कुल 30 कहानियाँ

  • 29 Dec
    Shiva Raman Pandey

    हमने खोया प्यार पाया

    khoya pyar kaise paye

    प्रेम मानव के सबसे खूबसूरत अनुभवों में से एक है। मेरे प्यार की कहानी काफी खास है। वह एक लड़की थी जिससे मैं कॉलेज में मिला। कुछ  हिचकिचाते हुए मैंने उससे दोस्ती का प्रस्ताव रखा। जल्दी ही हम दोस्त बन गए और फिर एक संबंध में बंध गए।

    परिवार और करियर के सामान्य अवरोधों को पार करते हुए लगभग 30 वर्ष की उम्र में हमने शादी कर ली। धीरे -धीरे दैनिक जीवन की एकरसता और काम का दबाव हमारे जीवन में आने लगा।

    नए संबंधों की नवीनता हमारे साथ ज्यादा समय तक नहीं चली, न ही हमारा लक्ष्य  माता-पिता 'बनने का था। इन सब के साथ हम पूर्ण थे और अब भी हम सिर्फ दो ही थे।

    हमने सोचा,क्या है जो गलत है, हमारे पास एक बच्चा होना चाहिए। हमने यही किया ,और हमारे दो बच्चे हुए। कुछ समय के लिए हम इन सबमें व्यस्त हो गए ,लेकिन बाद में यह भी हमारे दिनचर्या का हिस्सा हो गया। यह अजीब था कि हमारे बीच शायद ही कभी लड़ाई हुई हो। हमारे बीच सिर्फ एक दूसरे के प्रति उत्साह और अंतरंगता की कमी हो गयी थी। मैं लालायित  रहता था हमारे जवानी के उन दिनों के लिए जब हम एक दूसरे को देखने के लिए बिलकुल इंतजार नही कर सकते थे।

    अब हमारे पास शायद ही कहने के लिए कुछ था। मैं ऑफिस में दूसरी युवा लड़कियों की तरफ आकर्षित हो रहा था। मेरे पुरुष मित्र मुझसे कहते कि ये एक समान्य बात है,और जब मैं ले सकता हूँ,तो मुझे एक मौका लेना चाहिए। जो मैं चाहता था उसे पाकर मैं दूर जा सकता। लेकिन मैं अपने प्यार में विश्वास करता था और इसे फिर से पाना चाहता था।

    मैं एक काउंसलर के पास गया। उसने मुझे बताया की कैसे एक माँ ,पत्नी और एक ऑफिस जाने वाली की भूमिका निभाते हुए मेरी पत्नी के ऊपर इतना तनाव हो जाता है कि उसके पास मेरे लिए मुश्किल  से कोई ऊर्जा बचती है।

    मैं अचम्भित था। कब मैं दूसरे ठेठ आदमियों की तरह बन गया? मैंने चीज़ों को बेहतर बनाने का संकल्प लिया। मैंने घर पर भाग लेना शुरू किया और बच्चों के पालन -पोषण में भी बराबर का भाग  लेने लगा।

    मैं अपनी पत्नी को काउंसलर के पास ले गया। और हमारे बीच बेहतर संवाद के लिए हम दोनों थेरेपी लेने लगे। अब सब कुछ पहले से बेहतर था लेकिन अब भी एक चीज़ की कमी थी -उत्साह की। हमने निर्णय किया कि यात्रा करने का सपना है जो हमे फिर से एक कर देगा।

    हमने एक बजट योजना बनाई और एक के बाद एक स्थलों को चुनते गए। पहले इंडियन स्थानों को फिर विदेशी स्थानों की। इन सब में कुछ यात्राओं पर हम बच्चों को भी ले गए और बाकी यात्राओं में सिर्फ हम दोनों ही थे। और इस प्रकार हमारे बीच प्यार फिर से जाग गया।

  • 29 Dec
    Shiva Raman Pandey

    दोस्त हमेशा अच्छे नहीं होते

    achhe dost ko pahchane

    मैं कॉलेज में  एक उज्ज्वल छात्र था। मैं ज्ञान की वास्तविक प्यास के साथ ज्यादा से ज्यादा लेक्चर्स  और  सेमीनार में उपस्थित रहता था। मेरे मन में एक घबराहट सी बनी रहती थी।

    इससे कोई फर्क नही पड़ता था की मैं कितना जानता हूं और मैंने कितनी कोशिश की। परीक्षा के समय मेरा दिमाग खाली हो जाता था। और फिर से मैं खराब रिजल्ट के साथ खड़ा रहता था।

    एक लड़का मेरे बगल में आकर खड़ा हुआ ,वह बोला कि उसे भी याद करने में परेशानी होती थी, और  किसी  ने उसे बताया कि यह सब दिमाग कि उस चिंता की वजह से होता है जो उसकी सीखी हुई चीज़ो को याद करने में परेशानी देती हैं, और फिर उसे एक दवा दी गई जो उसे शांत रखती है,जिससे वह अच्छी तरह से याद कर सके।

    मैं काफी हैरान था ! मेरी सभी समस्याओं का समाधान एक गोली है? मैं अगले दिन उसके घर गया ,वहाँ एक प्रकार की पार्टी चल रही थी। मैंने उससे पूछा कि या तो वह मुझे गोली दे या कम से कम उसका नाम लिख कर दे।

