कुल 30 कहानियाँ

  • 09 Nov
    Oyindrila Basu

    प्यार तूने क्या किया

    cheating in love

    समर: तुम्हें समझ में नहीं आ रहा, कि मैं तुमसे अब कोई संबंध नहीं रखना चाहता? प्लीज मुझे दुबारा फ़ोन मत करना।

    मैं: देखो, तुम क्यों ऐसा कर रहे हो? मुझे पता है, कि तुम भी मुझसे प्यार करते हो, लेकिन, क्या है जिससे तुम परेशान हो?

    समर: ऐसा कुछ नहीं है, हमारा रिश्ता आगे नहीं जा सकता, मुझे ज़िन्दगी में बहुत कुछ करना है, मेरे पास इन चीज़ों के लिए वक़्त नहीं है।

    मैं: नहीं देखो समर, प्लीज मेरी बात सुनो, हम दोस्त बनकर भी तो रह सकते हैं, हम इस रिश्ते को वक़्त देतें हैं, अगर कई साल बाद भी तुमको ऐसा ही लगा, तब सोचेंगे।

    समर: तुम पागल हो! मेरे पास कोई फ़ालतू वक़्त नहीं है, मेरी एक गर्लफ्रेंड है, जैसा कि तुम जानती हो, और मैं तुमसे आगे कभी भी बात नहीं करना चाहता।

     

    यह टेलीफोन की बातचीत मुझे आज भी याद है, यह हमारे बीच आखिरी बातचीत थी।

    इसे सुनकर कोई भी कह सकता है, कि मैं बेवक़ूफ़ थी, भरम में जी रही थी। लेकिन तब मैं सिर्फ २० की थी, और मुझे लगता था, सब फिल्मों की तरह है। जब वी मेट से काफी प्रभावित थी मैं, "जब कोई प्यार में होता है, तो कुछ सही गलत नहीं होता"

    पर मेरा भरोसा जल्द हो टूट गया, और प्यार पर से विश्वास भी टूटने ही लगा था।

    उसने मुझे पहली बार देखा था, जब मैं अस्मिता के कॉलेज में गयी थी। अस्मिता मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी, और वह समर से मन ही मन प्यार करने लगी थी। कच्ची उम्र में, उसने समर को ही अपने ध्यान में डाल लिया था।

    पर अस्मिता से मुझे पता चला, कि समर ने मेरे  बारे में उससे पूछा है। मुझे अचानक से एक उत्साह महसूस हुआ, मुझे ऐसा नहीं लगना चाहिए था, लेकिन मैं हमेशा गर्ल्स स्कूल और कॉलेज में रही एक लड़की थी, और कोई लड़का मुझ में दिलचस्पी ले रहा था, इस बात से मैं खुश थी।

    मेरी फेसबुक पर उससे बात शुरू हुयी, उसने पहला कदम बढ़ाया। बातें बढ़ती गयी, मैं अस्मिता के बारे में ही बात करती थी। लेकिन वह अस्मिता के बारे में नहीं सुनना चाहता था।

    मैंने सोच लिया कि, मैं उससे मिलूंगी। अस्मिता उसे चाहती है, तो ये बात उसे पता होनी चाहिए।

    हम एक दिन मिलें, सिटी सेंटर में, अस्मिता और रीतिका मेरे साथ थे। पांच बजने वाले थे, और मेरे पेट में गरगराहट बढ़ रही थी। वह आया, मेरे दोस्त चले गये, मैं रह गयी समर के साथ।

    उस दिन सिटी सेंटर लोगों से भरा हुआ था, इसी बीच मेरी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी गलती शुरू होने वाली थी।

    मैं अस्मिता के बारे में कहना चाहती थी, पर उसने कह दिया की वह अस्मिता को नहीं मुझे चाहता है।

    ये भी कहा कि अस्मिता कॉलेज में उसकी मुंह बोली गर्ल फ्रेंड है ।

    और मैं थी इतनी डफर,  की उसे सत्यवादी हरिश्चंद्र समझ बैठी। पर ये सिर्फ उसकी एक चाल थी, ये मैं नहीं समझ पायी।

    दिन बीतते गए, फ़ोन पर हमारी बातें चलती गयी, हम कभी-कभी मिलने भी लगें।

    रास्ते सुहाने होते गए, हलके स्पर्श में मिठास थी, और थी हमारी बातें।

    लेकिन ६ महीनों में सब कुछ बदल रहा था। अचानक, समर मुझसे दूर होने लगा था।

    मेरा फ़ोन नहीं उठाता था। मुझसे बात नहीं करना चाहता था। जब उसकी मर्ज़ी होती, मिलने बुलाता, पर उस दौरान भी बात नहीं करता।

