कुल 30 कहानियाँ

  • 29 Dec
    Shiva Raman Pandey

    मुझे आईने से नफरत थी

    MUJHE aaine se naftrat hai

    मैं इन सभी लड़कियों को देखती कि जब वे तैयार हो जाती हैं तो खुद को ख़ुशी से आईने में निहारतीं हैं। मुझे उन सब से ईर्ष्या होती है। मेरी ये इच्छा होती है कि मैं भी खुद का सामना इसी प्रकार कर सकूं। लेकिन सच्चाई ये है कि मैं आईने से नफरत करती हूँ। मुझे इससे डर लगता है कि ये मुझे क्या दिखा सकता है। क्या ये मुझे एक फूली हुई गुड़िया के रूप में दिखायेगा,या एक झुर्रियों वाली बूढी स्त्री के रूप में दिखायेगा?

    मुझे ऐसा लगता था कि मैं मुरझा रही हूँ फिर भी मैं खुद को खाने के पास नहीं ला पाती थी। मुझे ऐसा लगता था की खाने का हर निवाला मेरे शरीर में कई परतें जोड़ देगा। मैंने ज्यादा से ज्यादा ढीले कपड़े पहनना शुरू कर दिया। मैंने बाहर जाना कम कर दिया। मैंने खुद को अपने कमरे में बंद कर लिया। मेरे माता-पिता चिंतित थे लेकिन क्या करना है ये नही जानते थे। वे सोचते थे की ये सिर्फ किशोरावस्था में बुरे ब्रेक -अप के बाद उत्पन्न मनोस्थिति है। ऐसा सिर्फ वे ही जानते थे।

     मैंने खुद को खरोंचना शुरू कर दिया। इससे जो दर्द होता वह मुझे मेरे शरीर के बारे में सोचने से रोक देता था। मुझे मेरे शरीर से नफरत थी। अगर यह इतना डरावना है तो अगर कुछ खरोंचे लग जायेंगे तो क्या फर्क पड़ेगा। एक दिन मेरी माँ मेरे कमरे में आई जब मैं यह काम कर रही थी, ये देख कर उन्हें जो आघात लगा वह अकल्पनीय था। मैं ये कह सकती हूँ , कि वो सच में डर गई थीं । एक डॉक्टर आये और उन्होंने मुझे हॉस्पिटल में भर्ती करने को कहा।

    वे मुझे खाने को कहते थे क्योंकि मैं जरूरी पोषक तत्व खोती जा रही थी। मैं खाने का विरोध करती थी क्योंकि मैं वजन नहीं बढ़ाना चाहती थी। तब उन्होंने एक मनोचिकित्सक को मेरे पास भेजा। पहले मैं संशय में थी लेकिन जब मैंने उनसे बात की तो मुझे ये महसूस हुआ कि वे जानती हैं कि मैं किस दौर से गुजर रही हूँ। हमने एक साथ बहुत से कलात्मक कार्य किये, और उन्होंने मुझे बताया की वे मेरे जैसी दूसरी लड़कियों के साथ काम कर चुकी हैं और अब वे कभी आईने से नही डरती हैं।

    धीरे -धीरे मैं अपने शरीर के साथ सहज होने लगी। धीमे -धीमे मैं कुछ समय के लिए बाहर जाने लगी। मैंने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू कर दी। मैंने स्वयं को फिर कभी कमरे में नही छुपाया। आज पूरे दो साल हो गये हैं,जब मुझे हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। आज दिवाली है और मैं तैयार होकर स्वयं को आईने में निहार रही हूँ।अब मैं कभी आईने से नफरत नही करती।

     

