कुल 30 कहानियाँ

  • 13 Jun
    Oyindrila Basu

    ऑर्लैंडो शूटर- किस मानसिकता के अधीन था ?

     

    Omar Mir Seddique Mateen

    "कुल 49 लोग मारे गये और 53 लोग ज़ख़्मी हुए, जब 29 वर्षीय मतीन ने अमरीका के ऑर्लैंडो के गे नाईट क्लब में गोलियां चलाई"

    ओमर मतीन अमरीका के न्यू यॉर्क शहर में पैदा हुए, और जहाँ तक जाना जाता है, एक अफ़ग़ानी अप्रवासियों के दल ने उसकी परवरिश की, जिन्हें अमरीका की ऍफ़ बी आई काफी दिनों से ढूंढ रही थी।

    इनकी शादी सिर्फ 4 महीने तक ही टिक पायी, और इनकी पूर्व पत्नी Sitora Yu sufi बताती हैं, कि "उन्हें बाइपोलर डिसऑर्डर था"

    रोज़ घर आ कर पत्नी पर अत्याचार, गालीगलौज, ये सब घर में आम बात हो गयी थी।

    सितोरा बताती हैं की मतीन छोटी-छोटी बातों पर गुस्से में आ जाते थे और उन्हें डांटते और मारते थे।

    वे काफी हिंसक बन चुके थे, और तभी उन्हें डर लगने लगा, और उनके परिवार ने उनको बचाने के लिए अपने पास बुला लिया।

    "जज़्बाती असन्तुलंत उन में अकसर दिखाई देता था, वे बीमार थे, और मानसिक रूप से दुर्बल भी, तनाव और सदमें में तो थे ही", ऐसा यूसुफी बताती हैं।

    ओमर मतीन समलैंगिकता के विरोध में थे, क्योंकि इस्लाम उसके खिलाफ है।

    बाइपोलर डिसऑर्डर से आक्रामक व्यव्हार हो सकता है, परन्तु यह किसी धर्म, जाति का विरोधी होने का कारण नहीं हो सकता, और ना ही आपको किसी आतंकवादी संगठन की तरफ झुकाव बढ़ाता है ।

    आतंकवादी घटना, सरे आम लोगों का क़त्ल करना इन सबके लिए मानसिक बीमारी को दोष देना सही नहीं है ।

    चलिए आज हम बाइपोलर डिसऑर्डर के बारे में बात करते हैं ।

     

    बाइपोलर डिसऑर्डर एक बीमारी है, जिसमें इंसान का मिज़ाज अचानक से बदलता रहता है।

    ऐसे में जज़्बाती व्यवहार पर इंसान का बस नहीं रहता । कभी-कभी  इंसान बहुत उदास हो सकता है, आत्मघाती मनोवृत्ति भी आ सकती है, और दूसरे ही क्षण में वह बहुत उत्तेजित और फुर्तीला पेश आ सकता है।

    दिमाग में रासायनिक समस्याओं के कारण ये मिज़ाजी डिसऑर्डर हो सकते हैं, या फिर कभी कभी आनुवंशिक कारण से भी हो सकता है।

    कई रिसर्च में देखा गया है, कि अगर एक जुड़वा बच्चे को बाइपोलर डिसऑर्डर है, तो 40% सम्भावनाएँ हैं, कि दूसरे जुड़वा भाई या बहन को भी एक सी समस्या होगी।

    अकसर प्रथम रिश्तेदारों से भी ये रोग आ सकता है।

     

    दुखद बात यह है की इस बीमारी को मिटाना असम्भव है, पर इसका इलाज हो सकता है।

    पर आपको खुद आशावादी होना पड़ेगा, ठीक होने के लिए अपने अंदर इच्छा होना ज़रूरी है।

    यो यो हनी सिंह के बारे में हमने पहले भी बात की है; उन्हें भी यही समस्या थी, पर उनके अंदर ठीक होने का जज़्बा था।

    किसी अच्छे काम से साथ या कला के प्रति रुचि होना ज़रूरी है।  इससे मस्तिष्क में सकारात्मक सोच बनी रहती है, और ऊर्जा को एक सही दिशा मिलती है। आपका काम आपकी प्रेरणा बन सकता है, ताकि आप ठीक होने की कोशिश करें।

    अगर आपके मन में मानसिक समस्या को लेकर  कोई सवाल है, तो आप बेझिझक हमारे थेरेपिस्ट से कंसल्ट कर सकते हैं ।

  • 09 Jun
    Oyindrila Basu

    विनीत विग-एक और दुखद घटना

    vineet whig

     

    Encyclopaedia Britannica हमारे बचपन का साथी था, जो हमें ज्ञान और साधारण ज्ञान  देता था।

    Britannica अंग्रेजी भाषा में लिखी गयी सबसे पुरानी ज्ञान-पुस्तक है जो आज भी प्रकाशित होती है। सर्व प्रथम ये 1768 और 1771 के बीच स्कॉटलैंड में, तीन हिस्सों में प्रकाशित हुयी थी । 4000 से भी ज्यादा लोग इस किताब के प्रकाशन में योगदान देते हैं, जिनमे 110 नोबेल खिताब के विजेता हैं और 5 अमरीका के प्रेजिडेंट हैं।

    जिस किताब की गरिमा इतनी ऊंची है, आज उसके नाम के साथ एक दुखद घटना जुड़ गयी

    Britannica के COO का आज देहांत हो गया। 15 मई 2016 ने उनको अपने खुद के हाथों से अपनी जान लेते हुए देखा। एक ऊंची इमारत के छत से कूदने से विनीत विग की मौत हुयी, साथ में मिला उनके हाथों से लिखा उनका आखिरी सन्देश ।  उसमें लिखा था,

    "मैं खुद अपनी जान ले रहा हूँ, मेरी मृत्यु के लिए कोई ज़िम्मेदार नहीं है। अब मैं ज़िन्दगी से और नहीं जूझ सकता। आत्महत्या के अलावा और कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा। मैं जानता हूँ की मैं कायर हूँ, मुझे लड़ना चाहिए था, पर अब ये सम्भव नहीं"

    47 साल के विनीत विग एक ज़िम्मेदार पिता और एक संवेदनशील पति थे।

    1992 में वे NIIT में काम करते थें जिसके बाद उन्होंने वाईस-प्रेजिडेंट के रूप में WIPRO के साथ जुड़ गए। 2014 में वे Britannica के साथ जुड़े, और अप्रैल 2015 में वे COO बने।

    दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र रह चुके विनीत, भारतीय विद्या भवन और डेल्ही पब्लिक स्कूल के alumnus भी रह चुके हैं।

    दोस्तों के लिए वे सच्चाई और निष्ठा की मूरत थे।

    फिर ऐसा क्या हुआ की उन्हें अपनी जान देनी पड़ी?