    अब सिर्फ मैं उसे फ़ोन करती थी।

    दोस्तों, जब आप ये देखें, की रिश्ते में सिर्फ आप ही उत्साही हैं, आप ही फ़ोन कर रहे हैं, आप ही घूमने जाना चाहते हैं, और दूसरी ओर से कोई इच्छा नहीं है, समझ लें कि रिश्ता एक तरफा है।

    मैं उससे प्यार करती थी, लेकिन वह मुझे सिर्फ इस्तेमाल कर रहा था, अपने दोस्तों से शर्त जीतने के लिए, कि वह मुझे पटा लेगा। और यह बात मुझे बाद में पता चली। उसके ही एक दोस्त ने मुझे बताया।

    मेरी दुनिया बदल चुकी थी, मैं खुद से नफरत करने लगी थी, मेरा आत्मविश्वास हिल गया था। मैं इतनी बेवक़ूफ़ कैसी हो सकती थी, मुझे सब पता था, और मैं अंधे की तरह एक मृगतृष्णा की ओर भागती गयी!

    निराशा मेरी ज़िन्दगी का हिस्सा बन चुकी थी, और इस हार को बर्दाश्त न कर पाते हुए, मैं बार बार समर को वापस लाने की नाकाम कोशिश में लगी थी। उसे मेल भेजना, प्रेम गीत भेजना, कभी-कभी गाली लिख कर भेजना, अब यही मेरा काम था।

    मैं खुद से जूझ रही थी, पर मैंने पढ़ाई, या कॉलेज बंद नहीं की, यह  शायद मेरी अंदरूनी शक्ति ही थी, जिससे मैं उबर पायी हूँ।

    मेरे परिवार ने मेरा बहुत साथ दिया था। मैंने उन्हें कभी नहीं बताया कि मेरे साथ क्या हुआ, पर अपने चिड़चिड़ेपन से सब को परेशान कर रही थी मैं।

    खाना बंद था, तबियत बिगड़ रही थी मेरी

    एक दिन मैंने बहुत मेहनत से समर के बैंगलोर का नंबर पता किया (वह नौकरी मिलने के बाद वहां गया हुआ था) , पर उसने फ़ोन उठाया भी, तो सिर्फ इतना कहा, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुयी मुझे यहां फ़ोन करने की, किस्से नंबर मिला तुम्हें? आइन्दा यहां फ़ोन किया तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा"

    उसके लिए ये सब खेल था, लेकिन मेरे लिए वह पहला प्यार था, और आत्मसम्मान को पीछे रख कर भी मैं उसे मनाना चाहती थी।

    लेकिन ऐसे एक तर्फे रिश्ते से ज़िन्दगी नहीं चलती। अगर आप किसी से प्यार करते हो और वह नहीं करता, तो आप चाहे जितनी भी कोशिश कर लो कुछ नहीं हो सकता। और आत्मसम्मान सबसे एहम होता है, और यहां, मैं सब कुछ भूल चुकी थी।

    ३ साल तक खुद पर घिन, और नफरत से मैं खुद को खत्म करना चाहती थी, लेकिन शायद मेरे मनोबल ने मुझे उस हद तक टूटने नहीं दिया।

    इतने अपमान, असम्मान के बाद भी मैं ठीक थी, मैंने ठान लिया की अब मैं नहीं रोऊंगी, मैं ज़िन्दगी में आगे बढ़ूंगी, कुछ करूँगी, एक हादसे की वजह से मेरी पूरी ज़िन्दगी खराब नहीं हो सकती।

    आज मैं खुश हूँ, शादी शुदा हूँ, समर मुझे याद भी नहीं है, वह मेरी ज़िन्दगी में मायने नहीं रखता। लेकिन उसके धोखे को मैं माफ़ तो नहीं कर पायी हूँ।

    पर ये कहानी, मेरे पति पर खत्म होती है, जो इस घटना से भी जुड़े हुए हैं, (मैं नहीं बताऊंगी कैसे, या उनका नाम) और उनकी ही वजह से मैं इससे ख़राब हालत से उभर पायी हूँ। आज मैं खुश हूँ, मेरे पति ने मुझे बहुत सहारा दिया है, मानसिक रूप से, जज़्बाती रूप से वे हमेशा मेरे साथ रहे हैं।