  • 28 Dec
    Shiva Raman Pandey

    वो रातें बीत गई

    VO BEETI RATEN

    सारी रात जागे रहना कहीं से भी रोमांटिक नहीं होता है। अगर आप सो सकते हैं तो आपको सो जाना चाहिए। नींद को खोने का कोई फायदा नही जब आपके पास न तो : एक रोमांटिक साथी,न कोई जॉब , कुछ न हो। पूछो किसी से जो सोना चाहता है पर सो नही सकता। मुझे नही याद है मैं पिछले दिनों कब शांतिपूर्वक सोया। मैं एक फुटबॉल का खिलाडी था, लेकिन जो इस देश के लिए कुछ नही कर पाया।

    मैं उस समय बहुत छोटा था यह समझने के लिए कि मुझे खेल में असली मौका पाने के लिए देश के बाहर किसी विदेशी अंडर-18 क्लब में शामिल हो जाना चाहिए। मेरे एक दोस्त ने मुझे एक निजी टूर्नामेंट में खेलने के लिए बुलाया, मैंने सोचा इसमें गलत क्या हो जायेगा। इस टूर्नामेंट ने सबकुछ पलट कर रख दिया। मुझे उस घटना का हर एक पल याद है। मैंने देखा मेरे घुटने दूसरे प्रकार से मुड़े और मैंने तड़क की आवाज सुनी, उसके बाद मैं बेहोश हो गया। जब मैं होश में आया तो मैं हॉस्पिटल में था। मेरे परिवार ने मुझे बताया कि मुझे घुटने के ‘महंगे’ ऑपरेशन की जरूरत है।

    यह सवाल ही नही था कि मैं खेल पाउँगा कि नही। मैंने सिर्फ 'महंगा' शब्द सुना। और मैं सही था। वे मुझे दिन और रात अपने 'मदद पूर्ण' तरीके से यह याद कराते रहतेकि उन्होंने मुझ पर कितना खर्च किया और मैं उन्हें कुछ नही लौटा सकता। धीरे - धीरे मेरी पीड़ा और पीड़ादायक हो गई। मेरा उत्साह खो गया, मेरे दोस्त खो गए, और मेरी नींद खो गई। धीरे-धीरे करके रात बीतने लगी और मेरे जानने के पहले ही मैं अनिद्रा का शिकार हो गया। उसी समय एक सुसाइड हेल्पलाइन शुरू हुई थी, मैं सच में किसी से बात करना चाहता था। मैंने उन्हें बुलाया। धीरे धीरे और लगातार मेरे तनाव को कुछ सुलझाया गया। एक कैरियर के रूप में फुटबॉल संभव नहीं था, लेकिन मुझे एक खेल विश्लेषक के रूप में एक नौकरी मिल गई। मै घर से दूर चला आया, मेरा परिवार बदला नहीं जा सकता था।

    मैं आज भी कुछ रात बिना सोये काटता हूँ पर अब यह पहले से बेहतर है।

  • 28 Dec
    Shiva Raman Pandey

    मेरी पकौड़ा जैसी नाक

    JAB MERA KOI  ANG ACHHA NAHI HOTA

    हम में से बहुत से लोग अपने शरीर को लेकर असंतुष्ट रहते हैं। हम लम्बे, गोरे और पतले होना चाहते हैं। लेकिन तला हुआ नाश्ता करते समय वजन नियंत्रण के बारे में हम सोचना भी नहीं चाहते । वजन नियंत्रण तो फिर भी हम खान -पान में बदलाव कर ठीक कर सकते हैं ,परन्तु जब आप खुद के शरीर के किसी अंग को लेकर चिंतित हों और उसे ठीक करने के लिए किसी भी हद तक जाएँ तब यह चिंता का विषय हो जाता है । ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ ।

    अगर आप मेरे दोस्तों से मिलेंगे और यह पता करें कि उन सबसे मैं सामान्यतः कौन सी बात करता हूँ तो आप पाएंगे कि उन सबसे मैंने अपनी नाक के बारे में उनकी राय पूछी है। "यह सीधी है या मुड़ी हुई है ?","क्या आपको पूरा भरोसा हैं कि यह सीधी है ?"

