कुल 30 कहानियाँ

  • 24 Aug
    Oyindrila Basu

    युवराज सिंह-कैंसर से लड़ाई

    yuvraj singh

     

    "अगर मैं सोचूँ, तो मेरी ज़िन्दगी 'क' अक्षर से जुड़ी हुयी है। मैं चंडीगढ़ में पैदा हुआ, क्रिकेटर बना, और अपनी करियर में एक ही चीज़ छह, कप, और अब मेरी ज़िन्दगी में एक और नई चीज़ आई है, और वह है कैंसर, जो 'क' से ही है”. - युवराज सिंह, भारतीय क्रिकेटर।

    इस हंसमुखता को खुद में बनाये रखना बहुत ज़रूरी है। ज़िन्दगी को हँसी में उड़ाने वाले में क्षमता होती है, कई मुश्किलों से लड़ने की, और ऐसी ही एक मुश्किल का नाम कैंसर भी हो सकता है।

     

    कैंसर का पता चलने पर--

    १. इंसान उसे अस्वीकार करता है कि इतनी गंभीर बीमारी मुझे नहीं हो सकती, या मुझे ही क्यों हुई ।

     

    २. फिर वे चिंतित होते हैं, कि ज़िन्दगी में अब कुछ ही  दिन बचे हैं, फिर यह चिंता कि, मेरे बाद मेरे परिवार का क्या होगा, और फिर चिकित्सा कैसे और कितना धन लगेगा ।

     

    ३. काम के क्षेत्र में भी दुर्बल हो जाते हैं।

     

    ४. परिवार से रिश्ता भी कड़वा हो जाता है, क्योंकि जो आप के लिए चिंता करते हैं, आप सोचते हैं, की वे हमदर्दी जता रहे हैं।

     

    परेशान होने से कैंसर का समाधान नहीं होगा, बल्कि गलत चिंता, आपके ठीक होने की इच्छा को मार देगी। मुकाबले से पहले ही हार मान लेंगे आप।

    कैंसर अभी इलाज किया जा सकता है। देश-विदेश में कई तरह की दवाई, और ऑपरेशन से हम कैंसर मुक्त हो सकते हैं।

    दिमाग में बैठी गलत धारणा इनका कारण है-

    १. कैंसर जानलेवा है।

    २. कैंसर संक्रामक है।

    ३. कैंसर में बाल झड़ते है।

    ये धारणा सही नहीं है, कैंसर का सही वक़्त पर इलाज हो, तो इंसान स्वस्थ हो सकता है। कैंसर में बाल नहीं झड़ते, उसके इलाजों के कुछ दुष्प्रभाव से ये हो सकता है।

    पहले तो इस बीमारी के बारे में अपनी जानकारी बढ़ाएं।

    डॉक्टर्स से बातचीत करें, वे आपकी काफी मदद कर पाएंगे। लेकिन सब से अच्छी चिकित्सा आप खुद कर पाएंगे।

    १. मन अपनी ढाल बनाएं। अगर आप मन से दृढ़ हो, तो कोई बड़ी घटना आपको कमज़ोर नहीं कर पाएगी। खुद को समझाएं की आप कर सकते हैं।

    २. सकारात्मक चिंताओं को बढ़ावा दें। अपने आज में जियें। भविष्य की चिंता आपके आज की ख़ुशी को खराब कर सकती है।

    ३. बीमारी के प्रति अपने डर को भगाएं। खुद निश्चय करें, की आप इस बीमारी को हराएंगे। इस पर विजयी होंगे। अगर आप ठान लेंगे, तो कोई न कोई रास्ता आपको ज़रूर मिलेगा, आप चिकित्सा के लिए उत्सुक होंगे। घबराहट से आप कैंसर का मुक़ाबला नहीं कर पाएंगे।

    ४. हंसना ज़रूरी है, हंसमुख इंसान मुश्किल से मुश्किल वक़्त को, अपने ठहाकों से हल्का कर सकता है। कैंसर पर भी हंस लें थोड़ा सा, और कैंसर को मारें सिक्सर 