    आत्मघाती चिंताएं कई कारण से आ सकती है -उनमें कुछ कारण है भयंकर अवसाद की समस्या, दुःख, दर्द, नुकसान, हताशा, आशंका, और तनाव।

    2015 के अंत से आत्महत्या की खबरें संवाद माध्यम में छाई हुयी है। जिया खान की मृत्यु से लेकर, प्रत्युषा बनर्जी की आत्महत्या तक, आज भी twitter पर उन खबरों के आभास दिखते हैं। फिर कोटा में छात्र की मृत्यु और अब विनीत विग की दुखद मौत, ये सिलसिला कायम है।

    अमरीका में किये गए रिसर्च द्वारा साबित होता है, की 1986 से 2000 तक, आत्महत्या के कारण मृत्यु की समीक्षा घटती नज़र आई, पर ये ख़ुशी जादा दिनों तक नहीं रही, उसके बाद से 2012 तक आत्महत्या की संख्या बढ़ती जा रही है, और आज भी छवि सामान है। ये सिर्फ एक देश की समस्या नहीं है, पूरे विश्व में निराशा नामक विष फ़ैल रहा है, जिससे  मौतें हो रही है।

    निराशा से बचने के लिए, इस पर जानकारी बढ़ाना ज़रूरी है। सही काउंसलिंग ज़रूरी है।

    मस्तिष्क के साधारण व्यवहार पर आधारित मनोचिकित्सा होनी  चाहिए।

    पर खुद की मदद खुद को करनी होगी। रोज़ व्यायाम का अभ्यास करें, इससे दिमाग चुस्त रहेगा। अच्छी किताब पढ़िए, गलत चिंताएं असर कम करेंगी।

    eWellness expert जैसी संस्थाएं आपकी मदद के लिए हमेशा हैं। सही सलाह ज़रूरी है। खुद को हताश चिंताओं से दूर रखने के लिए दोस्तों की मदद ले सकते हैं।

  • 06 May
    Janhavi Dwivedi

    नारायण मूर्ति - पापा का खत लाड़ली के नाम 

    narayan murthy

    नारायण मूर्ति इनफ़ोसिस के संस्थापक और भारत की शक्तिशाली हस्तियों में से एक हैं, लेकिन  अपनी बेटी को लिखे पत्र से यह पता चलता है कि वो कितने वन्डरफुल डैड हैं।

    अक्षता,

    एक पिता बनने के बाद मुझमे इतने बदलाव आये जो मैंने कभी नहीं सोचा था। तुम्हारा आगमन मेरे जीवन में अकल्पनीय ख़ुशी और बड़ी जिम्मेदारियां लेकर आया।

    मैं न सिर्फ एक पति, एक बेटा और एक तेजी सी ग्रोथ करती कम्पनी में एक भरोसेमंद कर्मचारी होने के अलावा एक पिता था, जो अपनी बेटी के जीवन के हर पड़ाव पर एक पिता से  होने वाली उम्मीदों को आंक रहा था।

    तुम्हरे जन्म से हर पहलुओं में मेरा जीवन स्तर ऊपर उठ गया। ऑफिस में मेरा कार्य अधिक सोचा और समझा होता था, बाहर की दुनिया से मेरे लेन देन अब अधिक समझदार, गरिमामय और परिपक्व हो गए थे।

    मैं अब हर व्यक्ति से अधिक संवेदना और शिष्टता के साथ पेश आने की जरूरत महसूस करने लगा  था।

    आखिर कुछ दिनों के बाद तुम बड़ी होगी और अपने आस-पास की दुनिया को देखोगी और समझोगी, और मैं नहीं चाहता था कि, तुम कभी ये सोचो कि मैंने कहीं पर भी कोई गलत काम किया था।

    narayan murthy

    मेरा मन अक्सर तुम्हारे जन्म के बाद के शुरूआती दिनों में वापस चला जाता है। तुम्हारी माँ और मैं  अपने करियर में अपनी जड़ें जमाने के लिए संघर्ष कर रहे थे।

    हुबली में तुम्हारे जन्म के दो महीने बाद, हम तुम्हे मुंबई ले आये, लेकिन जल्दी ही हमे यह समझ में आ गया कि, एक बच्चे का पालन पोषण और साथ ही साथ करियर को सम्भालना एक मुश्किल काम था।

    तो, हमने तय किया कि अपने जीवन के शुरूआती वर्षों को तुम हुबली में अपने दादा-दादी के साथ बिताओ। जाहिर है, यह एक कठिन निर्णय था, जिसे कुछ शर्तों के साथ पालन करने में मुझे थोड़ा वक्त लगा था।

    हर सप्ताह के अंत में, मैं बेलगाम हवाई जहाज से जाता और उसके बाद एक कार किराए पर लेकर हुबली।  यह बहुत महंगा था, लेकिन मैं तुम्हे देखे बिना नहीं रह सकता था।

    मुझे आश्चर्य होता था यह देख कर कि, कैसे तुमने हुबली में अपनी खुद की छोटी सी खुशहाल दुनिया बनाई थी, अपने दादा दादी और प्यार करने वाली चाची और रिश्तेदारों से घिरी हुई, अपने जीवन में हमारी अनुपस्थति से बेखबर।

    मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि वे कौन से गुण हैं, जिन्हे मैंने अपने बच्चों को दिया है?

    मैं उन्हें बताता हूँ कि यह तुम्हारी माँ हैं जिन्होंने इस महान जिम्मेदारी को अपने कंधों पर लिया, और तुम्हे एक अच्छी शख्शियत बनाने के लिए मैं उनका बहुत आभारी हूँ। वह मूल्यों को बोलकर बताने की अपेक्षा उसे  गतिविधि द्वारा अधिक बताती थी। उन्होंने रोहन और तुम्हे सादगी और आत्मसंयम के महत्व को सिखाया।

    इसकी एक घटना है, बैंगलौर में जब तुम्हे एक नाटक के लिए चुना गया था, जिसमें  तुम्हे एक विशेष ड्रेस पहननी थी,यह अस्सी के दशक के मध्य की बात है, जब इंफोसिस का काम शुरू ही हुआ था और हमारे पास किसी भी गैर-बुनियादी वस्तुओं पर खर्च करने के लिए पैसा नहीं था।

