कुल 30 कहानियाँ

  • 05 May
    Janhavi Dwivedi

    अभिभावकों के लिए कोटा के जिला कलेक्टर का भावनात्मक पत्र

    kota suicide

    The Hindu/ Representative Image

    प्यारे अभिभावकों,

    कोटा शहर की तरफ से मुझे इस वन्डरफुल शहर में आपके बच्चे का स्वागत करने का मौका मिला है ,जो देश के युवा मस्तिष्क का विकास करता है ,और आधुनिक भारत का आर्किटेक्ट बनने के लिए उनके पैशन को शक्ति देता है।

    इस पत्र की शुरुआत में आपसे मेरा विनम्र अनुरोध है कि कुछ समय निकालकर धैर्य के साथ मेरे इस पत्र को पढ़ें, बेहतर होगा यदि माता-पिता दोनों एक साथ इसे पढ़ सकें।

    हर अभिभावक का सपना होता है, अपने बच्चे को सफलता के शिखर पर देखना जहां पहुंचना हर किसी के बस की बात नहीं होती। हर अभिभावक बच्चे के मन में एक बीज रोपता है जो समय आने पर फल देता है, लेकिन सावधानी पूर्वक पोषण और देखभाल के बाद क्योंकि बीज इतना कोमल होता है कि देखभाल में कोई भी चूक हमें हमारे सपने को प्राप्त करने में असफल कर सकती है।

    माता -पिता के लिए ये बहुत कठिन परिस्थिति होती है, कि अपने बच्चे को ऐसी जगह पर छोड़ना जहां वे नहीं रहते हैं।  और ज्यादा मुश्किल तब होती है जब बच्चे को छोड़ने का उद्देश्य शिक्षा में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए समर्पित और वचनबद्ध प्रयास हो।

    जब माता-पिता बड़े-बड़े बिल बोर्ड, होर्डिंग्स और न्यूजपेपर में खूबसूरत जवां बच्चों की तस्वीरें देखतें हैं जिन्होंने वह उपलब्धि हासिल कर ली है, जिसके सपने वे अपने बच्चे के लिए देखते हैं, तो बच्चे को प्रेरित करने का संकल्प और बढ़ जाता है।

    हो सकता है अच्छी आमदनी और जीवन स्तर में निश्चित गारंटी के मामले में इंजीनियरिंग और मेडिकल के क्षेत्र में अच्छा कैरियर हो।

    मैं वास्तव में यह सोचता हूँ कि ज्यादातर मामलों में यही कारण है, जिससे हम बच्चों के लिए इन कैरियरों के सपने देखते हैं।

    अपने बच्चे के लिए कुछ सुनिश्चित कैरियर गारंटी, के बारे सोचना गलत नहीं है, क्योंकि सीमित संसाधन और ऊँचे स्तर की प्रतियोगिता मांग करती है कि हम समय से आगे की सोचें।

    हालाँकि, मैं सोचता हूँ, हम सभी सहमत होंगे कि पिछले 15-20 सालों में पर विश्व में काफी बदलाव आये हैं, इसलिए जो ज्यादातर सुविधाएँ और सेवाएं कुछ सीमित लोगों को ही उपलब्ध होती थी अब टेक्नोलॉजी में विशाल प्रगति के कारण बहुत से लोगों को उपलब्ध है , जैसा की इन वर्षों में देखा गया है।

    कला, मनोरंजन, प्रोफेशनल गेम्स, साहित्य, हेल्थ और फिटनेस, एंटरप्रेन्योरशिप, जर्नलिज़्म फोटोग्राफी, इवेंट मैनेजमेंट, म्यूजिक,एडवेंचर, डेस्टिनेशन टूरिज्म  आदि, कुछ नाम हैं जिनमे बीते युग की अपेक्षा अपार वृद्धि हुई है।

    इनमे से कई ने अपनी एक जगह बनाई है जो ना सिर्फ मानव मन की रचनात्मक संभावनाओं और क्षमता का पोषण करते हैं बल्कि एक सफल करियर के विकल्प भी हैं।

    खैर, इसका अर्थ यह नहीं है कि आपको इन्हे बेहतर करियर विकल्प के रूप में देखने को कहा जा रहा है, लेकिन इन्हे भी करियर के विकल्प के रूप में जरूर देखें।

    सच्चाई यह है, कि आजकल बच्चे अपने एकेडमिक परफॉर्मेंस से संबंधित अत्यधिक  दबाव का सामना कर रहे हैं, और जिसको लेकर वे तनाव के भिन्न-भिन्न स्तरों से होकर गुजरते हैं।

    यदि हम ध्यान दें, कि कम्पटीशन में कुछ तनाव है तो.... माता-पिता के सहयोग, देखभाल, सही पारिवारिक माहौल से बच्चे को किसी भी प्रकार की विषम परिस्थिति से निपटने में मदद मिलेगी।

    हालाँकि, मौजूदा वास्तविकता यह है की सही प्रकार के माहौल और सहयोग की कमी के कारण बहुत से बच्चे बिना देखभाल की वजह से अकेले तनाव से होकर गुजर रहे हैं और कुछ मामलों में तो ऐसी स्थितियां इतनी ज्यादा चरम सीमा तक बच्चों को असहाय कर देतीं हैं कि वे आत्महत्या कर लेते हैं।  

    जो कुछ भी आपके बच्चे के बारे में कहा जा रहा है उससे एकाएक भयभीत मत हो जाइये। ......क्योंकि आपका बच्चा पूरी तरह सुरक्षित और स्वस्थ है, और आपके पास चिंता करने का कोई कारण नहीं है, लेकिन मुझे विश्वास है जब आप आगे मेरा पत्र पढ़ेंगे तो आप समझेंगे कि आपके पास अपने बच्चे की चिंता करने का कारण है।