    ५. अपने डर या बीमारी को, एक शत्रु का चेहरा दें। और 'जी-वन' जैसे 'रा-वन' को हराता है, वीडियो गेम में, आप भी अपने शत्रु को हराने का प्रयास करें। इस प्रकार आपको मुक़ाबला करने की प्रेरणा मिलेगी। तो अपना पसंदीदा वीडियो गेम उठाएं, और खेल में इस भावना को जगाएं।

    ६. दूसरों से प्यार और भरोसा लें, अपने उपलब्धि से अपने आने वाले ज़िन्दगी को बेहतर करें, ज़िन्दगी की ओर अपना नजरिया बदलें।

     

     

    कैंसर से पीड़ित व्यक्ति को डॉक्टर की आवश्यकता अधिक होती है, यह मनीषा जी मानती है। डॉक्टर से बात करने पर, आप कैंसर को ठीक से समझ पाएंगे, और आपका डर कम होगा, तो आप इससे लड़ पाएंगे।

    आपका रवैया यहां अहम होता है। ज़िन्दगी के प्रति सकारात्मक रहे, तो यह आसान हो जाएगा। "हंसो , जियो, मुसकुराओ smile

  • 24 Jun
    Oyindrila Basu

    जोश मार्शल- श्रेष्ठ गंजे पिता

    best bald dad

     

     एक पिता ने फिर से अपने बच्चे के लिए सर मुंडन करवा कर अपना प्रेम जाहिर किया।

    एक बार फिर साबित हो गया, की बच्चों से बढ़ कर माता-पिता के लिए और कोई चीज़ अहम नहीं।

    आपके बच्चे के सामने और कुछ मायने नहीं रखता। न डर, ना भय, ना दर्द, ना सामाजिक प्रतिष्ठा ना छवि, कुछ भी मायने नहीं रखता ।

    हम बात कर रहे है 28 वर्षीय जोश मार्शल के बारे में जिन्होंने खुद को अपने 8-साल के बेटे का जुड़वा बना लिया ताकि उसमें आत्मविश्वास की कमी ना आये।

    मार्शल के बेटे को 2015  में anaplastic astrocytoma नामक बीमारी का पता चला था। यह एक प्रकार मस्तिष्क में पलटे ट्यूमर का नाम है, जो कैंसर जितना ही खतरनाक है। बहुत कम लोग इसके बारे में जानते हैं। बालक गेब्रियल तब से अपनी बीमारी से लड़ रहा है, पर वह किसी भी क्षण अकेला नहीं था, उसका पिता उसके साथ खड़ा रहा।

    मार्शल ने कभी अपने बच्चे को अहसास नहीं होने दिया कि उसे कोई गम्भीर समस्या है। खुश रहने की चाह में उसकी चिकित्सा होती गयी। अंदर का डर कभी चेहरे पर नहीं दिखा, एक पिता को पता था, कि उसका डर उसके बच्चे को डरा सकता है। मानसिक रूप से गेब्रियल को स्वस्थ रखना ज़रूरी था, इसलिए मुश्किलें जो भी थी, पर मार्शल ने खुशियों में कमी नहीं आने दी।

    best bald dad

    हाल ही में गेब्रियल का ऑपरेशन हुआ; 9-महीनों के इलाज के बाद, वह अभी खतरे से बाहर है।

    पर हीन भावना अभी भी थी। कैंसर का इलाज आसान नहीं है। बहुत चिकित्सा के बाद, एक ८-साल का बच्चा समाज में गंजा कैसे घूमेगा? ऊपर से उसके सर पर इस कठिन चिकित्सा का दाग है, जो उसे हीन भावना दे रही थी। वह खुद को 'राक्षस' समझने लगा था, और तब मार्शल ने फैसला किया, कि जीवन के इस मोड़ पर भी वे अपने बेटे के साथ खड़े रहेंगे।

    उन्होंने भी अपने सर का मुंडन करवाया, और उस पर अपने बेटे के दाग जैसा टैटू बनवा लिया, ताकि उनके बेटे के आत्मविश्वास में कमी ना आये। अगर समाज घूर घूर कर देखेगा, तो दोनों बाप-बेटे को देखेगा।  इसी मंशा से उन्होंने संत बल्ड्रिक की योजना 'श्रेष्ठ गंजे पिता' के मुक़ाबले में भाग लिया और 5000 वोटों से सर्व प्रथम आए।