    मैं नहीं जानता कि कब से नाक के बारे में मेरी इस सनक की शुरुआत हुई। शायद इसकी शुरुआत तब हुई जब मैं किशोर था। मुझे याद है जब मैं छोटा था, मेरे पिताजी कहते थे, कि अगर मैं शोर करूँगा तो वे मेरी नाक पर मारेंगे और इसे टेढ़ा कर देंगे। कहने की आवश्यकता नहीं है कि मैं उनसे इतना डरता था की उनके सामने एक शब्द भी नहीं बोल सकता था।

    शुरू में मैं आईने में बार - बार सिर्फ यही देखता था कि " क्या प्रतिबिम्ब बदल गया है ?"उसके बाद धीरे-धीरे मैंने लोगों से पूछना शुरू किया क्योंकि मुझे इस पर विश्वास नही था कि जो मैं देख रहा हूँ वह सही है। कुछ लोग मुझसे सहमत होते और कुछ असहमत भी होते थे ,यह सब बहुत भ्रामक था।

    एक दिन अपने रूप को लेकर उतावलेपन की हद में मैंने हथौड़े से अपनी नाक को इसके स्थान पर वापस लाने का निर्णय किया। मेरे कमरे का साथी उसी समय वहाँ आया ,जब मैं अपनी नाक को हानि पहुँचाने वाला ही था, और फिर वह मुझे हॉस्टल के इमर्जेंसी रूम में ले गया, कुछ पल के बाद कॉलेज के परामर्शक मुझे देखने आयीं। उन्होंने मुझे बताया कि मुझे ‘बॉडी डिमॉर्फिक डिसऑर्डर'body dysmoprhic disorder है जिसमे यह धारणा होती है कि शरीर का कोई अंग सही नही है।

    धीरे-धीरे, उन्होंने मेरे इस व्यवहार के लिए मुझसे मेरे बचपन में बीते हुए पलों के बारे में पूछा । मेरे पिता का मेरे प्रति व्यवहार कैसा था ? वह शायद इसलिए कि वह जान सकें की कौन से ऐसे कारण है जिनसे मेरी परवरिश प्रभावित हुई थी, और मेरे इस विकार को बढ़ावा मिला था। हमने जो आक्रामकता

    अपने पिता की ओर से महसूस की थी उसे सुलझाया और धीरे- धीरे अपने रूप के बारे में मेरे विचारों से मुक्ति भी पा ली। मैं अभी भी चिकित्सा में हूँ और मेरा उपचार ख़त्म नहीं हुआ है। लेकिन इन दिनों मुझे बहुत अच्छा लगता है।

  • 28 Dec
    Janhavi Dwivedi

    डाउन सिंड्रोम-एक प्रेरणादायक आत्मकथा

    down syndrom

    मुझे डाउन सिंड्रोम है। मैं आप सब की तरह तेजी से बोल और सोच नहीं सकता हूँ , लेकिन मैं आप की तरह चीजों को महसूस कर सकता हूँ।

    जब मैं कुछ अच्छा करता हूँ या मैं मेरे अपनों को खुश देखता हूँ तो मैं भी प्यार और ख़ुशी महसूस करता हूँ।

    मुझे बहुत गर्व होता है, जब मैं ऐसा कुछ हासिल करता हूँ, जो दूसरे सोचते हैं, कि मैं कभी हासिल नहीं कर पाउँगा

    मैं इस उपलब्धि से प्यार करता हूँ, जब मैं स्वयं को आगे बढ़ा सकता हूँ, क्योंकि दूसरों से प्रतिस्पर्धा करना मैंने लम्बे समय से छोड़ दिया है.....