    तुम्हारी माँ ने तुम्हे समझाया कि हम पोशाक खरीदने में सक्षम नहीं हैं और इसलिए तुम नाटक में भाग मत लो। बहुत बाद में, तुमने मुझसे कहा था कि तुम इस बात को समझ नहीं पायी थी।

    हमें पता था कि एक बच्चे को स्कूल में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम को छोड़ने के लिए कहना एक कठोर कदम है, लेकिन, हम जानते हैं कि तुमने इससे बहुत कुछ सीखा था - आत्मसंयम का महत्व

    हमारा जीवन तब से बहुत बदल गया है और अब हमारे पास पर्याप्त पैसा है। लेकिन, तुम जानती हो, हमारी जीवन शैली अब भी साधारण है।

    एक बार आर्थिक रूप से सम्पन्न होने पर, मुझे याद है मैंने तुम्हारी माँ के साथ तुम बच्चों को कार से स्कूल भेजने की बात की थी, लेकिन तुम्हारी माँ ने जोर देकर कहा कि रोहन और तुम नियमित रूप से ऑटोरिक्शा में अपने सहपाठियों के साथ स्कूल जाओगे ।

    तुम लोगों ने रिक्शा चाचा' के साथ बहुत अच्छी दोस्ती कर ली थी, और ऑटो में अन्य बच्चों के साथ हंसी मजाक करते आते थे।

    जीवन में सरल चीजें अक्सर सबसे ज्यादा ख़ुशी देती हैं, और वे मुफ्त में मिलती हैं।

    तुम अक्सर मुझसे पूछती थी कि क्यों हमारे घर पर कोई टेलीविजन नहीं है जबकि तुम्हारे बाकि दोस्त टी वी पर देखे हुए प्रोग्राम्स की चर्चा करते थे।

    तुम्हारी  माँ ने शुरू में ही ये फैसला किया था कि, हमारे घर में कोई टीवी नहीं होगा, ताकि घर में पढ़ाई करने,चर्चा करने और दोस्तों से मिलने जैसी बातों के लिए समय होगा।

    उन्होंने जोर देकर कहा कि घर पर सीखने में सहायक वातावरण बनने लिए यह जरूरी है। 

    इसलिए, हर रात 8 बजे से 10 बजे के बीच का समय हम इसके लिए समर्पित करते थे, जो पूरे परिवार को एक साथ उत्पादक वातावरण में लाता था। 

    रोहन और तुम अपने स्कूल का काम करते, तुम्हारी माँ और मैं इतिहास, साहित्य, भौतिकी, गणित, और इंजीनियरिंग पर किताबें पढ़ते या कोई ऑफिस का काम करते।

    बहुत कुछ कहा जाता है कि कैसे मातृत्व एक स्त्री के जीवन में बहुत से बदलावों को लाता है, लेकिन शायद ही हम कभी पिता बनने के बाद एक आदमी में आये परिवर्तनों की बात करते हैं।

    एक बेटी का जन्म एक आदमी को और भी अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार बना देता है, और इसलिए यह कहा जाता है, पिता-पुत्री के बंधन से ज्यादा खूबसूरत बंधन कोई नहीं होता।

    पिता एक बच्चे के व्यक्तित्व को आकार देने में एक बड़ी भूमिका निभाते हैं, और इसीलिए वे अपनी नन्ही परी के लिए ज्यादा प्रोटेक्टिव होते हैं।

    आईटी सम्राट नारायणमूर्ति इन भावनाओं के कोई अपवाद नहीं थे, जब वह एक बेटी के पिता बने। इससे जीवन के प्रति उनकी धारणा बदल गई, और उन्हें पहलू से भी ज्यादा समझदार बना दिया।

    एक पिता बनने से लेकर  दादा बनने तक के सफर को साझा करते हुए नारायण मूर्ति ने अपनी बेटी अक्षता को पत्र लिखा था, जिसमे जीवन के बहुत ही महत्वपूर्ण सबक शामिल हैं।

    akshta rishi

    यह पूरी तरह से एक सर्वविदित तथ्य है कि जब एक बेटी की शादी हो जाती है, एक पिता को इसके बारे में मिला जुला अहसास होता है।

    उसे इस बात से नफरत होती है कि, उसकी बेटी की जिंदगी में कोई अन्य है, जिसके साथ वह अपना प्यार साझा करेगी - वो अटेंशन जो पहले अकेले उनकी थी अब एक स्मार्ट, कॉन्फिडेंट, नवयुवक ने ले ली।

    मैंने भी, थोड़ा दुःख और जलन महसूस किया था जब तुमने बताया था कि तुम्हे तुम्हारा जीवन साथी मिल गया है।

    लेकिन जब मैं ऋषि से मिला और जैसा तुमने बताया था उसे वैसा ही पाया - प्रतिभावान, सुंदर, और सबसे महत्वपूर्ण बात, ईमानदार-मैं समझ गया क्यों उसने तुम्हारा दिल चुरा लिया और तब मैंने तुम्हारे साथ उसके प्यार को स्वीकार कर लिया।

    कुछ महीने पहले, तुमने हमें नाना-नानी बनने का सौभाग्य दिया, जो मेरे लिए गर्व की बात है। यदि पहली बार तुम्हे अपनी बाहों में लेना मेरे लिए अवर्णनीय आनन्द था, तो तुम्हरे घर सांता मोनिका में कृष्णा, तुम्हारी प्यारी बेटी को देखना पूरी तरह एक अलग अनुभव था।

    मैं आश्चर्य चकित था, क्या अब से मुझे एक बुद्धिमान, ग्रैंड ओल्ड मैन की तरह व्यवहार करना होगा! लेकिन, फिर मुझे बढ़ती उम्र का बोनस और नाना-नानी बनने का एहसास हुआ।

    मुझे एक बच्चे को लाड़ करने की खुशी मिल रही है! इसके अलावा, तुम जानती हो, नाना-नातिन दोनों के कॉमन दुश्मन कौन होते हैं- माता-पिता !