    हमने इमरान हाशमी को उनके बेटे का सुपरहीरो माना था, और आज फिर से हम एक और पिता के जज़्बे को सलाम करते हैं, जिन्होंने अपने बच्चे को कैंसर जैसी स्थिति में सबल रखा, और इलाज के बाद भी उसका आत्मविश्वास बनाये रखने के लिए उसके साथ खड़े हैं। गेब्रियल को अपने पापा का टैटू बहुत पसंद है। दोनों खुश हैं। स्वस्थ हैं, और आशा करेंगे कि वे खुश और स्वस्थ रहें।

  • 13 Jun
    Oyindrila Basu

    ऑर्लैंडो शूटर- किस मानसिकता के अधीन था ?

     

    Omar Mir Seddique Mateen

    "कुल 49 लोग मारे गये और 53 लोग ज़ख़्मी हुए, जब 29 वर्षीय मतीन ने अमरीका के ऑर्लैंडो के गे नाईट क्लब में गोलियां चलाई"

    ओमर मतीन अमरीका के न्यू यॉर्क शहर में पैदा हुए, और जहाँ तक जाना जाता है, एक अफ़ग़ानी अप्रवासियों के दल ने उसकी परवरिश की, जिन्हें अमरीका की ऍफ़ बी आई काफी दिनों से ढूंढ रही थी।

    इनकी शादी सिर्फ 4 महीने तक ही टिक पायी, और इनकी पूर्व पत्नी Sitora Yu sufi बताती हैं, कि "उन्हें बाइपोलर डिसऑर्डर था"

    रोज़ घर आ कर पत्नी पर अत्याचार, गालीगलौज, ये सब घर में आम बात हो गयी थी।

    सितोरा बताती हैं की मतीन छोटी-छोटी बातों पर गुस्से में आ जाते थे और उन्हें डांटते और मारते थे।

    वे काफी हिंसक बन चुके थे, और तभी उन्हें डर लगने लगा, और उनके परिवार ने उनको बचाने के लिए अपने पास बुला लिया।

    "जज़्बाती असन्तुलंत उन में अकसर दिखाई देता था, वे बीमार थे, और मानसिक रूप से दुर्बल भी, तनाव और सदमें में तो थे ही", ऐसा यूसुफी बताती हैं।

    ओमर मतीन समलैंगिकता के विरोध में थे, क्योंकि इस्लाम उसके खिलाफ है।

    बाइपोलर डिसऑर्डर से आक्रामक व्यव्हार हो सकता है, परन्तु यह किसी धर्म, जाति का विरोधी होने का कारण नहीं हो सकता, और ना ही आपको किसी आतंकवादी संगठन की तरफ झुकाव बढ़ाता है ।

    आतंकवादी घटना, सरे आम लोगों का क़त्ल करना इन सबके लिए मानसिक बीमारी को दोष देना सही नहीं है ।

    चलिए आज हम बाइपोलर डिसऑर्डर के बारे में बात करते हैं ।

     

    बाइपोलर डिसऑर्डर एक बीमारी है, जिसमें इंसान का मिज़ाज अचानक से बदलता रहता है।

    ऐसे में जज़्बाती व्यवहार पर इंसान का बस नहीं रहता । कभी-कभी  इंसान बहुत उदास हो सकता है, आत्मघाती मनोवृत्ति भी आ सकती है, और दूसरे ही क्षण में वह बहुत उत्तेजित और फुर्तीला पेश आ सकता है।

    दिमाग में रासायनिक समस्याओं के कारण ये मिज़ाजी डिसऑर्डर हो सकते हैं, या फिर कभी कभी आनुवंशिक कारण से भी हो सकता है।

    कई रिसर्च में देखा गया है, कि अगर एक जुड़वा बच्चे को बाइपोलर डिसऑर्डर है, तो 40% सम्भावनाएँ हैं, कि दूसरे जुड़वा भाई या बहन को भी एक सी समस्या होगी।