    मेरी बदकिस्मती है कि, मुझे 20-25 जवान,होनहार, खूबसूरत, और वन्डरफुल बच्चों के सुसाइड नोट्स पढ़ने का मौका मिला।

    क्या मैं इतने विशेषण उन्हें इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि उन्होंने सुसाइड किया है। क्षमा कीजिये! ऐसा नहीं है। वे वास्तव में जैसा मैंने पहले कहा जवान, होनहार, खूबसूरत और वन्डरफुल बच्चे थे।

    एक लड़की जिसकी इंग्लिश लैंग्वेज पर बहुत अच्छी कमांड थी, सही व्याकरण और खूबसूरत हैंडराइटिंग के साथ अपने पांच पेज के  सुसाइड नोट में अपनी माँ को बच्चों की परवरिश के लिए अपना करियर छोड़ने के लिए धन्यवाद लिखा था...... छुपा संकेत था कि इस बात के लिए बार बार उसे मानसिक दुःख दिया जाता था।....... एक दूसरी लड़की चाहती थी अगले जन्म में उसकी दादी उसकी माँ बने। ....एक अन्य ने अपने अभिभावकों से अनुरोध किया है कि वे उसकी छोटी बहन को उसकी पसंद का काम करने दें, ना की वह काम जो उन्हें पसंद है।..... एक खुलकर बताती है कि उसे जबरदस्ती साइंस पढ़ने को कहा जाता था जो कि उसे पसंद नहीं था।.... कुछ ने सरल शब्दों में कुछ लाइनें लिखी हैं, कि वे अपने माता-पिता की उम्मीदों को पूरा नहीं कर सके।......बल्कि कुछ ने लिखा था कि वे वास्तव में इस योग्य नहीं थे कि जो उनसे कहा जा रहा था उसे पूरा कर सकें। ...... इन सभी ने सोचा जो माता पिता कहते हैं, उसे बिना मन से करने की दुविधा से गुजरने से ज्यादा शांत और आसान काम मर जाना है। ....

    जैसा की कहा जाता है, आइसबर्ग  का सिर्फ थोड़ा भाग दिखाई देता है और उसके नीचे तो पहाड़ छिपा होता है। उसी तरह से दिखाई देने वाले सुसाइड के मामले तो संख्या में हैं लेकिन वास्तव में  छुपा हुआ पहाड़ तो उन बच्चों का है जो इतना बड़ा कदम तो नहीं उठाते हैं, पर यकीनन वे परफॉर्मेंस में दबाव के कारण तनाव /चिंता /घबराहट से गुजर रहे हैं।

    बहुत से अभिभावक दुर्घटना के बाद ये विश्वास नहीं कर पाते कि ये उनका अपना बच्चा है, जिसने इतना कठोर कदम उठाया। मैं उनकी संवेदनाओं को और दुःख नहीं पहुंचाना चाहता हूँ, लेकिन वास्तविकता यही है कि उनका बच्चा  मानसिक रूप से वह तिनका ढूढ़ रहा था जो एक डूबता हुआ व्यक्ति ढूंढ़ता है। वो तिनका हो सकता है- उसके द्वारा किये गए प्रयासों के लिए आपके प्रशंसा के कुछ शब्द। ........आपके सांत्वना देने वाले शब्द कि नतीजों को भूलकर अपना बेहतर करो। ....... उसकी विशेष गुणों के लिए पूरी  तरह से बिना शर्त आपकी प्रशंसा। ......

    इसके बदले में बच्चे को क्या मिलता है, बेहतर प्रदर्शन करने की धमकी। .......आपने परिवार की खातिर कितनी परेशानी उठाई, है इसे बार बार उसके सामने दोहराकर उसे मनोवैज्ञानिक रूप से प्रताड़ित करना। ........बेहतर करने वालों से तुलना करना (वह पड़ोसियों, रिश्तेदारों, सहयोगी के बच्चे, पूर्वज ... कोई भी हो सकता है) ...नुकसान की कल्पना /बच्चे के प्रदर्शन पर उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा की निर्भरता आदि बातें उसके साथ साझा करना। .....

    हमें यह समझने की जरूरत है कि, संख्या की दृष्टि देखने पर लगता है, जितने बच्चे एकेडेमिक प्रेशर से जूझ रहे हैं, उसकी तुलना में बहुत कम बच्चे सुसाइड कर रहे हैं, लेकिन जिंदगी की पड़ताल करने पर हमें पता चलता है कि उनकी आशाओं और सपनों की अनदेखी की जाती है, और उन्हें कई बार मारती है।...... इसलिए ये गम्भीर समय है, जब हम थोड़ा रुकें और मनन करें। ......

    मुझे यहां थोड़ा रुकने की जरूरत है क्योंकि मैं सुन रहा हूँ आपमें से बहुत से कह रहे हैं कि बच्चे ऐसी बहुत सी चीजे नापसंद करते हैं जो उनके लिए अच्छी होती हैं। तो मैं आपसे पूछना चाहता हूँ, क्या अभिभावकों को बच्चों की तरह बर्ताव करना चाहिए ? निश्चित रूप से 'नहीं ' . खैर, चलिए हम कोशिश करते हैं ये जानने की कि कौन सी अच्छी बातों को वे नापसंद करते हैं, सही भोजन, सही नींद ,सही बोलना, सही व्यवहार, सही देखना, सही सुनना, सही पढ़ना आदि।

    बच्चा वास्तव में अपने माता-पिता को देखता है,आँखे मूंद कर किसी भी बात का पालन नहीं करता इसके साथ ही एक बात निश्चित है, बच्चा पहले देखता है कि जो बातें बताई जातीं हैं, वह उनके माता-पिता पालन करते हैं या नहीं। और यदि वे ऐसा करते हैं तो क्या उनके माता -पिता वास्तव में प्रेम, ख़ुशी और शांति से हैं ?