    मुझे विश्वास  है कि जब तुम्हारी गलतियां निकालनी होंगी तो मैं और कृष्णा एक ही पेज पर एक के बाद एक नोट्स और लाइनों की अदला बदली करेंगें।

    जैसे आप अपने लक्ष्यों का पीछा करते हैं और एक संतुष्ट जीवन जीते हैं, याद रखो हमारे पास जीने के लिए एक ही धरती है, और वह अब खतरे में है, याद रखो यह तुम्हारी जिम्मेदारी है कि तुम्हे हमसे जैसी मिली थी, उससे भी बेहतर धरती बनाकर इसे कृष्णा को देना होगा ।

    अपना ध्यान रखना, मेरी बच्ची

    प्यार से, 'अप्पा '

  • 05 May
    Janhavi Dwivedi

    अभिभावकों के लिए कोटा के जिला कलेक्टर का भावनात्मक पत्र

    kota suicide

    The Hindu/ Representative Image

    प्यारे अभिभावकों,

    कोटा शहर की तरफ से मुझे इस वन्डरफुल शहर में आपके बच्चे का स्वागत करने का मौका मिला है ,जो देश के युवा मस्तिष्क का विकास करता है ,और आधुनिक भारत का आर्किटेक्ट बनने के लिए उनके पैशन को शक्ति देता है।

    इस पत्र की शुरुआत में आपसे मेरा विनम्र अनुरोध है कि कुछ समय निकालकर धैर्य के साथ मेरे इस पत्र को पढ़ें, बेहतर होगा यदि माता-पिता दोनों एक साथ इसे पढ़ सकें।

    हर अभिभावक का सपना होता है, अपने बच्चे को सफलता के शिखर पर देखना जहां पहुंचना हर किसी के बस की बात नहीं होती। हर अभिभावक बच्चे के मन में एक बीज रोपता है जो समय आने पर फल देता है, लेकिन सावधानी पूर्वक पोषण और देखभाल के बाद क्योंकि बीज इतना कोमल होता है कि देखभाल में कोई भी चूक हमें हमारे सपने को प्राप्त करने में असफल कर सकती है।

    माता -पिता के लिए ये बहुत कठिन परिस्थिति होती है, कि अपने बच्चे को ऐसी जगह पर छोड़ना जहां वे नहीं रहते हैं।  और ज्यादा मुश्किल तब होती है जब बच्चे को छोड़ने का उद्देश्य शिक्षा में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए समर्पित और वचनबद्ध प्रयास हो।

    जब माता-पिता बड़े-बड़े बिल बोर्ड, होर्डिंग्स और न्यूजपेपर में खूबसूरत जवां बच्चों की तस्वीरें देखतें हैं जिन्होंने वह उपलब्धि हासिल कर ली है, जिसके सपने वे अपने बच्चे के लिए देखते हैं, तो बच्चे को प्रेरित करने का संकल्प और बढ़ जाता है।

    हो सकता है अच्छी आमदनी और जीवन स्तर में निश्चित गारंटी के मामले में इंजीनियरिंग और मेडिकल के क्षेत्र में अच्छा कैरियर हो।

    मैं वास्तव में यह सोचता हूँ कि ज्यादातर मामलों में यही कारण है, जिससे हम बच्चों के लिए इन कैरियरों के सपने देखते हैं।

    अपने बच्चे के लिए कुछ सुनिश्चित कैरियर गारंटी, के बारे सोचना गलत नहीं है, क्योंकि सीमित संसाधन और ऊँचे स्तर की प्रतियोगिता मांग करती है कि हम समय से आगे की सोचें।

    हालाँकि, मैं सोचता हूँ, हम सभी सहमत होंगे कि पिछले 15-20 सालों में पर विश्व में काफी बदलाव आये हैं, इसलिए जो ज्यादातर सुविधाएँ और सेवाएं कुछ सीमित लोगों को ही उपलब्ध होती थी अब टेक्नोलॉजी में विशाल प्रगति के कारण बहुत से लोगों को उपलब्ध है , जैसा की इन वर्षों में देखा गया है।

    कला, मनोरंजन, प्रोफेशनल गेम्स, साहित्य, हेल्थ और फिटनेस, एंटरप्रेन्योरशिप, जर्नलिज़्म फोटोग्राफी, इवेंट मैनेजमेंट, म्यूजिक,एडवेंचर, डेस्टिनेशन टूरिज्म  आदि, कुछ नाम हैं जिनमे बीते युग की अपेक्षा अपार वृद्धि हुई है।

    इनमे से कई ने अपनी एक जगह बनाई है जो ना सिर्फ मानव मन की रचनात्मक संभावनाओं और क्षमता का पोषण करते हैं बल्कि एक सफल करियर के विकल्प भी हैं।

    खैर, इसका अर्थ यह नहीं है कि आपको इन्हे बेहतर करियर विकल्प के रूप में देखने को कहा जा रहा है, लेकिन इन्हे भी करियर के विकल्प के रूप में जरूर देखें।

    सच्चाई यह है, कि आजकल बच्चे अपने एकेडमिक परफॉर्मेंस से संबंधित अत्यधिक  दबाव का सामना कर रहे हैं, और जिसको लेकर वे तनाव के भिन्न-भिन्न स्तरों से होकर गुजरते हैं।

    यदि हम ध्यान दें, कि कम्पटीशन में कुछ तनाव है तो.... माता-पिता के सहयोग, देखभाल, सही पारिवारिक माहौल से बच्चे को किसी भी प्रकार की विषम परिस्थिति से निपटने में मदद मिलेगी।

    हालाँकि, मौजूदा वास्तविकता यह है की सही प्रकार के माहौल और सहयोग की कमी के कारण बहुत से बच्चे बिना देखभाल की वजह से अकेले तनाव से होकर गुजर रहे हैं और कुछ मामलों में तो ऐसी स्थितियां इतनी ज्यादा चरम सीमा तक बच्चों को असहाय कर देतीं हैं कि वे आत्महत्या कर लेते हैं।  

    जो कुछ भी आपके बच्चे के बारे में कहा जा रहा है उससे एकाएक भयभीत मत हो जाइये। ......क्योंकि आपका बच्चा पूरी तरह सुरक्षित और स्वस्थ है, और आपके पास चिंता करने का कोई कारण नहीं है, लेकिन मुझे विश्वास है जब आप आगे मेरा पत्र पढ़ेंगे तो आप समझेंगे कि आपके पास अपने बच्चे की चिंता करने का कारण है।

    मेरी बदकिस्मती है कि, मुझे 20-25 जवान,होनहार, खूबसूरत, और वन्डरफुल बच्चों के सुसाइड नोट्स पढ़ने का मौका मिला।

    क्या मैं इतने विशेषण उन्हें इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि उन्होंने सुसाइड किया है। क्षमा कीजिये! ऐसा नहीं है। वे वास्तव में जैसा मैंने पहले कहा जवान, होनहार, खूबसूरत और वन्डरफुल बच्चे थे।