    प्यार करना मैंने समर से मिलकर सीखा, लेकिन प्यार का सही मतलब, और वादे का सही मतलब, मुझे मेरे पति ने समझाया।

    उनसे मिलकर, उनके साथ रिश्ते में रहकर, मुझे प्यार पर फिर से यकीन हो चला।

  • 29 Sep
    Oyindrila Basu

    करण जौहर की निराशा की कहानी

    karan johar

     

    हम सभी के जीवन में अच्छे और बुरे समय का प्रभाव होता है, और ये बात सही भी है, की सितारों के जीवन में भी आम जज़्बात और समस्याएं होती है। पर जो ख़ास बात है, कि आजकल फिल्म जगत के मशहूर सितारे भी अपनी समस्याओं का सामना करते हुए, उन पर साफ़ रूप से विचार करते हैं, उनका समाज के प्रति ये कर्तव्य बोध हमें चकित और मोहित कर देता है।

    पहले दीपिका पदुकोने फिर इलियाना डिसूजा ने अपनी निराशा पर चर्चा किया और अब करण जौहर भी  अपनी मानसिक समस्याओं पर खुले रूप से विचार करते हुए नज़र आ रहे हैं।

    बॉलीवुड के सबसे जाने माने निर्देशकों में से एक हैं करण जौहर,  जो सिनेमा के माध्यम से हमें सपने दिखाते हैं, प्यार बिखेरते हैं, उन्हें निराशा और तनाव से गुज़रना पड़ सकता है, यकीन नहीं होता।

    पर सच है।

    "बॉलीवुड में रिश्तों का क्या अर्थ है, अकसर समझ में नहीं आता; क्या कोई रिश्ता या जज़्बात केवल एक सिनेमा तक सीमित है, या आप उसके साथ जीवन में आगे जाना चाहते हैं, इस असमंजस में द्वन्दित होते हैं", ऐसा मानना है, करण जौहर का।

    फिल्म इंडस्ट्री के लोग अकसर अकेलेपन का शिकार होते हैं।

    सिनेमा में जीने वाले लोग, असल रिश्तों को निभा नहीं पाते, उनके रिश्ते कौन से सच्चे होते हैं कौन से नहीं, पता नहीं होता। मतलब के लिए सभी साथ होते हैं, लेकिन बाद में नहीं, ऐसा हमने हमेशा सुना है, पर सच्चाई करण जी स्वीकारते हैं।

    "४४ साल के उम्र में, आपका कोई साथी ना हो, या बच्चे ना हो, तो बेहद मुश्किल होता है", ये भी कहते हैं "कुछ कुछ होता है" के निर्माता।

    उन्होंने अब तक शादी नहीं की, और विभिन्न कारण वश उनके जेंडर टाइप पर काफी सवाल उठे हैं।

    कुछ ही दिन पहले उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, कि वे बचपन से चुपचाप रहने वालों में से हैं, किसी से भी आगे बढ़ कर दोस्ती करने वाली साहस या प्रकृति उनकी नही है, और शायद इसी वजह से वे आज भी अकेले हैं, लेकिन समाज सेलिब्रिटीज को भी नहीं छोड़ता, बाते बनाना सबका काम है।

    जब इंसान मानसिक रूप से टूट चुका हो, निराशा में हो, तब समाज के उटपटांग सवालों को सम्हालना आसान नहीं होता हम समझते हैं।

    पिता की मृत्यु को भी वह स्वीकार नहीं पाए हैं, और यही कारण है, की वे निराशा और तनाव से २ सालों तक जूझते रहे। पर सीखने वाली बात है, कि उनका मानसिक प्रभाव उनके काम पर कभी नहीं पड़ा, वे आज भी उतने ही दिल से सिनेमा बनाते हैं।

    हाल ही में रिलीज़ होनेवाली है, उनकी "ऐ दिल है मुश्किल", पर प्यार बांटने का तरीका उनका आज भी बरकरार है। हम उनकी दृढ़ता और साहस को नमन करते हैं।

    उन्होंने निराशा को स्वीकारा, और उसे दूर भगाने के लिए इलाज का सहारा भी लिया, इसमें कोई शर्म या कलंक नहीं है।

    मानसिक स्वास्थ्य सभी के लिए अहम है, अगर शरीर की चिकित्सा ज़रूरी है, तो मन का इलाज भी अवश्य ज़रूरी है।