    बच्चे अपने माता-पिता की उन्ही आदतों को अपनाते हैं जो उन्हें खुश और शांत रखती है। यदि आप जानबूझकर स्थितियों को बिगाड़ते हैं, तो हो सकता है बच्चा आपको भी नापसंद करने लगे।

    हो सकता है, यह अजीब और कष्टप्रद लगे लेकिन इसकी सम्भावना है, कि आपका बच्चा आपको नापसंद करता है। यह कई तरह का हो सकता है, पूरी तरह से नापसंद करता है, कुछ आदतों को नापसंद करता है, किसी अन्य की तुलना में आपको नापसंद करता है, आपकी अति  सुरक्षात्मक देखभाल को नापसंद करता हो जो आपको आपका प्यार लगता हो, लेकिन इससे बच्चे का दम घुटता  हो। आपका दोहरा मापदंड उसे नापसंद हो (हो सकता है आपका। ...) आदि।

    तो क्या इस पत्र का उद्देश्य आपको यह अहसास दिलाना है कि आपका बच्चा आपको पसंद नहीं करता ?

    फिर से इसका जवाब है 'नहीं', 'आपका बच्चा आपको नापसंद नहीं करता है', मैं सिर्फ वह संकेत दे रहा हूँ कि, अनजाने में ही हम ऐसी स्थिति बना देते हैं जो हमे नहीं बनानी चाहिए।

    बच्चे माता पिता की जिम्मेदारी हैं, और हम माता-पिता को उनकी जिम्मेदारी सिखाने वाले कोई नहीं होते ना ही ऐसा करने का हमारा इरादा है। अभिभावक वास्तव में बच्चों के भविष्य के लिए अच्छा सोचते हैं।

    लेकिन मैं एक बात बताना चाहता हूँ कि, आपके सपने हमेशा आपके अनुभवों के दायरे में रहते हैं- क्या अच्छा होता है....., क्या सफल होता है......., क्या सबसे अच्छी बात है..... खैर,   सच तो यह है कि आपका बच्चा आपकी कल्पना से भी आगे जा सकता है, और उस जगह पहुंच सकता है, जहां का आपने कभी सपना भी ना देखा हो।

    सामाजिक और आर्थिक प्रतिष्ठा, संस्कृति, धर्म, विश्वास पद्धति आदि संदर्भों में हम सब समाज के विभिन्न वर्गों से आते हैं, हालाँकि बच्चे की परवरिश के प्राकृतिक सिद्धांत हर जगह एक से रहते हैं।

    मैं परवरिश का विशेषज्ञ नहीं हूँ, और ना ही मेरे पास बच्चे की सही देखभाल के अभ्यास  की बहुत सी उपलब्धियां है, लेकिन मैं पूर्णतया ये समझता हूँ कि हर बच्चे को अलग प्रकार के सार सम्भाल की आवश्यकता पड़ती है। तब भी मैं आप से ये अनुरोध करता हूँ कि, बच्चे के पालन से संबंधित इन बुनियादी पहलुओं पर  थोड़ा ध्यान दें।

    घर को खुशहाल, प्यार भरा और शांतिपूर्ण बनाकर बच्चे को बढ़ने और विकसित होने के लिए घर में सही प्रकार का वातावरण बनाना। बच्चे की आवश्यकताओं को समझना।

    इन मामलों में दो प्रकार की अति हो जाती है, एक है, 'आपके' सपनों को पूरा करने के लिए बच्चे को डराना और धमकाना, और दूसरा है बच्चे को अत्यधिक लाड- प्यार करना। ये दोनों ही नुकसानदायक हैं। 

    कुछ समय बच्चे को सिखाने की बजाय उनसे सीखने के अंदाज को अपनाएं, क्योंकि कई बार बच्चे आपको खुश और शांत होने के रास्ते बता देते हैं। .....

    बच्चे को उसकी अपनी शर्तों के अनुसार बनने दें, यहां मेरा मतलब है,बच्चे का प्रकृति और आस -पास की दुनिया के साथ जुड़ाव और सही तरीके से लोगो से बात करने के कौशल के साथ मजबूत बनना जो ज्यादा अनुकूल होता है।

    उम्र के साथ दूसरे लिंग के प्रति आकर्षण गलत नहीं है, बल्कि एक सामान्य प्रक्रिया है,जिस पर आप  नजर रख सकते हैं, लेकिन इसे पूरी तरह से रोकने की कोशिश न करें।

    हर समय अपनी तमाम शिकायतों के बिना बच्चे के साथ समय बिताइए।….. हो सकता है तब तक बहुत देर हो जाय इससे पहले की आप बच्चे के साथ समय बिताना चाहें और उसके पास आपके साथ बिताने के लिए  समय  ना हो.... क्यों ? क्योंकि हो सकता है हम उन्हें प्रशिक्षित करने के प्रयास में अपने जैसा बना दें...... निश्चित ही हम बच्चे के बेंचमार्क नहीं हैं। कई बार बच्चे की क्षमता की तुलना में हम बहुत पीछे रह जाते हैं।

    बस एक अंतिम विचार। क्या हम किसी भी कीमत पर बच्चे को अपने सपनों का अहसास कराने में रूचि रखते हैं या ऐसी स्थितियां बनानी चाहिए कि बच्चा अपने सपने को प्राप्त कर सके?

