन" लिखा और उस पर संगीत बनाया,   मैंने अपनी माँ के दिल को बहुत दुखाया, आज मैं जो भी हूँ उनकी वजह से हूँ", यो यो कहते हैं।

    तभी हम आशा करते हैं की जल्द ही हम हनी सिंह को फिर से बीट बजाते देख पाएंगे, और उनके गाने देसी और अंग्रेजी हर गाने की लिस्ट को टॉप करेंगे। ये अल्पविराम जल्द ही खत्म होने को है, और आगे सिर्फ वह होंगे, उनके ताल होंगे और म्यूजिक चैनल पर एक ही शोर होगा, "यो यो हनी सिंगा"

  • 13 Mar
    Oyindrila Basu

    मेरा देश बदलेगा, आगे बढ़ेगा

    indian painting

     

     "ऑफिस में मेरा दूसरा ही दिन था। काफी चीज़ें समझना अभी बाकी था। अचानक बॉस का कॉल आया। मैं उनके केबिन में गयी, तो उन्होंने दरवाज़ा बंद कर दिया। और अचानक मुझे अपने करीब खींच कर मुझसे कहने लगे, 'आज रात मेरे घर कॉफ़ी पीने के लिए आओगी ? अगर आओगी, तो हम खूब मज़ा करेंगे, और एक हफ्ते में तुम्हारी प्रमोशन भी पक्की है'...

    कुछ देर के लिए, मेरा दिमाग सुन्न हो गया, मुझ पर परिवार की जिन्मेदारी थी, नौकरी अहम थी, पर ये क्या हो रहा था! लेकिन मुझ में अचानक एक शक्ति आई, मैंने उसे धक्का मार कर चेयर पर गिरा दिया, और झट से जाकर दरवाज़ा खोल दिया, ताकि सब देख सकें, फिर बॉस के करीब जा कर, उसके डेस्क से गिलास उठाया और पानी उसके मुंह पर मार दिया। ऑफिस में सब मुझे साहस के लिए वाह वाही देने लगे, पर साथ में ये भी कहते- 'बड़ी कंपनी में, लड़कियों के साथ छेड़छाड़ तो आम बात है, साधारण है.. पर मैं किसी भी अन्याय को साधारण अवस्था का नाम देकर सह नहीं सकती थी..",

     

    अपने चारो ओर घट रही कई घटनाओं को हम 'आम बात' कह कर उसे स्वीकार लेते हैं। अगर सही नहीं भी है, तो भी हम उसे बदलने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि यह शायद पीढ़ियों से होता आ रहा है, और समाज में, उसे बदला नहीं गया है।

    जातिवाद, दहेज़, यौन शोषण, नारी-भ्रूण हत्या, सांप्रदायिकता, छेड़छाड़ ऐसे ही कई सामाजिक कलंक हैं, जिसका हम प्रतिरोध नहीं करते।

    लड़की को सड़क पर छेड़ा जाता है, तो माँ उसे शिकायत दर्ज करने से मना करती है, 'ये तो आम बात है' कहकर नकार देती है।

    शादी में ऊँची दहेज़ की मांग को 'रिवाज़' और 'आम' तोहफे का नाम देकर समाज में चलाया जाता है, और गैर कानूनी होने के बावजूद, कोई इसके खिलाफ कुछ नहीं बोलता, कहते हैं कि 'ये तो आम बात है'...

     

    किसी भी घटना को हम 'आम' या साधारण कैसे बताते हैं?

     

    १. अगर ये घटना एक चलन है, और किसी ने इसे बदला नहीं है, और हम भी इसका अभ्यास करते हैं।

     

    २. अगर किसी घटना या धारणा को हमारी स्वीकृति मिलती है, और वह भी काफी वक़्त से, तो वह बात 'आम' या साधारण बन जाती है।

     

    अपने सहनशीलता को, इतना भी ना बढ़ने दें, की गलत चीज़ें भी आप को आम लगने लगे। जो बातें, आप को खटक रही हैं, उसे न स्वीकारें, उनका विरोध करें।

    छेड़छाड़ के विरुद्ध हमेशा शिकायत दर्ज करना चाहिए, ताकि, बाद में समस्या ज्यादा गंभीर न हो।

    आपकी चुप्पी समाज में घूम रहे बदमाशों और उनकी बदमाशियों को बढ़ावा देगी ।

    हमारा भारत, 'असहनशील' बुलाये जाने पर भड़क उठता है, पर आज भी सम्मान रक्षा हेतु हत्या को, 'साधारण' मान कर उसे स्वीकार लेता है।

    एक लड़की समझती है, कि परिवार की मर्यादा भंग न हो, और यह उसका ही कर्तव्य है, क्योंकि वही 'आम तौर से' होता है। ऐसी कई गलत धारणाओं को समाज में 'आम बात' के नाम से माना जाता है ।

    शायद सच ही कहा है अंदलीब वाजिद जी ने - "मैं कभी भी किसी बात को साधारण मानकर नहीं चल पाऊंगी"

    इस बात पर हमें याद आती है फिल्म 'टू स्टेट्स' की अनन्या, जो दहेज़ के खिलाफ जाती है, और ड्यूक को ये एहसास दिलाती है, कि सिर्फ लड़का होना ही किसी की काबिलियत नहीं हो सकती। इसलिए लड़के को दहेज़ में गाड़ी और बंगला मिले, 'यह आम बात नहीं है'

    और हमें याद आता है 'पी के' फिल्म के आमिर जी, जो हमें ये अहसास कराते हैं, कि धर्म चलता है वेशभूषा से, मूर्ति की पूजन से। हिन्दू साड़ी पहनेगी, मुसलमान सर पर जाली टोपी पहनेगा, इन धारणाओं को ही हम 'आम तौर पर' धर्म के साथ जोड़ते हैं। पर अगर इन्हें बदल दिया जाये, तो हम लोगों में फर्क नहीं कर पाएंगे।

    ऐसी कोशिशों की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है।

    किसी महान व्यक्ति नें सच कहा है, कि अगर आप साधारण के ऊपर देखेंगे नहीं, तो खुद में असाधारण क्षमता आपको दिखेगी नहीं

    हार का सामना करना अच्छी बात है। पर ये मान लेना कि आप साधारण हैं, और कभी जीत नहीं सकते, ये बुरी बात है।

    हमेशा समाज की भीड़ में, घुले रहना ज़रूरी नहीं है। अपने सिद्धांतों पर भरोसा रखें।

    अगर आपकी कोशिश साधारण से ऊँची होगी, तो आप खुद को एक बेहतर स्तर पर पाएंगे। लाख बाधाओं के बावजूद आज तस्लीमा नसरीन जी समाज में घट रही बुरी घटनाओं के विरुद्ध डट कर लिखतीं है। अगर उनके प्रति भारतीय समाज के रवैये को वह 'आम घटना' मानकर, हार स्वीकार कर लेतीं, तो आज वे विश्व विख्यात लेखिका नहीं होतीं।

    अपने आप को आगे ले जाने के लिए, साधारण चीज़ों को एक दूसरे नज़रिये से देखें, अगर वह सही नहीं है, तो उनका विरोध करें, खुद की क्षमता को असाधारण बनाने की कोशिश हमेशा करते रहे, ये ठान लें, कि आप कर सकते हैं।

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