    अकसर प्रथम रिश्तेदारों से भी ये रोग आ सकता है।

     

    दुखद बात यह है की इस बीमारी को मिटाना असम्भव है, पर इसका इलाज हो सकता है।

    पर आपको खुद आशावादी होना पड़ेगा, ठीक होने के लिए अपने अंदर इच्छा होना ज़रूरी है।

    यो यो हनी सिंह के बारे में हमने पहले भी बात की है; उन्हें भी यही समस्या थी, पर उनके अंदर ठीक होने का जज़्बा था।

    किसी अच्छे काम से साथ या कला के प्रति रुचि होना ज़रूरी है।  इससे मस्तिष्क में सकारात्मक सोच बनी रहती है, और ऊर्जा को एक सही दिशा मिलती है। आपका काम आपकी प्रेरणा बन सकता है, ताकि आप ठीक होने की कोशिश करें।

    अगर आपके मन में मानसिक समस्या को लेकर  कोई सवाल है, तो आप बेझिझक हमारे थेरेपिस्ट से कंसल्ट कर सकते हैं ।

  • 09 Jun
    Oyindrila Basu

    विनीत विग-एक और दुखद घटना

    vineet whig

     

    Encyclopaedia Britannica हमारे बचपन का साथी था, जो हमें ज्ञान और साधारण ज्ञान  देता था।

    Britannica अंग्रेजी भाषा में लिखी गयी सबसे पुरानी ज्ञान-पुस्तक है जो आज भी प्रकाशित होती है। सर्व प्रथम ये 1768 और 1771 के बीच स्कॉटलैंड में, तीन हिस्सों में प्रकाशित हुयी थी । 4000 से भी ज्यादा लोग इस किताब के प्रकाशन में योगदान देते हैं, जिनमे 110 नोबेल खिताब के विजेता हैं और 5 अमरीका के प्रेजिडेंट हैं।

    जिस किताब की गरिमा इतनी ऊंची है, आज उसके नाम के साथ एक दुखद घटना जुड़ गयी

    Britannica के COO का आज देहांत हो गया। 15 मई 2016 ने उनको अपने खुद के हाथों से अपनी जान लेते हुए देखा। एक ऊंची इमारत के छत से कूदने से विनीत विग की मौत हुयी, साथ में मिला उनके हाथों से लिखा उनका आखिरी सन्देश ।  उसमें लिखा था,

    "मैं खुद अपनी जान ले रहा हूँ, मेरी मृत्यु के लिए कोई ज़िम्मेदार नहीं है। अब मैं ज़िन्दगी से और नहीं जूझ सकता। आत्महत्या के अलावा और कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा। मैं जानता हूँ की मैं कायर हूँ, मुझे लड़ना चाहिए था, पर अब ये सम्भव नहीं"

    47 साल के विनीत विग एक ज़िम्मेदार पिता और एक संवेदनशील पति थे।

    1992 में वे NIIT में काम करते थें जिसके बाद उन्होंने वाईस-प्रेजिडेंट के रूप में WIPRO के साथ जुड़ गए। 2014 में वे Britannica के साथ जुड़े, और अप्रैल 2015 में वे COO बने।

    दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र रह चुके विनीत, भारतीय विद्या भवन और डेल्ही पब्लिक स्कूल के alumnus भी रह चुके हैं।

    दोस्तों के लिए वे सच्चाई और निष्ठा की मूरत थे।

    फिर ऐसा क्या हुआ की उन्हें अपनी जान देनी पड़ी?

    आत्मघाती चिंताएं कई कारण से आ सकती है -उनमें कुछ कारण है भयंकर अवसाद की समस्या, दुःख, दर्द, नुकसान, हताशा, आशंका, और तनाव।

    2015 के अंत से आत्महत्या की खबरें संवाद माध्यम में छाई हुयी है। जिया खान की मृत्यु से लेकर, प्रत्युषा बनर्जी की आत्महत्या तक, आज भी twitter पर उन खबरों के आभास दिखते हैं। फिर कोटा में छात्र की मृत्यु और अब विनीत विग की दुखद मौत, ये सिलसिला कायम है।