    मैं एडमिशन के समय पैरेंट काउंसलिंग सेशन में भाग ले सकता था, और इन मुद्दों पर बात कर सकता था। लेकिन आमतौर पर इतने लोगों की भीड़ में हम बगल में बैठे व्यक्ति की धारणा या अलग तरह से सोचने वाले लोगों, से ज्यादा प्रभावित होते हैं।

    असहमत होने में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन दूसरों से प्रभावित होने की बजाय, बेहतर है अपनी शर्तों पर असहमत होना।..... अंत में, मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ आपका समय लेने के लिए और आपको चाइल्ड मैनेजमेंट के बारे में बातें बताने के लिए जिसमे मैं विशेषज्ञ नहीं हूँ और इस पत्र में लिखे हुए  मेरे शब्द कोटा में अपने सीमित अनुभव और इसी तरह के मामलों से लिए गए हैं, और निश्चित रूप से इसके पीछे वे महान व्यक्ति हैं, जिन्होंने आपके सामने अपने विचार रखने के लिए मुझे प्रेरित किया। ....

    विश्व में सर्वश्रेष्ठ माता पिता बनिये!!!!

    मुझे यकीन है कि वहाँ कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती

    भवदीय,

    डॉ रवि कुमार

    जिला कलेक्टर, कोटा

     

  • 15 Apr
    Janhavi Dwivedi

    चंदा कोचर-एक खत बेटी के नाम(हिंदी में)

    chanda kochhar letter to her daughter

     

    जब हम बड़े होकर असली दुनिया का सामना करते हैं, और नई चुनौतियों को स्वीकार करते हैं, तो परिवर्तन के प्रत्येक दौर में हम अपने माता-पिता को हमेशा मजबूती के साथ सहारा देने के लिए खड़े हुए पाते हैं।

    हर माता-पिता अपने स्वयं के अनुभवों से सीखे गए जीवन के सबसे महत्वपूर्ण पाठ और जीवन- मूल्यों को  अपने बच्चों को सिखाते हैं। प्रसिद्धि प्राप्त माता-पिता इससे अलग नहीं होते।

    उसी प्रकार की एक जानी मानी हस्ती हैं, चंदा कोचर जो ICICI बैंक की CEO और MD हैं। जिन्होंने कॉर्पोरेट क्षेत्र में एक मुकाम हासिल कर लाखों महिलाओं के लिए एक मिसाल पेश की है। 

    लेकिन अपने बच्चों के लिए चंदा पूरी तरह से एक प्यार करने वाली माँ हैं जो अपने बच्चों को संस्कारों के साथ बड़ा करने में विश्वास करती हैं। 

    जब चंदा कोचर, जो भारत के सबसे बड़े बैंक के 'शीर्ष पद' पर हैं, अपने जीवन के अनुभव और यादों को अपनी बेटी के साथ साझा करती हैं, तो यह सभी के लिए प्रेरणा दायक हो सकता है।

    अपनी बेटी को लिखे एक भावनात्मक पत्र में चंदा कोचर ने अपने जीवन को बदलने वाली घटनाओं, परिवार के महत्व, और मजबूती के साथ विपरीत परिस्थिति का सामना करने की चर्चा की है।

     

    प्रिय आरती,

    मुझे आज बहुत गर्व महसूस हो रहा है, अपने सामने तुम्हे एक आत्मविश्वास से भरी लड़की के रूप में देखकर जो अपनी जिंदगी के रोमांचक सफर की दहलीज़ पर खड़ी है। मैं आने वाले वर्षों में तुम्हे आगे बढ़ते हुए और सफल होते हुए देख रही हूँ।

    ये पल मुझे वापस मेरे सफर, और उस दौरान सीखे गए जीवन के सबकों की भी याद दिलाते हैं।  जब मैं उन दिनों के बारे में सोचती हूँ, मुझे ये महसूस होता है कि, उनमें अधिकांश सबक मेरे माता-पिता के द्वारा मेरे बचपन में ही सिखा दिए गए थे।

    जो मूल्य उन्होंने मुझे मेरे जीवन के प्रारम्भिक दिनों में सिखाए, वही मेरी बुनियाद है, जिन पर मैं आज भी चलने की कोशिश करती हूँ।

    हमारे माता-पिता ने हम तीनों-दो बहन एक भाई, से बराबर व्यवहार किया। चाहे शिक्षा की बात हो या हमारे भविष्य की योजनाएं जेंडर के आधार पर हमारे बीच कोई भेदभाव नहीं किया जाता था।

    तुम्हारे नाना-नानी हमेशा हम तीनो से कहते थे - कि यह महत्वपूर्ण है कि जो बात हमें संतुष्टि देती है, उस पर ध्यान केंद्रित करो, और उस दिशा में पूरे समर्पण के साथ कार्य करो।

    बचपन में मिली इन सीखों से हम आत्मविश्वासी और स्वावलम्बी बनने में सक्षम हुए। इससे मुझे उस वक्त भी मदद मिली जब मैंने अपने आत्मनिरीक्षण करने के सफर की शुरुवात की।

    तब मैं सिर्फ १३ साल की थी, जब मेरे पिता अचानक दिल का दौर पड़ने से चल बसे, अभी तो हमने उनके बिना जीवन जीना सीखा ही नहीं था, वे हमें छोड़ गए।

    हम अभी तक जीवन में विपत्तियों से सुरक्षित थे, लेकिन बिना बताए सब कुछ रातों रात बदल गया। और मेरी माँ जो अभी तक घरेलू महिला थी, उन्हें अपने दम पर अपने तीन बच्चों की परवरिश करने की जिम्मेदारी का सामना करना पड़ा।

    तब हमें ये महसूस हुआ कि, माँ कितनी मजबूत थी, और कैसे उन्होंने जितना सम्भव हो सकता था, अपना कर्तव्य पूरा करने का दृढ़ निश्चय किया।