    एक लड़की जिसकी इंग्लिश लैंग्वेज पर बहुत अच्छी कमांड थी, सही व्याकरण और खूबसूरत हैंडराइटिंग के साथ अपने पांच पेज के  सुसाइड नोट में अपनी माँ को बच्चों की परवरिश के लिए अपना करियर छोड़ने के लिए धन्यवाद लिखा था...... छुपा संकेत था कि इस बात के लिए बार बार उसे मानसिक दुःख दिया जाता था।....... एक दूसरी लड़की चाहती थी अगले जन्म में उसकी दादी उसकी माँ बने। ....एक अन्य ने अपने अभिभावकों से अनुरोध किया है कि वे उसकी छोटी बहन को उसकी पसंद का काम करने दें, ना की वह काम जो उन्हें पसंद है।..... एक खुलकर बताती है कि उसे जबरदस्ती साइंस पढ़ने को कहा जाता था जो कि उसे पसंद नहीं था।.... कुछ ने सरल शब्दों में कुछ लाइनें लिखी हैं, कि वे अपने माता-पिता की उम्मीदों को पूरा नहीं कर सके।......बल्कि कुछ ने लिखा था कि वे वास्तव में इस योग्य नहीं थे कि जो उनसे कहा जा रहा था उसे पूरा कर सकें। ...... इन सभी ने सोचा जो माता पिता कहते हैं, उसे बिना मन से करने की दुविधा से गुजरने से ज्यादा शांत और आसान काम मर जाना है। ....

    जैसा की कहा जाता है, आइसबर्ग  का सिर्फ थोड़ा भाग दिखाई देता है और उसके नीचे तो पहाड़ छिपा होता है। उसी तरह से दिखाई देने वाले सुसाइड के मामले तो संख्या में हैं लेकिन वास्तव में  छुपा हुआ पहाड़ तो उन बच्चों का है जो इतना बड़ा कदम तो नहीं उठाते हैं, पर यकीनन वे परफॉर्मेंस में दबाव के कारण तनाव /चिंता /घबराहट से गुजर रहे हैं।

    बहुत से अभिभावक दुर्घटना के बाद ये विश्वास नहीं कर पाते कि ये उनका अपना बच्चा है, जिसने इतना कठोर कदम उठाया। मैं उनकी संवेदनाओं को और दुःख नहीं पहुंचाना चाहता हूँ, लेकिन वास्तविकता यही है कि उनका बच्चा  मानसिक रूप से वह तिनका ढूढ़ रहा था जो एक डूबता हुआ व्यक्ति ढूंढ़ता है। वो तिनका हो सकता है- उसके द्वारा किये गए प्रयासों के लिए आपके प्रशंसा के कुछ शब्द। ........आपके सांत्वना देने वाले शब्द कि नतीजों को भूलकर अपना बेहतर करो। ....... उसकी विशेष गुणों के लिए पूरी  तरह से बिना शर्त आपकी प्रशंसा। ......

    इसके बदले में बच्चे को क्या मिलता है, बेहतर प्रदर्शन करने की धमकी। .......आपने परिवार की खातिर कितनी परेशानी उठाई, है इसे बार बार उसके सामने दोहराकर उसे मनोवैज्ञानिक रूप से प्रताड़ित करना। ........बेहतर करने वालों से तुलना करना (वह पड़ोसियों, रिश्तेदारों, सहयोगी के बच्चे, पूर्वज ... कोई भी हो सकता है) ...नुकसान की कल्पना /बच्चे के प्रदर्शन पर उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा की निर्भरता आदि बातें उसके साथ साझा करना। .....

    हमें यह समझने की जरूरत है कि, संख्या की दृष्टि देखने पर लगता है, जितने बच्चे एकेडेमिक प्रेशर से जूझ रहे हैं, उसकी तुलना में बहुत कम बच्चे सुसाइड कर रहे हैं, लेकिन जिंदगी की पड़ताल करने पर हमें पता चलता है कि उनकी आशाओं और सपनों की अनदेखी की जाती है, और उन्हें कई बार मारती है।...... इसलिए ये गम्भीर समय है, जब हम थोड़ा रुकें और मनन करें। ......

    मुझे यहां थोड़ा रुकने की जरूरत है क्योंकि मैं सुन रहा हूँ आपमें से बहुत से कह रहे हैं कि बच्चे ऐसी बहुत सी चीजे नापसंद करते हैं जो उनके लिए अच्छी होती हैं। तो मैं आपसे पूछना चाहता हूँ, क्या अभिभावकों को बच्चों की तरह बर्ताव करना चाहिए ? निश्चित रूप से 'नहीं ' . खैर, चलिए हम कोशिश करते हैं ये जानने की कि कौन सी अच्छी बातों को वे नापसंद करते हैं, सही भोजन, सही नींद ,सही बोलना, सही व्यवहार, सही देखना, सही सुनना, सही पढ़ना आदि।

    बच्चा वास्तव में अपने माता-पिता को देखता है,आँखे मूंद कर किसी भी बात का पालन नहीं करता इसके साथ ही एक बात निश्चित है, बच्चा पहले देखता है कि जो बातें बताई जातीं हैं, वह उनके माता-पिता पालन करते हैं या नहीं। और यदि वे ऐसा करते हैं तो क्या उनके माता -पिता वास्तव में प्रेम, ख़ुशी और शांति से हैं ?

    बच्चे अपने माता-पिता की उन्ही आदतों को अपनाते हैं जो उन्हें खुश और शांत रखती है। यदि आप जानबूझकर स्थितियों को बिगाड़ते हैं, तो हो सकता है बच्चा आपको भी नापसंद करने लगे।

    हो सकता है, यह अजीब और कष्टप्रद लगे लेकिन इसकी सम्भावना है, कि आपका बच्चा आपको नापसंद करता है। यह कई तरह का हो सकता है, पूरी तरह से नापसंद करता है, कुछ आदतों को नापसंद करता है, किसी अन्य की तुलना में आपको नापसंद करता है, आपकी अति  सुरक्षात्मक देखभाल को नापसंद करता हो जो आपको आपका प्यार लगता हो, लेकिन इससे बच्चे का दम घुटता  हो। आपका दोहरा मापदंड उसे नापसंद हो (हो सकता है आपका। ...) आदि।

    तो क्या इस पत्र का उद्देश्य आपको यह अहसास दिलाना है कि आपका बच्चा आपको पसंद नहीं करता ?