  • 24 Aug
    Oyindrila Basu

    युवराज सिंह-कैंसर से लड़ाई

    yuvraj singh

     

    "अगर मैं सोचूँ, तो मेरी ज़िन्दगी 'क' अक्षर से जुड़ी हुयी है। मैं चंडीगढ़ में पैदा हुआ, क्रिकेटर बना, और अपनी करियर में एक ही चीज़ छह, कप, और अब मेरी ज़िन्दगी में एक और नई चीज़ आई है, और वह है कैंसर, जो 'क' से ही है”. - युवराज सिंह, भारतीय क्रिकेटर।

    इस हंसमुखता को खुद में बनाये रखना बहुत ज़रूरी है। ज़िन्दगी को हँसी में उड़ाने वाले में क्षमता होती है, कई मुश्किलों से लड़ने की, और ऐसी ही एक मुश्किल का नाम कैंसर भी हो सकता है।

     

    कैंसर का पता चलने पर--

    १. इंसान उसे अस्वीकार करता है कि इतनी गंभीर बीमारी मुझे नहीं हो सकती, या मुझे ही क्यों हुई ।

     

    २. फिर वे चिंतित होते हैं, कि ज़िन्दगी में अब कुछ ही  दिन बचे हैं, फिर यह चिंता कि, मेरे बाद मेरे परिवार का क्या होगा, और फिर चिकित्सा कैसे और कितना धन लगेगा ।

     

    ३. काम के क्षेत्र में भी दुर्बल हो जाते हैं।

     

    ४. परिवार से रिश्ता भी कड़वा हो जाता है, क्योंकि जो आप के लिए चिंता करते हैं, आप सोचते हैं, की वे हमदर्दी जता रहे हैं।

     

    परेशान होने से कैंसर का समाधान नहीं होगा, बल्कि गलत चिंता, आपके ठीक होने की इच्छा को मार देगी। मुकाबले से पहले ही हार मान लेंगे आप।

    कैंसर अभी इलाज किया जा सकता है। देश-विदेश में कई तरह की दवाई, और ऑपरेशन से हम कैंसर मुक्त हो सकते हैं।

    दिमाग में बैठी गलत धारणा इनका कारण है-

    १. कैंसर जानलेवा है।

    २. कैंसर संक्रामक है।

    ३. कैंसर में बाल झड़ते है।

    ये धारणा सही नहीं है, कैंसर का सही वक़्त पर इलाज हो, तो इंसान स्वस्थ हो सकता है। कैंसर में बाल नहीं झड़ते, उसके इलाजों के कुछ दुष्प्रभाव से ये हो सकता है।

    पहले तो इस बीमारी के बारे में अपनी जानकारी बढ़ाएं।

    डॉक्टर्स से बातचीत करें, वे आपकी काफी मदद कर पाएंगे। लेकिन सब से अच्छी चिकित्सा आप खुद कर पाएंगे।

    १. मन अपनी ढाल बनाएं। अगर आप मन से दृढ़ हो, तो कोई बड़ी घटना आपको कमज़ोर नहीं कर पाएगी। खुद को समझाएं की आप कर सकते हैं।

    २. सकारात्मक चिंताओं को बढ़ावा दें। अपने आज में जियें। भविष्य की चिंता आपके आज की ख़ुशी को खराब कर सकती है।

    ३. बीमारी के प्रति अपने डर को भगाएं। खुद निश्चय करें, की आप इस बीमारी को हराएंगे। इस पर विजयी होंगे। अगर आप ठान लेंगे, तो कोई न कोई रास्ता आपको ज़रूर मिलेगा, आप चिकित्सा के लिए उत्सुक होंगे। घबराहट से आप कैंसर का मुक़ाबला नहीं कर पाएंगे।

    ४. हंसना ज़रूरी है, हंसमुख इंसान मुश्किल से मुश्किल वक़्त को, अपने ठहाकों से हल्का कर सकता है। कैंसर पर भी हंस लें थोड़ा सा, और कैंसर को मारें सिक्सर 

    ५. अपने डर या बीमारी को, एक शत्रु का चेहरा दें। और 'जी-वन' जैसे 'रा-वन' को हराता है, वीडियो गेम में, आप भी अपने शत्रु को हराने का प्रयास करें। इस प्रकार आपको मुक़ाबला करने की प्रेरणा मिलेगी। तो अपना पसंदीदा वीडियो गेम उठाएं, और खेल में इस भावना को जगाएं।

