कुल 30 कहानियाँ

  • 11 Apr
    Oyindrila Basu

    अनंत अम्बानी-असम्भव को संभव करना जिन्होंने अपनी माँ से सीखा

    anant ambani weight loss

     

    मुकेश अम्बानी के छोटे बेटे, अनंत अम्बानी आज एक स्वस्थ इंसान हैं, उन्होंने १८ महीने में १०८ किलो तक वज़न घटाया है। अविश्वसनीय है! उन्होंने मीडिया में फैले लाइपो-सर्जरी जैसे अफवाहों  को भी नकार दिया है।

    उन्होंने पूरी ईमानदारी से, और मेहनत से ये बदलाव हासिल किया है। योगा, व्यायाम और कार्डिओ-वैस्कुलर परिश्रम से उन्होंने अपने अधिक वज़न को प्राकृतिक तरीके से काम किया है।

    पर ये उन के लिए आसान नहीं था। किसी भी नए काम की  आदत डालने में ही 3 महीने से ज्यादा का समय लगता है, वहीँ उन्होंने 18 महीने में आश्चर्यजनक फल भी हासिल किया ।

    हमारा समाज भी किसी के बढे-या घटे वजन को लेकर मजाक उड़ाने से चूकता नहीं है। अनन्त और उनके भाई आकाश भी ऐसे मीडिया के प्रहार से वंचित नहीं थें।

    Twitter पर उनके वज़न को लेकर चुटकुले बनाये जाते थे।

    वज़न कम करना हमारे बस में नहीं होता है । यह  एक शारीरिक समस्या है, और उस पर विशेष समाधान करने के बजाय समाज का काम ही है उसका मज़ाक बनाना, समस्या पर हंसना।

    एक बार सर रविन्द्र जडेजा लिखते हैं, "रेड अलर्ट- यहां भूकम्प आनेवाला है, क्योंकि आकाश अम्बानी मुंबई इंडियन्स की जीत के बाद, स्टेडियम में झम्पिंग-झपांग करने वाले हैं। " इस ट्वीट को 250 बार दोहराया गया।

    इन कमेंट्स के बावजूद अनंत डटे रहे, और अपने हौसले को टूटने नहीं दिया।

    उन्हें Hypothyroid की समस्या थी जो शरीर को सुस्त और कमज़ोर कर देता है, अधिक वज़न बढ़ा देता है। अनंत को अस्थमा भी था, और उसी की चिकित्सा के दौरान अनंत को यह रोग लगा।

    अपनी शारीरिक दुर्बलता को हराकर उन्होंने व्यायाम का रास्ता अपनाया, ये प्रशंसनीय है।

    और इसमें उनकी माँ नीता अम्बानी का बहुत बड़ा हाथ है। एक माँ होने के नाते  उन्होंने अनंत का हमेशा साथ दिया। एक इंटरव्यू में नीता कहती हैं "बच्चे माँ को देख कर ही सीखते हैं। जब मैंने देखा अनंत का वज़न अस्वाभाविक है, और उसे वेट लॉस करना पड़ेगा, तब मैंने भी व्यायाम करने का फैसला किया। वे कहीं वाक पर जाता था, तो मैं भी उसके साथ जाती थी। मैं एक्सरसाइज करती थी, तो वह भी करता था। और इस प्रकार से मैंने हर पल उसका साथ दिया, उसे वज़न घटाने के लिए प्रेरित किया। और मेरा भी वज़न घट गया। "

    एक माँ का फ़र्ज़ है बच्चे को सीखना, उसके लिए प्रेरणा बनना। और नीता जी ने अपना कर्तव्य पूर्ण रूप से निभाया।

    दोनों ने मिल कर वज़न से सम्बंधित समस्या को दूर भगाया।

    आज twitter पर अनंत को बधाइयां मिल रही है। सलमान खान से ले कर धोनी तक सब उनके जज़्बे से प्रेरित हैं। उनका हौसला और खुद पर विश्वास देखने लायक है, और उसी से उन्होंने आज भाग्य को अपने हक़ में किया है।

  • 06 Apr
    Oyindrila Basu

    इमरान हाशमी-अयान के सुपर हीरो

    imran hashmi

     

     

    अविश्वसनीय है, जिस तरह एक बेहतरीन अभिनेता अपने बच्चे को कैंसर से बचाने के लिए सुपर हीरो के किरदार में आते हैं।

    "मेरी बात ध्यान से सुनो, वक़्त लगेगा, लेकिन एक बार हम ये कर पाएं, तो तुम आयरन मैन से भी बेहतर सुपर हीरो बन जाओगे", ऐसा इमरान हाश्मी अपने बच्चे से कहते थें।

    किसे 'बेहतर' बनना था? क्यों? और कैसे? क्या सुपर हीरो जैसा सच में कुछ होता है?