    धीरे धीरे उन्होंने टेक्सटाइल और डिजाइनिंग में हुनर की खोज कर ली और एक छोटी फर्म के साथ काम करना शुरू कर दिया, और जल्दी ही खुद को उनके लिए अति आवश्यक बना लिया।

    यह जरूर उनके लिए चुनौतीपूर्ण रहा होगा, अकेले अपने परिवार की जिम्मेदारी अपने कंधे पर लेना। लेकिन उन्होंने कभी हमें ऐसा अहसास नहीं होने दिया कि यह उनके लिए एक भार है।

    उन्होंने कठिन मेहनत किया जबतक हम अपनी पढ़ाई पूरी करके स्वावलम्बी बन गए। मैं नहीं जानती थी कि मेरी माँ के अंदर इतनी आत्म शक्ति और विश्वास का भंडार है।

    पूर्णकालिक जॉब के साथ एक अभिभावक के रूप में आपके कार्य आपके परिवार के साथ संबंधों को प्रभावित नहीं करने चाहिए।

    तुम्हे याद है, वह समय जब तुम US में में पढ़ाई कर रही थी और मेरे ICICI बैंक की CEO और MD बनने की घोषणा सभी न्यूज़ पेपर में छाई हुई थी।

    मुझे याद है वह मेल जो कुछ दिनों के बाद तुमने मुझे लिखा था। तुमने लिखा था,

    "आपने कभी हमें ये अहसास नहीं होने दिया कि आपका इतना कठिन, तनावपूर्ण और सफल करियर था, घर पर आप  सिर्फ हमारी माँ होती थीं " .

    मेरी डार्लिंग, अपना जीवन इसी तरह से जीना।

    मैंने अपनी माँ से यह भी सीखा कि चाहे जो भी हो, जीवन में कठिन परिस्थितियों को सम्भालना और आगे बढ़ते रहने की क्षमता होना बहुत आवश्यक है।

    मुझे आज भी याद है, मेरे पिताजी के जाने के बाद माँ ने कितने धैर्य और शांति के साथ संकट को सम्भाला था। तुम्हे चुनौतियों को सम्भालना है, बजाय इसके कि वे तुम्हे दलदल में गिरा दें, उनसे मजबूत बनकर उभरना है।

    मुझे याद है, कैसे 2008 के अंत में हम ऐसी स्थिति का सामना कर रहे थे जब वैश्विक आर्थिक मंदी में ICICI बैंक का अस्तित्व खतरे में था।

    प्रमुख मीडिया प्लेटफॉर्म द्वारा इन स्थितियों का सूक्ष्म नजरों से विश्लेषण किया जा रहा था, और सार्वजनिक स्थानों में व्यापक बहस। ..... मैं काम में लगी हुई थी, सभी स्टाकहोल्डर्स के साथ संवाद कर रही थी, जिसमें  छोटे जमाकर्ता से लेकर प्रमुख निवेशकों तक और रेगुलेटर्स से लेकर सरकार तक शामिल थे। बैंक की स्थिति ठीक थी ।

    मैं उनकी चिंताओं को समझती थी, क्योंकि उन्हें डर था कि बैंक में जमा उनकी गाढ़ी कमाई खतरे में हो सकती है।

    मैंने अपने बैंक की विभिन्न ब्रांचों के स्टाफ को ये सलाह दी कि वे उन जमाकर्ताओं से सहानुभूति से पेश आएं जो अपना पैसा निकालने के लिए बैंक में आ रहे हैं, और इंतजार करने के दौरान उन्हें सीट और पानी ऑफर करें, साथ ही उन्हें यह समझाने की भी कोशिश करें कि पैसा निकालना सही फैसला नहीं होगा क्योंकि  बैंक में वास्तविक संकट की स्थिति नहीं है।

    इसी दौरान मैंने एक दिन कुछ घंटों का ब्रेक तुम्हारे भाई के स्क्वैश टूर्नामेंट को देखने के लिए लिया ।

    मुझे पता नहीं था, लेकिन मेरी यह उपस्थिति ग्राहकों का विश्वास फिर से जीतने में बहुत मददगार साबित हुआ।

    कुछ मदर्स मेरे पास आईं और पूछा की, क्या मैं ही चंदा कोचर हूँ, और मेरे हाँ कहने पर उन्होंने कहा कि जब इतने संकट के बीच मैं यह टूर्नामेंट देखने के लिए समय निकल सकती हूँ तो इसका मतलब है कि बैंक सुरक्षित हाथों में है, और उन्हें अपने पैसे की चिंता करने की जरूरत नहीं है।

    ये मेरी माँ थी जिन्होंने मुझे सिखाया कि यह महत्वपूर्ण है कि परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाया जाय, ना कि किसी अनजान भय से डरा जाय।

    मैं अपने करियर के लिए कड़ी मेहनत कर रही थी, साथ में अपने परिवार को भी देख रही थी, और जब भी मेरी माँ और सास ससुर को मेरी जरूरत होती थी तो मैं उनके पास होती थी।

    उन्होंने मुझे बिना शर्त अपना प्यार और मेरे करियर के प्रति अपना समर्थन दिया। याद रखो, रिश्ते बहुत महत्वपूर्ण होते हैं, और उनका भी पालन पोषण किया जाना चाहिए।

    यह भी ध्यान रखना है कि रिश्ते दोनों तरफ से निभाने होते है, और हम जैसा किसी से अपेक्षा करते हैं वैसा  ही व्यवहार हमें उनके प्रति करना होता है।

    मेरा करियर उस तरह से विकसित नहीं होता जैसा कि यह है, यदि तुम्हारे पिता ने सहयोग नहीं किया होता, जिन्होंने एक बार भी शिकायत नहीं की जबकि मैं बहुत सारा समय घर से बाहर बिताती थी।