    अमरीका में किये गए रिसर्च द्वारा साबित होता है, की 1986 से 2000 तक, आत्महत्या के कारण मृत्यु की समीक्षा घटती नज़र आई, पर ये ख़ुशी जादा दिनों तक नहीं रही, उसके बाद से 2012 तक आत्महत्या की संख्या बढ़ती जा रही है, और आज भी छवि सामान है। ये सिर्फ एक देश की समस्या नहीं है, पूरे विश्व में निराशा नामक विष फ़ैल रहा है, जिससे  मौतें हो रही है।

    निराशा से बचने के लिए, इस पर जानकारी बढ़ाना ज़रूरी है। सही काउंसलिंग ज़रूरी है।

    मस्तिष्क के साधारण व्यवहार पर आधारित मनोचिकित्सा होनी  चाहिए।

    पर खुद की मदद खुद को करनी होगी। रोज़ व्यायाम का अभ्यास करें, इससे दिमाग चुस्त रहेगा। अच्छी किताब पढ़िए, गलत चिंताएं असर कम करेंगी।

    eWellness expert जैसी संस्थाएं आपकी मदद के लिए हमेशा हैं। सही सलाह ज़रूरी है। खुद को हताश चिंताओं से दूर रखने के लिए दोस्तों की मदद ले सकते हैं।

  • 06 May
    Janhavi Dwivedi

    नारायण मूर्ति - पापा का खत लाड़ली के नाम 

    narayan murthy

    नारायण मूर्ति इनफ़ोसिस के संस्थापक और भारत की शक्तिशाली हस्तियों में से एक हैं, लेकिन  अपनी बेटी को लिखे पत्र से यह पता चलता है कि वो कितने वन्डरफुल डैड हैं।

    अक्षता,

    एक पिता बनने के बाद मुझमे इतने बदलाव आये जो मैंने कभी नहीं सोचा था। तुम्हारा आगमन मेरे जीवन में अकल्पनीय ख़ुशी और बड़ी जिम्मेदारियां लेकर आया।

    मैं न सिर्फ एक पति, एक बेटा और एक तेजी सी ग्रोथ करती कम्पनी में एक भरोसेमंद कर्मचारी होने के अलावा एक पिता था, जो अपनी बेटी के जीवन के हर पड़ाव पर एक पिता से  होने वाली उम्मीदों को आंक रहा था।

    तुम्हरे जन्म से हर पहलुओं में मेरा जीवन स्तर ऊपर उठ गया। ऑफिस में मेरा कार्य अधिक सोचा और समझा होता था, बाहर की दुनिया से मेरे लेन देन अब अधिक समझदार, गरिमामय और परिपक्व हो गए थे।

    मैं अब हर व्यक्ति से अधिक संवेदना और शिष्टता के साथ पेश आने की जरूरत महसूस करने लगा  था।

    आखिर कुछ दिनों के बाद तुम बड़ी होगी और अपने आस-पास की दुनिया को देखोगी और समझोगी, और मैं नहीं चाहता था कि, तुम कभी ये सोचो कि मैंने कहीं पर भी कोई गलत काम किया था।

    narayan murthy

    मेरा मन अक्सर तुम्हारे जन्म के बाद के शुरूआती दिनों में वापस चला जाता है। तुम्हारी माँ और मैं  अपने करियर में अपनी जड़ें जमाने के लिए संघर्ष कर रहे थे।

    हुबली में तुम्हारे जन्म के दो महीने बाद, हम तुम्हे मुंबई ले आये, लेकिन जल्दी ही हमे यह समझ में आ गया कि, एक बच्चे का पालन पोषण और साथ ही साथ करियर को सम्भालना एक मुश्किल काम था।

    तो, हमने तय किया कि अपने जीवन के शुरूआती वर्षों को तुम हुबली में अपने दादा-दादी के साथ बिताओ। जाहिर है, यह एक कठिन निर्णय था, जिसे कुछ शर्तों के साथ पालन करने में मुझे थोड़ा वक्त लगा था।

    हर सप्ताह के अंत में, मैं बेलगाम हवाई जहाज से जाता और उसके बाद एक कार किराए पर लेकर हुबली।  यह बहुत महंगा था, लेकिन मैं तुम्हे देखे बिना नहीं रह सकता था।

    मुझे आश्चर्य होता था यह देख कर कि, कैसे तुमने हुबली में अपनी खुद की छोटी सी खुशहाल दुनिया बनाई थी, अपने दादा दादी और प्यार करने वाली चाची और रिश्तेदारों से घिरी हुई, अपने जीवन में हमारी अनुपस्थति से बेखबर।

    मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि वे कौन से गुण हैं, जिन्हे मैंने अपने बच्चों को दिया है?