    मैं भी आप की तरह समय समय पर दुःख, कमी और क्रोध का अनुभव करता हूँ।

    मैं दुःख महसूस करता हूँ जब लोग मुझे नाम देकर बुलाते हैं।

    मैं दुःख और क्रोध महसूस करता हूँ, जब मुझे कोई जॉब नही दिया जाता है, और मैं जैसा हूँ उसके लिए शिक्षा प्रणाली में मुझे तंग किया जाता है। यहाँ तक कि मेरे शिक्षक भी कई बार मुझसे अलग तरह का व्यवहार करते हैं।

    मुझे कष्ट और बहुत छोटा महसूस होता था जब मैं ये सोचता था की ऐसा हमेशा मेरे साथ होता रहेगा।

    लेकिन क्या मुझे इन सब के लिए बुरा महसूस करना चाहिए?

    मैं अभी भी भाग्यशाली हूँ क्योंकि बहुत से डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त लोगों को छोड़ दिया जाता है या उनपर उतना ध्यान नहीं दिया जाता है, जो मुझे मिला।

    मेरे माता-पिता मेरी स्थिति को समझते हुए मुझे एक मनोचिकित्सक के पास ले गए,और उन्होंने सच में मुझमें परिवर्तन लाने में बहुत मेहनत की।

    वह एक प्रशिक्षित काउंसलर थे, उन्होंने न सिर्फ मुझे समझाया बल्कि जिन भावनात्मक मुद्दों से मैं गुजर रहा था उसे समझा भी।

     

  • 28 Dec
    Shiva Raman Pandey

    मेरा विश्वास गलत था

    pati ya patni ko ek doosre per sanka nahi kari chahiye

    हम सबके लिए विश्वास बहुत महत्वपूर्ण होता है। हम सभी किसी न किसी में विश्वास रखते हैं जो हमें आगे बढ़ने की शक्ति देता है। कुछ के लिए 'भगवान में विश्वास' महत्वपूर्ण होता है तो कुछ के लिए 'खुद में विश्वास'। लेकिन तब क्या होता है जब आप का विश्वास गलत हो ? जब मेरे बच्चे बड़े हुए और दिन का लम्बा समय वे कॉलेज में बिताते थे, तब मै बहुत ही ज्यादा अकेलापन महसूस करने लगी। धीरे-धीरे मैं अपने रोज के कार्यों को करने की शक्ति खोने लगी और जो कार्य मैं पहले करती थी उनका आनंद नही ले पा रही थी। मेरी इस हालत को देख कर मेरी बेटी अक्सर मुझे सुझाव देती कि मुझे किसी मनोचिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए । उसने मुझे परामर्श के लिए कहा, पर वह मुझ पर दबाव नही डालना चाहती थी,और मैंने 'हाँ नही कहा। जब से हमारी शादी हुई, मेरे पति हमेशा कार्य के सिलसिले में बाहर आया-जाया करते थे । हालाँकि हाल ही में मैंने यह शक करना शुरू किया कि उनके जीवन में कोई दूसरी औरत हो सकती है। अवसादग्रस्त होने के कारण मुझे मेरे विचार सही लग रहे थे। मैं एक सुखी जीवन साथी नहीं रह गई थी।

    मैं इस हद तक आश्वस्त थी कि मैंने नियमित रूप से खाना बंद कर दिया और एक दिन बेहोश हो गई । तब मेरे बच्चे मुझे नागपुर ले गए जहाँ हमारा पारिवारिक घर है और जहाँ पर मेरी बहुत सी सुखद यादें हैं। मेरे पति भी आ गए। हम एक अच्छे क्लिनिक में गए। वहाँ उन्होंने बताया कि मुझे 'डेलूशनल डिसऑर्डर'delusional disorder है। उन्होंने बताया कि अवसाद depression के दिनों में साथी की अनुपस्थिति में यह होना एक सामान्य सी बात है। मेरे पति को इस बात का बहुत पछतावा हुआ और उन्होंने अपने ऑफिस से उन्हें नागपुर में स्थाई पद देने का अनुरोध किया।

    वर्तमान में मैं उनके साथ अपने पुराने पारिवारिक मकान में रह रही हूँ और दवा और चिकित्सा के साथ खुद के झूठे विश्वास कि 'वे मुझसे विश्वासघात कर रहे हैं' से लड़ने में सक्षम हूँ।