    कहते हैं विश्वास करने से भगवान् भी मिल जाते हैं, नहीं तो बहस करते ही रहे जाएंगे हम।

    इमरान हाश्मी अपने बच्चे के लिए उस भरोसे, उस विश्वास का आधार बन कर आएं।

    उनका बेटा अयान, ४-साल की कच्ची उम्र में कैंसर का शिकार है। उसकी किडनी में एक अजीब ट्यूमर पाया गया था, जिसका नाम है Wilms' Tumor  जो एक जर्मन डॉक्टर के नाम पर पड़ा है। अफ्रीका में होने वाली ये बीमारी बच्चों को ज्यादा प्रभावित करती है।

    हमने पिछले लेख में बताया है कैसे इस बीमारी से लड़ने का एक तरीका, उसे सुपर विलन बनाना हो सकता है। खुद को सुपर हीरो मान कर कैंसर से मुक़ाबला करेंगे, तो इस बीमारी का डट कर सामना किया जा सकता है।

    यही किया #मर्डर के अभिनेता इमरान हाश्मी ने। बच्चे को बैटमैन और सुपरमैन जैसे अवतार पसंद है, और ये जानते हुए उन्होंने खुद को बैटमैन बना कर प्रस्तुत किया, और बच्चे को भी समझाया की अगर वह हिम्मत और मज़बूती से कैंसर से लड़ेगा तो वह भी स्वस्थ हो कर, सारे सुपर हीरो से बेहतर बन जाएगा, अयान मैन बन कर वह सर्व श्रेष्ठ कहलायेगा।

    ये हम सब को प्रोत्साहन देता है। कैसे एक पिता जो खुद दुःख और तकलीफ से पीड़ित है, अपने बच्चे के बारे में ज्ञात होने से परेशान है, कैसे वे अपनी परेशानी को परे रख कर अपने बच्चे के साथ खड़े हैं, और उसे हिम्मत दिला रहा है । 

    उनका मानना है कि जो इंसान अपनी ज़िन्दगी ज़िम्मेदारी और मज़बूती से जीतता है वही असल सुपर हीरो है।

    "अयान का कैंसर मेरी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी चुनौती है। मुझे उसके लिए सुपर मैन, बैटमैन और वह सारे किरदार बनने होंगे जिससे उसे हिम्मत और ख़ुशी मिले", ऐसा इमरान बताते हैं।

    लेकिन धैर्य से हर जंग जीता जा सकता है। अपने जज़्बातों पर काबू पा कर आगे बढ़ते रहने से ही समस्या का समाधान हो सकता है, और ये इमरान साबित कर चुके हैं। अयान अपने पिताजी से हिम्मत और शक्ति पाता है, जिससे वह कैंसर के दानवीय चुंगल से भी मुक्त हुआ है। हम दोनों के लिए अच्छा जीवन और अच्छी मानसिक स्वास्थ्य की कामना करते हैं।

  • 04 Apr
    Oyindrila Basu

    प्रत्युषा बनर्जी-क्या अवसाद उनकी आत्महत्या का कारण बना?

    pratyusha banerjee suicide

     

    #बालिका वधु-कच्ची उम्र के पक्के रिश्ते, Colours TV पर आने वाला ये शो, बेहद लोकप्रिय हुआ और इसके माध्यम से इंडियन टेलीविज़न इंडस्ट्री को कई नए चेहरे, और कई नए कलाकारों  से परिचय कराने का मौका मिला। नई प्रतिभा जो उभर कर सामने  आई थीं , उनमें एक थी हमारी नयी #आनंदी, यानी जमशेदपुर की प्रत्युषा बनर्जी जिसे भारत की आम जनता ने अपनी बेटी बनाया, और कुछ ही दिनों में ये लड़की हर घर की लाडली बन गयी।

    रातों रात सफलता मिली, उसने कई सीरियल में काम किया, #बिग बॉस में भाग लिया जिससे उसकी लोकप्रियता और बढ़ गयी।

    उसके दोस्त और सहयोगी बताते हैं की वो काफी हंसमुख थीं। Twitter और Instagram पर हमेशा उसके पोस्ट्स आते थे। तो फिर ऐसा क्या हुआ कि, इतनी  कम उम्र में प्रत्युषा ज़िन्दगी से मायूस हो कर आत्महत्या की ओर चली?