    ६. दूसरों से प्यार और भरोसा लें, अपने उपलब्धि से अपने आने वाले ज़िन्दगी को बेहतर करें, ज़िन्दगी की ओर अपना नजरिया बदलें।

     

     

    कैंसर से पीड़ित व्यक्ति को डॉक्टर की आवश्यकता अधिक होती है, यह मनीषा जी मानती है। डॉक्टर से बात करने पर, आप कैंसर को ठीक से समझ पाएंगे, और आपका डर कम होगा, तो आप इससे लड़ पाएंगे।

    आपका रवैया यहां अहम होता है। ज़िन्दगी के प्रति सकारात्मक रहे, तो यह आसान हो जाएगा। "हंसो , जियो, मुसकुराओ smile

  • 24 Jun
    Oyindrila Basu

    जोश मार्शल- श्रेष्ठ गंजे पिता

    best bald dad

     

     एक पिता ने फिर से अपने बच्चे के लिए सर मुंडन करवा कर अपना प्रेम जाहिर किया।

    एक बार फिर साबित हो गया, की बच्चों से बढ़ कर माता-पिता के लिए और कोई चीज़ अहम नहीं।

    आपके बच्चे के सामने और कुछ मायने नहीं रखता। न डर, ना भय, ना दर्द, ना सामाजिक प्रतिष्ठा ना छवि, कुछ भी मायने नहीं रखता ।

    हम बात कर रहे है 28 वर्षीय जोश मार्शल के बारे में जिन्होंने खुद को अपने 8-साल के बेटे का जुड़वा बना लिया ताकि उसमें आत्मविश्वास की कमी ना आये।

    मार्शल के बेटे को 2015  में anaplastic astrocytoma नामक बीमारी का पता चला था। यह एक प्रकार मस्तिष्क में पलटे ट्यूमर का नाम है, जो कैंसर जितना ही खतरनाक है। बहुत कम लोग इसके बारे में जानते हैं। बालक गेब्रियल तब से अपनी बीमारी से लड़ रहा है, पर वह किसी भी क्षण अकेला नहीं था, उसका पिता उसके साथ खड़ा रहा।

    मार्शल ने कभी अपने बच्चे को अहसास नहीं होने दिया कि उसे कोई गम्भीर समस्या है। खुश रहने की चाह में उसकी चिकित्सा होती गयी। अंदर का डर कभी चेहरे पर नहीं दिखा, एक पिता को पता था, कि उसका डर उसके बच्चे को डरा सकता है। मानसिक रूप से गेब्रियल को स्वस्थ रखना ज़रूरी था, इसलिए मुश्किलें जो भी थी, पर मार्शल ने खुशियों में कमी नहीं आने दी।

    best bald dad

    हाल ही में गेब्रियल का ऑपरेशन हुआ; 9-महीनों के इलाज के बाद, वह अभी खतरे से बाहर है।

    पर हीन भावना अभी भी थी। कैंसर का इलाज आसान नहीं है। बहुत चिकित्सा के बाद, एक ८-साल का बच्चा समाज में गंजा कैसे घूमेगा? ऊपर से उसके सर पर इस कठिन चिकित्सा का दाग है, जो उसे हीन भावना दे रही थी। वह खुद को 'राक्षस' समझने लगा था, और तब मार्शल ने फैसला किया, कि जीवन के इस मोड़ पर भी वे अपने बेटे के साथ खड़े रहेंगे।

    उन्होंने भी अपने सर का मुंडन करवाया, और उस पर अपने बेटे के दाग जैसा टैटू बनवा लिया, ताकि उनके बेटे के आत्मविश्वास में कमी ना आये। अगर समाज घूर घूर कर देखेगा, तो दोनों बाप-बेटे को देखेगा।  इसी मंशा से उन्होंने संत बल्ड्रिक की योजना 'श्रेष्ठ गंजे पिता' के मुक़ाबले में भाग लिया और 5000 वोटों से सर्व प्रथम आए।

    हमने इमरान हाशमी को उनके बेटे का सुपरहीरो माना था, और आज फिर से हम एक और पिता के जज़्बे को सलाम करते हैं, जिन्होंने अपने बच्चे को कैंसर जैसी स्थिति में सबल रखा, और इलाज के बाद भी उसका आत्मविश्वास बनाये रखने के लिए उसके साथ खड़े हैं। गेब्रियल को अपने पापा का टैटू बहुत पसंद है। दोनों खुश हैं। स्वस्थ हैं, और आशा करेंगे कि वे खुश और स्वस्थ रहें।

  • 13 Jun
    Oyindrila Basu

    ऑर्लैंडो शूटर- किस मानसिकता के अधीन था ?