    फिर से इसका जवाब है 'नहीं', 'आपका बच्चा आपको नापसंद नहीं करता है', मैं सिर्फ वह संकेत दे रहा हूँ कि, अनजाने में ही हम ऐसी स्थिति बना देते हैं जो हमे नहीं बनानी चाहिए।

    बच्चे माता पिता की जिम्मेदारी हैं, और हम माता-पिता को उनकी जिम्मेदारी सिखाने वाले कोई नहीं होते ना ही ऐसा करने का हमारा इरादा है। अभिभावक वास्तव में बच्चों के भविष्य के लिए अच्छा सोचते हैं।

    लेकिन मैं एक बात बताना चाहता हूँ कि, आपके सपने हमेशा आपके अनुभवों के दायरे में रहते हैं- क्या अच्छा होता है....., क्या सफल होता है......., क्या सबसे अच्छी बात है..... खैर,   सच तो यह है कि आपका बच्चा आपकी कल्पना से भी आगे जा सकता है, और उस जगह पहुंच सकता है, जहां का आपने कभी सपना भी ना देखा हो।

    सामाजिक और आर्थिक प्रतिष्ठा, संस्कृति, धर्म, विश्वास पद्धति आदि संदर्भों में हम सब समाज के विभिन्न वर्गों से आते हैं, हालाँकि बच्चे की परवरिश के प्राकृतिक सिद्धांत हर जगह एक से रहते हैं।

    मैं परवरिश का विशेषज्ञ नहीं हूँ, और ना ही मेरे पास बच्चे की सही देखभाल के अभ्यास  की बहुत सी उपलब्धियां है, लेकिन मैं पूर्णतया ये समझता हूँ कि हर बच्चे को अलग प्रकार के सार सम्भाल की आवश्यकता पड़ती है। तब भी मैं आप से ये अनुरोध करता हूँ कि, बच्चे के पालन से संबंधित इन बुनियादी पहलुओं पर  थोड़ा ध्यान दें।

    घर को खुशहाल, प्यार भरा और शांतिपूर्ण बनाकर बच्चे को बढ़ने और विकसित होने के लिए घर में सही प्रकार का वातावरण बनाना। बच्चे की आवश्यकताओं को समझना।

    इन मामलों में दो प्रकार की अति हो जाती है, एक है, 'आपके' सपनों को पूरा करने के लिए बच्चे को डराना और धमकाना, और दूसरा है बच्चे को अत्यधिक लाड- प्यार करना। ये दोनों ही नुकसानदायक हैं। 

    कुछ समय बच्चे को सिखाने की बजाय उनसे सीखने के अंदाज को अपनाएं, क्योंकि कई बार बच्चे आपको खुश और शांत होने के रास्ते बता देते हैं। .....

    बच्चे को उसकी अपनी शर्तों के अनुसार बनने दें, यहां मेरा मतलब है,बच्चे का प्रकृति और आस -पास की दुनिया के साथ जुड़ाव और सही तरीके से लोगो से बात करने के कौशल के साथ मजबूत बनना जो ज्यादा अनुकूल होता है।

    उम्र के साथ दूसरे लिंग के प्रति आकर्षण गलत नहीं है, बल्कि एक सामान्य प्रक्रिया है,जिस पर आप  नजर रख सकते हैं, लेकिन इसे पूरी तरह से रोकने की कोशिश न करें।

    हर समय अपनी तमाम शिकायतों के बिना बच्चे के साथ समय बिताइए।….. हो सकता है तब तक बहुत देर हो जाय इससे पहले की आप बच्चे के साथ समय बिताना चाहें और उसके पास आपके साथ बिताने के लिए  समय  ना हो.... क्यों ? क्योंकि हो सकता है हम उन्हें प्रशिक्षित करने के प्रयास में अपने जैसा बना दें...... निश्चित ही हम बच्चे के बेंचमार्क नहीं हैं। कई बार बच्चे की क्षमता की तुलना में हम बहुत पीछे रह जाते हैं।

    बस एक अंतिम विचार। क्या हम किसी भी कीमत पर बच्चे को अपने सपनों का अहसास कराने में रूचि रखते हैं या ऐसी स्थितियां बनानी चाहिए कि बच्चा अपने सपने को प्राप्त कर सके?

    मैं एडमिशन के समय पैरेंट काउंसलिंग सेशन में भाग ले सकता था, और इन मुद्दों पर बात कर सकता था। लेकिन आमतौर पर इतने लोगों की भीड़ में हम बगल में बैठे व्यक्ति की धारणा या अलग तरह से सोचने वाले लोगों, से ज्यादा प्रभावित होते हैं।

    असहमत होने में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन दूसरों से प्रभावित होने की बजाय, बेहतर है अपनी शर्तों पर असहमत होना।..... अंत में, मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ आपका समय लेने के लिए और आपको चाइल्ड मैनेजमेंट के बारे में बातें बताने के लिए जिसमे मैं विशेषज्ञ नहीं हूँ और इस पत्र में लिखे हुए  मेरे शब्द कोटा में अपने सीमित अनुभव और इसी तरह के मामलों से लिए गए हैं, और निश्चित रूप से इसके पीछे वे महान व्यक्ति हैं, जिन्होंने आपके सामने अपने विचार रखने के लिए मुझे प्रेरित किया। ....

    विश्व में सर्वश्रेष्ठ माता पिता बनिये!!!!

    मुझे यकीन है कि वहाँ कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती

    भवदीय,

    डॉ रवि कुमार

    जिला कलेक्टर, कोटा

     

  • 15 Apr
    Janhavi Dwivedi

    चंदा कोचर-एक खत बेटी के नाम(हिंदी में)

    chanda kochhar letter to her daughter

     

    जब हम बड़े होकर असली दुनिया का सामना करते हैं, और नई चुनौतियों को स्वीकार करते हैं, तो परिवर्तन के प्रत्येक दौर में हम अपने माता-पिता को हमेशा मजबूती के साथ सहारा देने के लिए खड़े हुए पाते हैं।

    हर माता-पिता अपने स्वयं के अनुभवों से सीखे गए जीवन के सबसे महत्वपूर्ण पाठ और जीवन- मूल्यों को  अपने बच्चों को सिखाते हैं। प्रसिद्धि प्राप्त माता-पिता इससे अलग नहीं होते।

    उसी प्रकार की एक जानी मानी हस्ती हैं, चंदा कोचर जो ICICI बैंक की CEO और MD हैं। जिन्होंने कॉर्पोरेट क्षेत्र में एक मुकाम हासिल कर लाखों महिलाओं के लिए एक मिसाल पेश की है। 

    लेकिन अपने बच्चों के लिए चंदा पूरी तरह से एक प्यार करने वाली माँ हैं जो अपने बच्चों को संस्कारों के साथ बड़ा करने में विश्वास करती हैं। 

    जब चंदा कोचर, जो भारत के सबसे बड़े बैंक के 'शीर्ष पद' पर हैं, अपने जीवन के अनुभव और यादों को अपनी बेटी के साथ साझा करती हैं, तो यह सभी के लिए प्रेरणा दायक हो सकता है।