    1 अप्रैल को उसके अपार्टमेंट में पुलिस को  सीलिंग से लटकती प्रत्युषा मिली । ये घटना आश्चर्य जनक थी, कोई यकीन नहीं कर पा रहा था, फिल्म और टेलीविज़न की जानी-मानी हस्तीं भी इस दुखद घटना से परेशान  थे।

    लेकिन प्रत्युषा ने ऐसा क्यों किया?

    उनके दोस्त उन्हें आज भी हंसती-खेलती, फुदकती प्रत्युषा के रूप में ही पहचानते हैं, लेकिन काफी दिनों से उन्होंने सब से दूरी बना ली थी। किसी से बात नहीं करती थीं।

    सोशल नेटवर्क पर भी नहीं आती थीं ।

    डॉक्टर श्याम मिथिया बताते है, "जब कोई इंसान अपने जान पहचान वालों से दूर हो जाता है, इसका मतलब वह किसी मानसिक समस्या से जूझ रहा है, और जब ये एक सेलिब्रिटी करता है, तो और भी अस्वाभाविक है, क्योंकि वे लाइमलाइट में रहने के आदी हैं, सब से घुलना मिलना यही उनकी ज़िन्दगी है, तो ऐसे में कोई एक दम से चुप हो जाता है, तो साफ़ है कि वह  निराश है, परेशान है"

     

    प्रत्युषा की ज़िन्दगी में, उसके राहुल सिंह के साथ सम्बन्धों को लेकर कुछ समस्या थी। वे उनसे शादी करने वाली थी, लेकिन कुछ हफ्ते पहले उन्होंने Twitter पर कहा, "मर कर भी तुझसे मुंह ना मोड़ेंगे", जिससे साफ़ पता चलता है वे अभिमान और उदासी में ऐसा कह रहीं थीं।

    कुछ महीने पहले उन्होंने कुछ लड़कों पर अश्लील व्यवहार का आरोप लगाया था। उनके साथ कुछ न कुछ समस्या आ ही रही थी।

    लेकिन एक इंसान हताश के किस मक़ाम पर पहुंचकर ज़िन्दगी को ही खत्म करना चाहता  है, ये हम शायद समझ ना पाएं।

    डॉक्टर मिथिया बताते हैं "जब कोई WhatsApp पर कुछ पोस्ट करता है, तो वह किसी न किसी प्रकार से उससे जुड़ा हुआ होता है, वे खुद को उस बात से संबंधित कर सकते हैं, इसलिए पोस्ट करते हैं"

    अगर कोई गाने के बोल भी हम पोस्ट करते हैं इसका मतलब यही होता है कि या वह बोल हमारी स्थिति को बेहतर बयान करते हैं, या फिर वह हमें पसंद है, और हम दुनिया को ये बात बताना चाहते हैं।

    कोई इंसान जब काम के लिए अपने परिवार से दूर रहता है, तब भी उसकी  मानसिक स्थिति पर गहरा असर होता है। वे खुद में मायूस रहते हैं, अपनी तकलीफ किसी को बता नहीं पाते, इससे हताश हो जाते हैं, और निराश उन्हें घेर लेती है।

     

    आज इस दुखद घटना के बाद #करण जौहर कहते हैं "ये सिर्फ एक जागरूक सूचना है, आज भी जो दोस्त और परिवार निराशा को एक समस्या नहीं मानते, वे अपनी सोच बदलें और डिप्रेशन को गम्भीरता से लें"

  • 25 Mar
    Oyindrila Basu

    मैथयू रिकार्ड-ख़ुशी आत्मकेंद्रिक मानसिकता से परे हो कर ही मिल सकती है।

    matheu record happiness

     

    69 साल के बौद्ध साधू आज विश्व में खुशहाली happiness के प्रतीक बन चुके हैं। उनका मानना है, खुद से नज़र हटाकर दूसरे की हित में सोचेंगे तो आत्मप्रसन्नता मिलेगी।


    आम लोग जब अपने छोटे-छोटे दुःख और निराशा से परेशान हो कर ख़ुशी की तलाश में घूमते हैं, पर ख़ुशी नसीब नहीं होती, तब मैथयू रिकार्ड ख़ुशी को काबू में कर पाये हैं, इसलिए वह आज सबसे खुश इंसान हैं।