    मैं उन्हें बताता हूँ कि यह तुम्हारी माँ हैं जिन्होंने इस महान जिम्मेदारी को अपने कंधों पर लिया, और तुम्हे एक अच्छी शख्शियत बनाने के लिए मैं उनका बहुत आभारी हूँ। वह मूल्यों को बोलकर बताने की अपेक्षा उसे  गतिविधि द्वारा अधिक बताती थी। उन्होंने रोहन और तुम्हे सादगी और आत्मसंयम के महत्व को सिखाया।

    इसकी एक घटना है, बैंगलौर में जब तुम्हे एक नाटक के लिए चुना गया था, जिसमें  तुम्हे एक विशेष ड्रेस पहननी थी,यह अस्सी के दशक के मध्य की बात है, जब इंफोसिस का काम शुरू ही हुआ था और हमारे पास किसी भी गैर-बुनियादी वस्तुओं पर खर्च करने के लिए पैसा नहीं था।

    तुम्हारी माँ ने तुम्हे समझाया कि हम पोशाक खरीदने में सक्षम नहीं हैं और इसलिए तुम नाटक में भाग मत लो। बहुत बाद में, तुमने मुझसे कहा था कि तुम इस बात को समझ नहीं पायी थी।

    हमें पता था कि एक बच्चे को स्कूल में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम को छोड़ने के लिए कहना एक कठोर कदम है, लेकिन, हम जानते हैं कि तुमने इससे बहुत कुछ सीखा था - आत्मसंयम का महत्व

    हमारा जीवन तब से बहुत बदल गया है और अब हमारे पास पर्याप्त पैसा है। लेकिन, तुम जानती हो, हमारी जीवन शैली अब भी साधारण है।

    एक बार आर्थिक रूप से सम्पन्न होने पर, मुझे याद है मैंने तुम्हारी माँ के साथ तुम बच्चों को कार से स्कूल भेजने की बात की थी, लेकिन तुम्हारी माँ ने जोर देकर कहा कि रोहन और तुम नियमित रूप से ऑटोरिक्शा में अपने सहपाठियों के साथ स्कूल जाओगे ।

    तुम लोगों ने रिक्शा चाचा' के साथ बहुत अच्छी दोस्ती कर ली थी, और ऑटो में अन्य बच्चों के साथ हंसी मजाक करते आते थे।

    जीवन में सरल चीजें अक्सर सबसे ज्यादा ख़ुशी देती हैं, और वे मुफ्त में मिलती हैं।

    तुम अक्सर मुझसे पूछती थी कि क्यों हमारे घर पर कोई टेलीविजन नहीं है जबकि तुम्हारे बाकि दोस्त टी वी पर देखे हुए प्रोग्राम्स की चर्चा करते थे।

    तुम्हारी  माँ ने शुरू में ही ये फैसला किया था कि, हमारे घर में कोई टीवी नहीं होगा, ताकि घर में पढ़ाई करने,चर्चा करने और दोस्तों से मिलने जैसी बातों के लिए समय होगा।

    उन्होंने जोर देकर कहा कि घर पर सीखने में सहायक वातावरण बनने लिए यह जरूरी है। 

    इसलिए, हर रात 8 बजे से 10 बजे के बीच का समय हम इसके लिए समर्पित करते थे, जो पूरे परिवार को एक साथ उत्पादक वातावरण में लाता था। 

    रोहन और तुम अपने स्कूल का काम करते, तुम्हारी माँ और मैं इतिहास, साहित्य, भौतिकी, गणित, और इंजीनियरिंग पर किताबें पढ़ते या कोई ऑफिस का काम करते।