    अपनी बेटी को लिखे एक भावनात्मक पत्र में चंदा कोचर ने अपने जीवन को बदलने वाली घटनाओं, परिवार के महत्व, और मजबूती के साथ विपरीत परिस्थिति का सामना करने की चर्चा की है।

     

    प्रिय आरती,

    मुझे आज बहुत गर्व महसूस हो रहा है, अपने सामने तुम्हे एक आत्मविश्वास से भरी लड़की के रूप में देखकर जो अपनी जिंदगी के रोमांचक सफर की दहलीज़ पर खड़ी है। मैं आने वाले वर्षों में तुम्हे आगे बढ़ते हुए और सफल होते हुए देख रही हूँ।

    ये पल मुझे वापस मेरे सफर, और उस दौरान सीखे गए जीवन के सबकों की भी याद दिलाते हैं।  जब मैं उन दिनों के बारे में सोचती हूँ, मुझे ये महसूस होता है कि, उनमें अधिकांश सबक मेरे माता-पिता के द्वारा मेरे बचपन में ही सिखा दिए गए थे।

    जो मूल्य उन्होंने मुझे मेरे जीवन के प्रारम्भिक दिनों में सिखाए, वही मेरी बुनियाद है, जिन पर मैं आज भी चलने की कोशिश करती हूँ।

    हमारे माता-पिता ने हम तीनों-दो बहन एक भाई, से बराबर व्यवहार किया। चाहे शिक्षा की बात हो या हमारे भविष्य की योजनाएं जेंडर के आधार पर हमारे बीच कोई भेदभाव नहीं किया जाता था।

    तुम्हारे नाना-नानी हमेशा हम तीनो से कहते थे - कि यह महत्वपूर्ण है कि जो बात हमें संतुष्टि देती है, उस पर ध्यान केंद्रित करो, और उस दिशा में पूरे समर्पण के साथ कार्य करो।

    बचपन में मिली इन सीखों से हम आत्मविश्वासी और स्वावलम्बी बनने में सक्षम हुए। इससे मुझे उस वक्त भी मदद मिली जब मैंने अपने आत्मनिरीक्षण करने के सफर की शुरुवात की।

    तब मैं सिर्फ १३ साल की थी, जब मेरे पिता अचानक दिल का दौर पड़ने से चल बसे, अभी तो हमने उनके बिना जीवन जीना सीखा ही नहीं था, वे हमें छोड़ गए।

    हम अभी तक जीवन में विपत्तियों से सुरक्षित थे, लेकिन बिना बताए सब कुछ रातों रात बदल गया। और मेरी माँ जो अभी तक घरेलू महिला थी, उन्हें अपने दम पर अपने तीन बच्चों की परवरिश करने की जिम्मेदारी का सामना करना पड़ा।

    तब हमें ये महसूस हुआ कि, माँ कितनी मजबूत थी, और कैसे उन्होंने जितना सम्भव हो सकता था, अपना कर्तव्य पूरा करने का दृढ़ निश्चय किया।

    धीरे धीरे उन्होंने टेक्सटाइल और डिजाइनिंग में हुनर की खोज कर ली और एक छोटी फर्म के साथ काम करना शुरू कर दिया, और जल्दी ही खुद को उनके लिए अति आवश्यक बना लिया।

    यह जरूर उनके लिए चुनौतीपूर्ण रहा होगा, अकेले अपने परिवार की जिम्मेदारी अपने कंधे पर लेना। लेकिन उन्होंने कभी हमें ऐसा अहसास नहीं होने दिया कि यह उनके लिए एक भार है।

    उन्होंने कठिन मेहनत किया जबतक हम अपनी पढ़ाई पूरी करके स्वावलम्बी बन गए। मैं नहीं जानती थी कि मेरी माँ के अंदर इतनी आत्म शक्ति और विश्वास का भंडार है।

    पूर्णकालिक जॉब के साथ एक अभिभावक के रूप में आपके कार्य आपके परिवार के साथ संबंधों को प्रभावित नहीं करने चाहिए।

    तुम्हे याद है, वह समय जब तुम US में में पढ़ाई कर रही थी और मेरे ICICI बैंक की CEO और MD बनने की घोषणा सभी न्यूज़ पेपर में छाई हुई थी।

    मुझे याद है वह मेल जो कुछ दिनों के बाद तुमने मुझे लिखा था। तुमने लिखा था,

    "आपने कभी हमें ये अहसास नहीं होने दिया कि आपका इतना कठिन, तनावपूर्ण और सफल करियर था, घर पर आप  सिर्फ हमारी माँ होती थीं " .

    मेरी डार्लिंग, अपना जीवन इसी तरह से जीना।

    मैंने अपनी माँ से यह भी सीखा कि चाहे जो भी हो, जीवन में कठिन परिस्थितियों को सम्भालना और आगे बढ़ते रहने की क्षमता होना बहुत आवश्यक है।

    मुझे आज भी याद है, मेरे पिताजी के जाने के बाद माँ ने कितने धैर्य और शांति के साथ संकट को सम्भाला था। तुम्हे चुनौतियों को सम्भालना है, बजाय इसके कि वे तुम्हे दलदल में गिरा दें, उनसे मजबूत बनकर उभरना है।

    मुझे याद है, कैसे 2008 के अंत में हम ऐसी स्थिति का सामना कर रहे थे जब वैश्विक आर्थिक मंदी में ICICI बैंक का अस्तित्व खतरे में था।

    प्रमुख मीडिया प्लेटफॉर्म द्वारा इन स्थितियों का सूक्ष्म नजरों से विश्लेषण किया जा रहा था, और सार्वजनिक स्थानों में व्यापक बहस। ..... मैं काम में लगी हुई थी, सभी स्टाकहोल्डर्स के साथ संवाद कर रही थी, जिसमें  छोटे जमाकर्ता से लेकर प्रमुख निवेशकों तक और रेगुलेटर्स से लेकर सरकार तक शामिल थे। बैंक की स्थिति ठीक थी ।

    मैं उनकी चिंताओं को समझती थी, क्योंकि उन्हें डर था कि बैंक में जमा उनकी गाढ़ी कमाई खतरे में हो सकती है।

    मैंने अपने बैंक की विभिन्न ब्रांचों के स्टाफ को ये सलाह दी कि वे उन जमाकर्ताओं से सहानुभूति से पेश आएं जो अपना पैसा निकालने के लिए बैंक में आ रहे हैं, और इंतजार करने के दौरान उन्हें सीट और पानी ऑफर करें, साथ ही उन्हें यह समझाने की भी कोशिश करें कि पैसा निकालना सही फैसला नहीं होगा क्योंकि  बैंक में वास्तविक संकट की स्थिति नहीं है।