    मैं और तुम्हारे पिता ने अपने रिश्ते को सम्भाल कर रखा, इस बात के बावजूद कि हम दोनों ही अपने करियर को बनाने में व्यस्त थे, और मुझे विश्वास है जब समय आएगा तब तुम भी अपने साथी के संग ऐसा ही करोगी।

    यदि तुमने घर से काफी समय तक अनुपस्थिति की शिकायत या दुःख का अहसास कराया होता तो मुझे खुद अपना करियर बनाने की हिम्मत नहीं होती।

    मैं धन्य हूँ, कि मुझे इतना महान और सहयोगी परिवार मिला, और मुझे आशा है, तुम भी इतनी ही भागयशाली होगी जब तुम खुद को स्थापित करोगी।

     

    मुझे याद है, वो दिन जब तुम्हारे बोर्ड एग्जाम्स शुरू होने वाले थे, मैंने काम से छुट्टी ली थी ताकि मैं तुम्हे खुद एग्जाम हाल तक ले कर जा सकूं।

    जब तुम्हे लगा कि मैं आ रही हूँ, तुमने मुझे बताया कि कैसे तुम इतने सालों तक अकेले ही एग्जाम के लिए जाती रही हो।

    तुमने जो कहा उससे मुझे दुःख हुआ लेकिन मैंने यह भी सोचा कि कामकाजी माँ होने से कुछ मायनों में कम उम्र में ही तुम अधिक स्वावलम्बी बन गई।

    तुम ना सिर्फ स्वावलम्बी बनी, बल्कि अपने भाई की देखभाल की भूमिका में भी आगे आई, जिससे उसे कभी मेरी कमी नहीं महसूस हुई। मुझे तुम पर भरोसा और यकीन है और अब तुम एक वन्डरफुल और इंडिपेंडेंट वुमन  बन गई हो।

    अब मैं हमारी बढ़ती जनसंख्या की युवा प्रतिभाओं को बड़ी जिम्मेदारी लेने लायक बनाने के लिए उसी सिद्धांत पर काम करती हूँ।

    मैं भाग्य में विश्वास करती हूँ, लेकिन मेरा यह भी मानना है कि कड़ी मेहनत और परिश्रम हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    ज्यादा बड़े अर्थ में, हम सब अपने भाग्य खुद लिखते हैं। अपने हाथों में अपना भाग्य लो, सपना देखो, जो आप हासिल करना चाहते हो, और उसे अपने तरीके से लिखो।

    जब तुम जीवन में आगे बढ़ो, मैं चाहती हूँ तुम सफलता की ओर चढ़ाई में एक बार में एक कदम आगे बढ़ाओ, तुम्हारा लक्ष्य आकाश है, लेकिन धीरे-धीरे बढ़ो, राह के साथ हर कदम का आनंद लेते रहो।

    ये सब वो छोटे कदम हैं जो कि यात्रा पूरी करते हैं।

    जब तुम आगे बढ़ोगी,तुम्हे कभी कभी कठिन निर्णय लेने पड़ेंगें , निर्णय जिनसे दूसरों को नफरत हो सकती है। लेकिन अपने विश्वास पर दृढ रहने का साहस तुम्हारे पास होना चाहिए।

    सुनिश्चित करो कि तुम्हे इसका दृढ़ विश्वास है, कि जो तुम जानते हो सही है, और एक बार यह विश्वास आप के पास आ जाये ,तो संदेह को तुम्हे अपने पथ से विचलित करने मत दो।

    आरती, दृढ संकल्प मन से आप क्या हासिल कर सकते हो, इसकी कोई सीमा नहीं है। लेकिन अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में, निष्पक्षता और ईमानदारी के मूल्यों से समझौता मत करना।

    अपने सपनों को प्राप्त करने के लिए कोई भी समझौता या कटौती मत करना। अपने आसपास के लोगों की भावनाओं के प्रति संवेदनशील रहना याद रखना।

    और याद रखना, अगर तुम तनाव को अपने ऊपर हावी होने नहीं दोगी, तो यह तुम्हारे जीवन में कभी समस्या नहीं बनेगा।

    याद रखना कि अच्छे और बुरे समय समान रूप से तुम्हारे जीवन का हिस्सा होंगे, और तुम्हे दोनों को धैर्य के साथ सम्भालना सीखना है।

    जीवन के अधिकतर अवसरों का लाभ प्राप्त करो, और हर अवसर से और जीवन में आने वाली हर चुनौती से, सीख लो।

     

    प्यार के साथ, तुम्हारी माँ

    Translated from 

  • 11 Apr
    Oyindrila Basu

    अनंत अम्बानी-असम्भव को संभव करना जिन्होंने अपनी माँ से सीखा

    anant ambani weight loss

     

    मुकेश अम्बानी के छोटे बेटे, अनंत अम्बानी आज एक स्वस्थ इंसान हैं, उन्होंने १८ महीने में १०८ किलो तक वज़न घटाया है। अविश्वसनीय है! उन्होंने मीडिया में फैले लाइपो-सर्जरी जैसे अफवाहों  को भी नकार दिया है।

    उन्होंने पूरी ईमानदारी से, और मेहनत से ये बदलाव हासिल किया है। योगा, व्यायाम और कार्डिओ-वैस्कुलर परिश्रम से उन्होंने अपने अधिक वज़न को प्राकृतिक तरीके से काम किया है।

    पर ये उन के लिए आसान नहीं था। किसी भी नए काम की  आदत डालने में ही 3 महीने से ज्यादा का समय लगता है, वहीँ उन्होंने 18 महीने में आश्चर्यजनक फल भी हासिल किया ।