     

    Omar Mir Seddique Mateen

    "कुल 49 लोग मारे गये और 53 लोग ज़ख़्मी हुए, जब 29 वर्षीय मतीन ने अमरीका के ऑर्लैंडो के गे नाईट क्लब में गोलियां चलाई"

    ओमर मतीन अमरीका के न्यू यॉर्क शहर में पैदा हुए, और जहाँ तक जाना जाता है, एक अफ़ग़ानी अप्रवासियों के दल ने उसकी परवरिश की, जिन्हें अमरीका की ऍफ़ बी आई काफी दिनों से ढूंढ रही थी।

    इनकी शादी सिर्फ 4 महीने तक ही टिक पायी, और इनकी पूर्व पत्नी Sitora Yu sufi बताती हैं, कि "उन्हें बाइपोलर डिसऑर्डर था"

    रोज़ घर आ कर पत्नी पर अत्याचार, गालीगलौज, ये सब घर में आम बात हो गयी थी।

    सितोरा बताती हैं की मतीन छोटी-छोटी बातों पर गुस्से में आ जाते थे और उन्हें डांटते और मारते थे।

    वे काफी हिंसक बन चुके थे, और तभी उन्हें डर लगने लगा, और उनके परिवार ने उनको बचाने के लिए अपने पास बुला लिया।

    "जज़्बाती असन्तुलंत उन में अकसर दिखाई देता था, वे बीमार थे, और मानसिक रूप से दुर्बल भी, तनाव और सदमें में तो थे ही", ऐसा यूसुफी बताती हैं।

    ओमर मतीन समलैंगिकता के विरोध में थे, क्योंकि इस्लाम उसके खिलाफ है।

    बाइपोलर डिसऑर्डर से आक्रामक व्यव्हार हो सकता है, परन्तु यह किसी धर्म, जाति का विरोधी होने का कारण नहीं हो सकता, और ना ही आपको किसी आतंकवादी संगठन की तरफ झुकाव बढ़ाता है ।

    आतंकवादी घटना, सरे आम लोगों का क़त्ल करना इन सबके लिए मानसिक बीमारी को दोष देना सही नहीं है ।

    चलिए आज हम बाइपोलर डिसऑर्डर के बारे में बात करते हैं ।

     

    बाइपोलर डिसऑर्डर एक बीमारी है, जिसमें इंसान का मिज़ाज अचानक से बदलता रहता है।

    ऐसे में जज़्बाती व्यवहार पर इंसान का बस नहीं रहता । कभी-कभी  इंसान बहुत उदास हो सकता है, आत्मघाती मनोवृत्ति भी आ सकती है, और दूसरे ही क्षण में वह बहुत उत्तेजित और फुर्तीला पेश आ सकता है।

    दिमाग में रासायनिक समस्याओं के कारण ये मिज़ाजी डिसऑर्डर हो सकते हैं, या फिर कभी कभी आनुवंशिक कारण से भी हो सकता है।

    कई रिसर्च में देखा गया है, कि अगर एक जुड़वा बच्चे को बाइपोलर डिसऑर्डर है, तो 40% सम्भावनाएँ हैं, कि दूसरे जुड़वा भाई या बहन को भी एक सी समस्या होगी।

    अकसर प्रथम रिश्तेदारों से भी ये रोग आ सकता है।

     

    दुखद बात यह है की इस बीमारी को मिटाना असम्भव है, पर इसका इलाज हो सकता है।

    पर आपको खुद आशावादी होना पड़ेगा, ठीक होने के लिए अपने अंदर इच्छा होना ज़रूरी है।

    यो यो हनी सिंह के बारे में हमने पहले भी बात की है; उन्हें भी यही समस्या थी, पर उनके अंदर ठीक होने का जज़्बा था।

    किसी अच्छे काम से साथ या कला के प्रति रुचि होना ज़रूरी है।  इससे मस्तिष्क में सकारात्मक सोच बनी रहती है, और ऊर्जा को एक सही दिशा मिलती है। आपका काम आपकी प्रेरणा बन सकता है, ताकि आप ठीक होने की कोशिश करें।

    अगर आपके मन में मानसिक समस्या को लेकर  कोई सवाल है, तो आप बेझिझक हमारे थेरेपिस्ट से कंसल्ट कर सकते हैं ।