    बहुत कुछ कहा जाता है कि कैसे मातृत्व एक स्त्री के जीवन में बहुत से बदलावों को लाता है, लेकिन शायद ही हम कभी पिता बनने के बाद एक आदमी में आये परिवर्तनों की बात करते हैं।

    एक बेटी का जन्म एक आदमी को और भी अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार बना देता है, और इसलिए यह कहा जाता है, पिता-पुत्री के बंधन से ज्यादा खूबसूरत बंधन कोई नहीं होता।

    पिता एक बच्चे के व्यक्तित्व को आकार देने में एक बड़ी भूमिका निभाते हैं, और इसीलिए वे अपनी नन्ही परी के लिए ज्यादा प्रोटेक्टिव होते हैं।

    आईटी सम्राट नारायणमूर्ति इन भावनाओं के कोई अपवाद नहीं थे, जब वह एक बेटी के पिता बने। इससे जीवन के प्रति उनकी धारणा बदल गई, और उन्हें पहलू से भी ज्यादा समझदार बना दिया।

    एक पिता बनने से लेकर  दादा बनने तक के सफर को साझा करते हुए नारायण मूर्ति ने अपनी बेटी अक्षता को पत्र लिखा था, जिसमे जीवन के बहुत ही महत्वपूर्ण सबक शामिल हैं।

    akshta rishi

    यह पूरी तरह से एक सर्वविदित तथ्य है कि जब एक बेटी की शादी हो जाती है, एक पिता को इसके बारे में मिला जुला अहसास होता है।

    उसे इस बात से नफरत होती है कि, उसकी बेटी की जिंदगी में कोई अन्य है, जिसके साथ वह अपना प्यार साझा करेगी - वो अटेंशन जो पहले अकेले उनकी थी अब एक स्मार्ट, कॉन्फिडेंट, नवयुवक ने ले ली।

    मैंने भी, थोड़ा दुःख और जलन महसूस किया था जब तुमने बताया था कि तुम्हे तुम्हारा जीवन साथी मिल गया है।

    लेकिन जब मैं ऋषि से मिला और जैसा तुमने बताया था उसे वैसा ही पाया - प्रतिभावान, सुंदर, और सबसे महत्वपूर्ण बात, ईमानदार-मैं समझ गया क्यों उसने तुम्हारा दिल चुरा लिया और तब मैंने तुम्हारे साथ उसके प्यार को स्वीकार कर लिया।

    कुछ महीने पहले, तुमने हमें नाना-नानी बनने का सौभाग्य दिया, जो मेरे लिए गर्व की बात है। यदि पहली बार तुम्हे अपनी बाहों में लेना मेरे लिए अवर्णनीय आनन्द था, तो तुम्हरे घर सांता मोनिका में कृष्णा, तुम्हारी प्यारी बेटी को देखना पूरी तरह एक अलग अनुभव था।

    मैं आश्चर्य चकित था, क्या अब से मुझे एक बुद्धिमान, ग्रैंड ओल्ड मैन की तरह व्यवहार करना होगा! लेकिन, फिर मुझे बढ़ती उम्र का बोनस और नाना-नानी बनने का एहसास हुआ।

    मुझे एक बच्चे को लाड़ करने की खुशी मिल रही है! इसके अलावा, तुम जानती हो, नाना-नातिन दोनों के कॉमन दुश्मन कौन होते हैं- माता-पिता !

    मुझे विश्वास  है कि जब तुम्हारी गलतियां निकालनी होंगी तो मैं और कृष्णा एक ही पेज पर एक के बाद एक नोट्स और लाइनों की अदला बदली करेंगें।

    जैसे आप अपने लक्ष्यों का पीछा करते हैं और एक संतुष्ट जीवन जीते हैं, याद रखो हमारे पास जीने के लिए एक ही धरती है, और वह अब खतरे में है, याद रखो यह तुम्हारी जिम्मेदारी है कि तुम्हे हमसे जैसी मिली थी, उससे भी बेहतर धरती बनाकर इसे कृष्णा को देना होगा ।

    अपना ध्यान रखना, मेरी बच्ची

    प्यार से, 'अप्पा '