    हमारा समाज भी किसी के बढे-या घटे वजन को लेकर मजाक उड़ाने से चूकता नहीं है। अनन्त और उनके भाई आकाश भी ऐसे मीडिया के प्रहार से वंचित नहीं थें।

    Twitter पर उनके वज़न को लेकर चुटकुले बनाये जाते थे।

    वज़न कम करना हमारे बस में नहीं होता है । यह  एक शारीरिक समस्या है, और उस पर विशेष समाधान करने के बजाय समाज का काम ही है उसका मज़ाक बनाना, समस्या पर हंसना।

    एक बार सर रविन्द्र जडेजा लिखते हैं, "रेड अलर्ट- यहां भूकम्प आनेवाला है, क्योंकि आकाश अम्बानी मुंबई इंडियन्स की जीत के बाद, स्टेडियम में झम्पिंग-झपांग करने वाले हैं। " इस ट्वीट को 250 बार दोहराया गया।

    इन कमेंट्स के बावजूद अनंत डटे रहे, और अपने हौसले को टूटने नहीं दिया।

    उन्हें Hypothyroid की समस्या थी जो शरीर को सुस्त और कमज़ोर कर देता है, अधिक वज़न बढ़ा देता है। अनंत को अस्थमा भी था, और उसी की चिकित्सा के दौरान अनंत को यह रोग लगा।

    अपनी शारीरिक दुर्बलता को हराकर उन्होंने व्यायाम का रास्ता अपनाया, ये प्रशंसनीय है।

    और इसमें उनकी माँ नीता अम्बानी का बहुत बड़ा हाथ है। एक माँ होने के नाते  उन्होंने अनंत का हमेशा साथ दिया। एक इंटरव्यू में नीता कहती हैं "बच्चे माँ को देख कर ही सीखते हैं। जब मैंने देखा अनंत का वज़न अस्वाभाविक है, और उसे वेट लॉस करना पड़ेगा, तब मैंने भी व्यायाम करने का फैसला किया। वे कहीं वाक पर जाता था, तो मैं भी उसके साथ जाती थी। मैं एक्सरसाइज करती थी, तो वह भी करता था। और इस प्रकार से मैंने हर पल उसका साथ दिया, उसे वज़न घटाने के लिए प्रेरित किया। और मेरा भी वज़न घट गया। "

    एक माँ का फ़र्ज़ है बच्चे को सीखना, उसके लिए प्रेरणा बनना। और नीता जी ने अपना कर्तव्य पूर्ण रूप से निभाया।

    दोनों ने मिल कर वज़न से सम्बंधित समस्या को दूर भगाया।

    आज twitter पर अनंत को बधाइयां मिल रही है। सलमान खान से ले कर धोनी तक सब उनके जज़्बे से प्रेरित हैं। उनका हौसला और खुद पर विश्वास देखने लायक है, और उसी से उन्होंने आज भाग्य को अपने हक़ में किया है।

  • 06 Apr
    Oyindrila Basu

    इमरान हाशमी-अयान के सुपर हीरो

    imran hashmi

     

     

    अविश्वसनीय है, जिस तरह एक बेहतरीन अभिनेता अपने बच्चे को कैंसर से बचाने के लिए सुपर हीरो के किरदार में आते हैं।

    "मेरी बात ध्यान से सुनो, वक़्त लगेगा, लेकिन एक बार हम ये कर पाएं, तो तुम आयरन मैन से भी बेहतर सुपर हीरो बन जाओगे", ऐसा इमरान हाश्मी अपने बच्चे से कहते थें।

    किसे 'बेहतर' बनना था? क्यों? और कैसे? क्या सुपर हीरो जैसा सच में कुछ होता है?

    कहते हैं विश्वास करने से भगवान् भी मिल जाते हैं, नहीं तो बहस करते ही रहे जाएंगे हम।

    इमरान हाश्मी अपने बच्चे के लिए उस भरोसे, उस विश्वास का आधार बन कर आएं।

    उनका बेटा अयान, ४-साल की कच्ची उम्र में कैंसर का शिकार है। उसकी किडनी में एक अजीब ट्यूमर पाया गया था, जिसका नाम है Wilms' Tumor  जो एक जर्मन डॉक्टर के नाम पर पड़ा है। अफ्रीका में होने वाली ये बीमारी बच्चों को ज्यादा प्रभावित करती है।

    हमने पिछले लेख में बताया है कैसे इस बीमारी से लड़ने का एक तरीका, उसे सुपर विलन बनाना हो सकता है। खुद को सुपर हीरो मान कर कैंसर से मुक़ाबला करेंगे, तो इस बीमारी का डट कर सामना किया जा सकता है।

    यही किया #मर्डर के अभिनेता इमरान हाश्मी ने। बच्चे को बैटमैन और सुपरमैन जैसे अवतार पसंद है, और ये जानते हुए उन्होंने खुद को बैटमैन बना कर प्रस्तुत किया, और बच्चे को भी समझाया की अगर वह हिम्मत और मज़बूती से कैंसर से लड़ेगा तो वह भी स्वस्थ हो कर, सारे सुपर हीरो से बेहतर बन जाएगा, अयान मैन बन कर वह सर्व श्रेष्ठ कहलायेगा।

    ये हम सब को प्रोत्साहन देता है। कैसे एक पिता जो खुद दुःख और तकलीफ से पीड़ित है, अपने बच्चे के बारे में ज्ञात होने से परेशान है, कैसे वे अपनी परेशानी को परे रख कर अपने बच्चे के साथ खड़े हैं, और उसे हिम्मत दिला रहा है । 

    उनका मानना है कि जो इंसान अपनी ज़िन्दगी ज़िम्मेदारी और मज़बूती से जीतता है वही असल सुपर हीरो है।