    उन पर वैज्ञानिक शोध द्वारा देखा गया है, कि साधना के समय उनके प्रीफ्रंटल कोर्टेक्स में ज्यादा गतिविधि होती है, और इससे कुछ ऐसे गामा वेव्स उनके दिमाग में उभरते हैं, जिनके द्वारा वह नकारात्मक विचारों को दूर कर पाते हैं, और सकारात्मक विचारों को खुद में बनाये रख पाते हैं।


    मैथयू जी कहते हैं कि

    "हम अकसर ख़ुशी और अभिराम(मजा) में अंतर नहीं कर पातें। जैसे थोड़ी मात्रा में मिठाई स्वाद देती है,परन्तु ज्यादा खाते हैं तो वही कम स्वादिष्ट और नुकसान करती है । ख़ुशी एक मानसिक परिस्थिति है, जो साथ रहती है, और हम कभी उससे परेशान नहीं होते।" 


    रिकार्ड जी हमें खुश रहने के मंत्र बताते हैं:


    1. खुद के बारे में हर वक़्त चिंता करना छोड़ कर दूसरों पर ध्यान दें:

    हम खुद के बारे में इतने परेशान रहते हैं, खुद के हित में छोटी छोटी चीज़ों को पकड़ कर बैठ जाते हैं, तो इससे दिमाग में स्ट्रेस और एंग्जायटी पैदा होती       है, और खुद की उम्मीदों पर खरे न उतर पाने से हमें निराशा होती है। अगर दूसरों के प्रति सहानुभूतिशील होंगे, और उन पर ध्यान देंगे, तो सब आपको पसंद करेंगे, और इससे आपके मन को भी शान्ति मिलेगी।


    2. दिमाग को नियंत्रण में रखें 

    उनके अनुसार हर किसी के अंदर अच्छे बनने की काबिलियत है सिर्फ उसे निखारना ज़रूरी है। इसलिए दिमाग का प्रशिक्षण ज़रूरी है। उसको अच्छी सोच की तरफ ले जाना, अपने अंदर की अच्छे विचारों का अभ्यास करना ही खुशहाली का रास्ता है।
    बाहरी तत्त्व जैसे आज़ादी, उपलब्धि, अमीरी सभी केवल अवसर हैं, दिमाग के अंदर असल बात है, जो हमें ख़ुशी या ग़म देती है, हमारा दिमाग ज्यादा शक्तिशाली है, और वह हमें जैसा महसूस करवाता है, हम वैसा ही महसूस करते हैं, इसलिए दिमाग को काबू में करना ज़रूरी है।


    3. प्राणायाम का नियमित अभ्यास करें 

    इसलिए वह सभी को दिन में 10-15 मिनट के लिए प्राणायाम करने की सलाह देते हैं। इस दौरान अच्छी चीज़ों के बारे में सोचना ज़रूरी है। उनकी किताब "Happiness: A Guide to Developing Life's Most Important skill", से हम सीखते हैं कैसे ख़ुशी को अपने अंदर तैयार किया जाता है।
    रिकार्ड जी को देख कर हम सब को खुशहाली से जीने की प्रेरणा मिलती है, क्योंकि मानसिक संतुष्टि से ही ख़ुशी मिलती है, ये उन्होंने सिद्ध किया है।

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  • 24 Mar
    Oyindrila Basu

    वे बॉलीवुड मूवीज जिन्होनें मानसिक समस्याओं को लेकर जागरूकता बढ़ाई ।

    priyanka chopra

     