    इसी दौरान मैंने एक दिन कुछ घंटों का ब्रेक तुम्हारे भाई के स्क्वैश टूर्नामेंट को देखने के लिए लिया ।

    मुझे पता नहीं था, लेकिन मेरी यह उपस्थिति ग्राहकों का विश्वास फिर से जीतने में बहुत मददगार साबित हुआ।

    कुछ मदर्स मेरे पास आईं और पूछा की, क्या मैं ही चंदा कोचर हूँ, और मेरे हाँ कहने पर उन्होंने कहा कि जब इतने संकट के बीच मैं यह टूर्नामेंट देखने के लिए समय निकल सकती हूँ तो इसका मतलब है कि बैंक सुरक्षित हाथों में है, और उन्हें अपने पैसे की चिंता करने की जरूरत नहीं है।

    ये मेरी माँ थी जिन्होंने मुझे सिखाया कि यह महत्वपूर्ण है कि परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाया जाय, ना कि किसी अनजान भय से डरा जाय।

    मैं अपने करियर के लिए कड़ी मेहनत कर रही थी, साथ में अपने परिवार को भी देख रही थी, और जब भी मेरी माँ और सास ससुर को मेरी जरूरत होती थी तो मैं उनके पास होती थी।

    उन्होंने मुझे बिना शर्त अपना प्यार और मेरे करियर के प्रति अपना समर्थन दिया। याद रखो, रिश्ते बहुत महत्वपूर्ण होते हैं, और उनका भी पालन पोषण किया जाना चाहिए।

    यह भी ध्यान रखना है कि रिश्ते दोनों तरफ से निभाने होते है, और हम जैसा किसी से अपेक्षा करते हैं वैसा  ही व्यवहार हमें उनके प्रति करना होता है।

    मेरा करियर उस तरह से विकसित नहीं होता जैसा कि यह है, यदि तुम्हारे पिता ने सहयोग नहीं किया होता, जिन्होंने एक बार भी शिकायत नहीं की जबकि मैं बहुत सारा समय घर से बाहर बिताती थी।

    मैं और तुम्हारे पिता ने अपने रिश्ते को सम्भाल कर रखा, इस बात के बावजूद कि हम दोनों ही अपने करियर को बनाने में व्यस्त थे, और मुझे विश्वास है जब समय आएगा तब तुम भी अपने साथी के संग ऐसा ही करोगी।

    यदि तुमने घर से काफी समय तक अनुपस्थिति की शिकायत या दुःख का अहसास कराया होता तो मुझे खुद अपना करियर बनाने की हिम्मत नहीं होती।

    मैं धन्य हूँ, कि मुझे इतना महान और सहयोगी परिवार मिला, और मुझे आशा है, तुम भी इतनी ही भागयशाली होगी जब तुम खुद को स्थापित करोगी।

     

    मुझे याद है, वो दिन जब तुम्हारे बोर्ड एग्जाम्स शुरू होने वाले थे, मैंने काम से छुट्टी ली थी ताकि मैं तुम्हे खुद एग्जाम हाल तक ले कर जा सकूं।

    जब तुम्हे लगा कि मैं आ रही हूँ, तुमने मुझे बताया कि कैसे तुम इतने सालों तक अकेले ही एग्जाम के लिए जाती रही हो।

    तुमने जो कहा उससे मुझे दुःख हुआ लेकिन मैंने यह भी सोचा कि कामकाजी माँ होने से कुछ मायनों में कम उम्र में ही तुम अधिक स्वावलम्बी बन गई।

    तुम ना सिर्फ स्वावलम्बी बनी, बल्कि अपने भाई की देखभाल की भूमिका में भी आगे आई, जिससे उसे कभी मेरी कमी नहीं महसूस हुई। मुझे तुम पर भरोसा और यकीन है और अब तुम एक वन्डरफुल और इंडिपेंडेंट वुमन  बन गई हो।

    अब मैं हमारी बढ़ती जनसंख्या की युवा प्रतिभाओं को बड़ी जिम्मेदारी लेने लायक बनाने के लिए उसी सिद्धांत पर काम करती हूँ।

    मैं भाग्य में विश्वास करती हूँ, लेकिन मेरा यह भी मानना है कि कड़ी मेहनत और परिश्रम हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    ज्यादा बड़े अर्थ में, हम सब अपने भाग्य खुद लिखते हैं। अपने हाथों में अपना भाग्य लो, सपना देखो, जो आप हासिल करना चाहते हो, और उसे अपने तरीके से लिखो।

    जब तुम जीवन में आगे बढ़ो, मैं चाहती हूँ तुम सफलता की ओर चढ़ाई में एक बार में एक कदम आगे बढ़ाओ, तुम्हारा लक्ष्य आकाश है, लेकिन धीरे-धीरे बढ़ो, राह के साथ हर कदम का आनंद लेते रहो।

    ये सब वो छोटे कदम हैं जो कि यात्रा पूरी करते हैं।

    जब तुम आगे बढ़ोगी,तुम्हे कभी कभी कठिन निर्णय लेने पड़ेंगें , निर्णय जिनसे दूसरों को नफरत हो सकती है। लेकिन अपने विश्वास पर दृढ रहने का साहस तुम्हारे पास होना चाहिए।

    सुनिश्चित करो कि तुम्हे इसका दृढ़ विश्वास है, कि जो तुम जानते हो सही है, और एक बार यह विश्वास आप के पास आ जाये ,तो संदेह को तुम्हे अपने पथ से विचलित करने मत दो।

    आरती, दृढ संकल्प मन से आप क्या हासिल कर सकते हो, इसकी कोई सीमा नहीं है। लेकिन अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में, निष्पक्षता और ईमानदारी के मूल्यों से समझौता मत करना।

    अपने सपनों को प्राप्त करने के लिए कोई भी समझौता या कटौती मत करना। अपने आसपास के लोगों की भावनाओं के प्रति संवेदनशील रहना याद रखना।

    और याद रखना, अगर तुम तनाव को अपने ऊपर हावी होने नहीं दोगी, तो यह तुम्हारे जीवन में कभी समस्या नहीं बनेगा।

    याद रखना कि अच्छे और बुरे समय समान रूप से तुम्हारे जीवन का हिस्सा होंगे, और तुम्हे दोनों को धैर्य के साथ सम्भालना सीखना है।

    जीवन के अधिकतर अवसरों का लाभ प्राप्त करो, और हर अवसर से और जीवन में आने वाली हर चुनौती से, सीख लो।

     

    प्यार के साथ, तुम्हारी माँ

    Translated from