    "अयान का कैंसर मेरी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी चुनौती है। मुझे उसके लिए सुपर मैन, बैटमैन और वह सारे किरदार बनने होंगे जिससे उसे हिम्मत और ख़ुशी मिले", ऐसा इमरान बताते हैं।

    लेकिन धैर्य से हर जंग जीता जा सकता है। अपने जज़्बातों पर काबू पा कर आगे बढ़ते रहने से ही समस्या का समाधान हो सकता है, और ये इमरान साबित कर चुके हैं। अयान अपने पिताजी से हिम्मत और शक्ति पाता है, जिससे वह कैंसर के दानवीय चुंगल से भी मुक्त हुआ है। हम दोनों के लिए अच्छा जीवन और अच्छी मानसिक स्वास्थ्य की कामना करते हैं।

  • 04 Apr
    Oyindrila Basu

    प्रत्युषा बनर्जी-क्या अवसाद उनकी आत्महत्या का कारण बना?

    pratyusha banerjee suicide

     

    #बालिका वधु-कच्ची उम्र के पक्के रिश्ते, Colours TV पर आने वाला ये शो, बेहद लोकप्रिय हुआ और इसके माध्यम से इंडियन टेलीविज़न इंडस्ट्री को कई नए चेहरे, और कई नए कलाकारों  से परिचय कराने का मौका मिला। नई प्रतिभा जो उभर कर सामने  आई थीं , उनमें एक थी हमारी नयी #आनंदी, यानी जमशेदपुर की प्रत्युषा बनर्जी जिसे भारत की आम जनता ने अपनी बेटी बनाया, और कुछ ही दिनों में ये लड़की हर घर की लाडली बन गयी।

    रातों रात सफलता मिली, उसने कई सीरियल में काम किया, #बिग बॉस में भाग लिया जिससे उसकी लोकप्रियता और बढ़ गयी।

    उसके दोस्त और सहयोगी बताते हैं की वो काफी हंसमुख थीं। Twitter और Instagram पर हमेशा उसके पोस्ट्स आते थे। तो फिर ऐसा क्या हुआ कि, इतनी  कम उम्र में प्रत्युषा ज़िन्दगी से मायूस हो कर आत्महत्या की ओर चली?

    1 अप्रैल को उसके अपार्टमेंट में पुलिस को  सीलिंग से लटकती प्रत्युषा मिली । ये घटना आश्चर्य जनक थी, कोई यकीन नहीं कर पा रहा था, फिल्म और टेलीविज़न की जानी-मानी हस्तीं भी इस दुखद घटना से परेशान  थे।

    लेकिन प्रत्युषा ने ऐसा क्यों किया?

    उनके दोस्त उन्हें आज भी हंसती-खेलती, फुदकती प्रत्युषा के रूप में ही पहचानते हैं, लेकिन काफी दिनों से उन्होंने सब से दूरी बना ली थी। किसी से बात नहीं करती थीं।

    सोशल नेटवर्क पर भी नहीं आती थीं ।

    डॉक्टर श्याम मिथिया बताते है, "जब कोई इंसान अपने जान पहचान वालों से दूर हो जाता है, इसका मतलब वह किसी मानसिक समस्या से जूझ रहा है, और जब ये एक सेलिब्रिटी करता है, तो और भी अस्वाभाविक है, क्योंकि वे लाइमलाइट में रहने के आदी हैं, सब से घुलना मिलना यही उनकी ज़िन्दगी है, तो ऐसे में कोई एक दम से चुप हो जाता है, तो साफ़ है कि वह  निराश है, परेशान है"

     

    प्रत्युषा की ज़िन्दगी में, उसके राहुल सिंह के साथ सम्बन्धों को लेकर कुछ समस्या थी। वे उनसे शादी करने वाली थी, लेकिन कुछ हफ्ते पहले उन्होंने Twitter पर कहा, "मर कर भी तुझसे मुंह ना मोड़ेंगे", जिससे साफ़ पता चलता है वे अभिमान और उदासी में ऐसा कह रहीं थीं।

    कुछ महीने पहले उन्होंने कुछ लड़कों पर अश्लील व्यवहार का आरोप लगाया था। उनके साथ कुछ न कुछ समस्या आ ही रही थी।

    लेकिन एक इंसान हताश के किस मक़ाम पर पहुंचकर ज़िन्दगी को ही खत्म करना चाहता  है, ये हम शायद समझ ना पाएं।

    डॉक्टर मिथिया बताते हैं "जब कोई WhatsApp पर कुछ पोस्ट करता है, तो वह किसी न किसी प्रकार से उससे जुड़ा हुआ होता है, वे खुद को उस बात से संबंधित कर सकते हैं, इसलिए पोस्ट करते हैं"

    अगर कोई गाने के बोल भी हम पोस्ट करते हैं इसका मतलब यही होता है कि या वह बोल हमारी स्थिति को बेहतर बयान करते हैं, या फिर वह हमें पसंद है, और हम दुनिया को ये बात बताना चाहते हैं।

    कोई इंसान जब काम के लिए अपने परिवार से दूर रहता है, तब भी उसकी  मानसिक स्थिति पर गहरा असर होता है। वे खुद में मायूस रहते हैं, अपनी तकलीफ किसी को बता नहीं पाते, इससे हताश हो जाते हैं, और निराश उन्हें घेर लेती है।

     

    आज इस दुखद घटना के बाद #करण जौहर कहते हैं "ये सिर्फ एक जागरूक सूचना है, आज भी जो दोस्त और परिवार निराशा को एक समस्या नहीं मानते, वे अपनी सोच बदलें और डिप्रेशन को गम्भीरता से लें"