    बॉलीवुड विश्व की सब बड़ी फिल्म इंडस्ट्री है, और ये एक ऐसा स्तर हैं, जो हमारे समाज और उनके लोगों को काफी हद तक प्रभावित कर सकता है।
    हर शनि और रविवार को मल्टीप्लेक्स की टिकट विक्रय इसका प्रमाण है।
    हमारी युवा पीढ़ी बॉलीवुड के सितारों से प्रभावित है, यहाँ तक की बुज़ुर्ग और बच्चे भी। बड़ी संख्या में दर्शकों तक पहुँचने का जरिया है ये बॉलीवुड ।
    उनपर गंभीर जिम्मेदारी बनती है कि वह फिल्मों में क्या दिखा रहें है, इससे समाज में अच्छे और बुरे दोनों प्रभाव पड़ते हैं ।
    खुश किस्मती, से आजकल, फिल्मों में काफी परिवर्तन आ रहा है। घर घर की कहानी से हट कर निर्माता समाज के गंभीर मुद्दों पर फिल्म बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे हम रीयलिस्टिक सिनेमा कहते हैं। और इन्हीं में एक मुद्दा है, मानसिक प्रतिबंध।
    समाज में, मानसिक रोगियों को लेकर जो कलंक या हीन भावना है, उसके विरुद्ध लड़ने में बॉलीवुड हमारी मदद करता है।
    बर्फी, तारे ज़मीन पर, ब्लैक, गुज़ारिश, और मार्गरिटा विथ अ स्ट्रॉ जैसी फिल्मों में मानसिक रोग को एक ख़ुशी, एक क्षमता की तरह दिखाया गया है।
    बर्फी में एक गूंगे और बहरे इंसान को हम खुशहाली से ज़िन्दगी बिताते देखते हैं, हँसते मुस्कुराते देखते हैं, तो हमें लगता ही नहीं की ये कोई दुर्बलता हो सकती है। दूसरी तरफ उसी फिल्म में झिलमिल जो की एक ऑटिस्टिक लड़की हैं, प्यार और रिश्तों की परिभाषा बताती है। और जब ये चरित्र हमारे पसंदीदा कलाकार रणबीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा निभा रहे हैं, तो हमें ये मानसिक बीमारी कलंकित नहीं लगता। उनका मज़ाक बनाने के बजाए, उनसे जुड़ जाते हैं, और हमदर्दी से हम फिल्म को और अभिनेताओं को सराहते हैं।
    पर अच्छी बात यह है, की मानसिक रोग के प्रति हमारा नजरिया बदलता है।


    guzaarishगुज़ारिश में ह्रितिक रोशन एक अद्भुत जादूगर की भूमिका में नज़र आते हैं, जिनको व्हील चेयर ने जकड़ लिया है, और इसलिए वे खुद ज़िन्दगी को अलविदा कहना चाहते हैं, पर ख़ास है, उनका रवैया। ज़िन्दगी के आखिरी दिन तक, वह सम्राट की तरह जीतें हैं, और ज़िन्दगी का मज़ा उठाना किसे कहते है, हमें बताते हैं।
    मानसिक या शारीरिक रूप से दुर्बल व्यक्ति हम और आप की तरह आम इंसान हैं, वह भी सांस लेते हैं, जीना चाहते हैं, उनके जज़्बात अलग नहीं है, ये हमें बॉलीवुड की फिल्में खुले स्वभाव से बताती हैं।


    taare zameen par"तारे ज़मीन पर" एक ऐसी फिल्म है, जिसमें Dyslexia जैसी बीमारी पर चर्चा की गई है, और ये शिक्षक और माता-पिता को एक सीख देती है, की बच्चों को समझकर उनकी सहायता करनी चाहिए। अव्वल आने की दौड़ में धकेलना गलत है, और जब आमिर खान जैसे सितारे हमें सीख देते हैं, तो हमें अवश्य सही लगता है। :)
    ये कहना गलत नहीं होगा, की फिल्मों की सफलता, हमारी हमदर्दी से जुड़ी होती हैं, पर अगर इस हमदर्दी से हम कुछ नया सीखते हैं, और समाज में सुधार आता है, तो यह बिलकुल गलत नहीं है।
    लगान जैसी कुछ फिल्मों में विकलांगता को हथियार बनाया गया है, जहां फिल्म का एक पात्र कचरा, पोलियो की वजह से लूला है, अपंग है, पर उसकी यही क्षमता, उसे अच्छा स्पिन बॉलर बनाती है, और मैच में जीत हासिल होती है।


    u me aur humयू मी और हम, Alzeimer’s Disease से जुडी समस्याओं को दर्शाता है, लेकिन एक रोगी को आपकी सहायता की ज़रूरत है, धैर्य की ज़रूरत है, ये भी हम वहीँ से समझ पाते हैं।
    बॉलीवुड की सफलता आज सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, कुवैत, और अमरीका जैसे देशों में भी फैला हुआ है। इस लिए, हर प्रकार के समाज में एक जागरूकता लाना, एक नई सोच को शुरू करना फिल्मों का नैतिक कर्त्तव्य है।
    इस प्रचेष्टा में बॉलीवुड आज तक सफल रही है, और हम आशा करते हैं, आने वाले दिनों में भी, बॉलीवुड ऐसे मुद्दों पर समाज में जागरूकता फ़ैलाने का काम करेगा।