    वे सब मेरा मजाक बनाने लगे और मुझ पर हँसने लगे ,और मुझे पाउडर के जैसी कोई चीज दी गई, मैं तब इसे नही जानता था। लेकिन उन सब ने मुझे एक शक्तिशाली ड्रग के चंगुल में फंसा दिया था।

    दिन बीतने के साथ मुझे ड्रग्स की चाह बढ़ती गई ,पढ़ाई में मेरा प्रदर्शन काफी खराब होता गया और ड्रग्स की लत के कारण मैं घर से चोरी करने लगा।

    मैं भयभीत रहने लगा कि ये मैं क्या कर रहा हूँ? मैं इस अपराधबोध को कम करने के लिए और ज्यादा ड्रग्स लेने लगा, यह एक दुष्चक्र था और मैं इसमें फंसने लगा।

    एक दिन इन सबसे थक कर मैंने स्वयं को खत्म करना चाहा, उसी समय मेरी माँ वहां आ गई,उन्होंने दौड़कर मुझे गले लगा लिया और समझाया की हम मिलकर इसका हल निकालेगें। मुझे पुनर्वास केंद्र में भेजा गया।

    वहाँ का उपचार गतिविधियों पर आधारित रहता था और दवाइयाँ कम दी जाती थीं। मुझे एक अच्छे काउंसलर मिले जिन्होंने मेरी परेशानी को समझा और मुझे बताया कि मेरी मुख्य समस्या आत्मविश्वास की कमी और घबराहट है।

    हमने एक साथ इस पर काम किया और अब मैं ज्यादा बेहतर हूँ ।

  • 29 Dec
    Shiva Raman Pandey

    मुझे आईने से नफरत थी

    MUJHE aaine se naftrat hai

    मैं इन सभी लड़कियों को देखती कि जब वे तैयार हो जाती हैं तो खुद को ख़ुशी से आईने में निहारतीं हैं। मुझे उन सब से ईर्ष्या होती है। मेरी ये इच्छा होती है कि मैं भी खुद का सामना इसी प्रकार कर सकूं। लेकिन सच्चाई ये है कि मैं आईने से नफरत करती हूँ। मुझे इससे डर लगता है कि ये मुझे क्या दिखा सकता है। क्या ये मुझे एक फूली हुई गुड़िया के रूप में दिखायेगा,या एक झुर्रियों वाली बूढी स्त्री के रूप में दिखायेगा?

    मुझे ऐसा लगता था कि मैं मुरझा रही हूँ फिर भी मैं खुद को खाने के पास नहीं ला पाती थी। मुझे ऐसा लगता था की खाने का हर निवाला मेरे शरीर में कई परतें जोड़ देगा। मैंने ज्यादा से ज्यादा ढीले कपड़े पहनना शुरू कर दिया। मैंने बाहर जाना कम कर दिया। मैंने खुद को अपने कमरे में बंद कर लिया। मेरे माता-पिता चिंतित थे लेकिन क्या करना है ये नही जानते थे। वे सोचते थे की ये सिर्फ किशोरावस्था में बुरे ब्रेक -अप के बाद उत्पन्न मनोस्थिति है। ऐसा सिर्फ वे ही जानते थे।

     मैंने खुद को खरोंचना शुरू कर दिया। इससे जो दर्द होता वह मुझे मेरे शरीर के बारे में सोचने से रोक देता था। मुझे मेरे शरीर से नफरत थी। अगर यह इतना डरावना है तो अगर कुछ खरोंचे लग जायेंगे तो क्या फर्क पड़ेगा। एक दिन मेरी माँ मेरे कमरे में आई जब मैं यह काम कर रही थी, ये देख कर उन्हें जो आघात लगा वह अकल्पनीय था। मैं ये कह सकती हूँ , कि वो सच में डर गई थीं । एक डॉक्टर आये और उन्होंने मुझे हॉस्पिटल में भर्ती करने को कहा।

    वे मुझे खाने को कहते थे क्योंकि मैं जरूरी पोषक तत्व खोती जा रही थी। मैं खाने का विरोध करती थी क्योंकि मैं वजन नहीं बढ़ाना चाहती थी। तब उन्होंने एक मनोचिकित्सक को मेरे पास भेजा। पहले मैं संशय में थी लेकिन जब मैंने उनसे बात की तो मुझे ये महसूस हुआ कि वे जानती हैं कि मैं किस दौर से गुजर रही हूँ। हमने एक साथ बहुत से कलात्मक कार्य किये, और उन्होंने मुझे बताया की वे मेरे जैसी दूसरी लड़कियों के साथ काम कर चुकी हैं और अब वे कभी आईने से नही डरती हैं।

    धीरे -धीरे मैं अपने शरीर के साथ सहज होने लगी। धीमे -धीमे मैं कुछ समय के लिए बाहर जाने लगी। मैंने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू कर दी। मैंने स्वयं को फिर कभी कमरे में नही छुपाया। आज पूरे दो साल हो गये हैं,जब मुझे हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। आज दिवाली है और मैं तैयार होकर स्वयं को आईने में निहार रही हूँ।अब मैं कभी आईने से नफरत नही करती।

     

  • 28 Dec
    Shiva Raman Pandey

    वो रातें बीत गई

    VO BEETI RATEN

    सारी रात जागे रहना कहीं से भी रोमांटिक नहीं होता है। अगर आप सो सकते हैं तो आपको सो जाना चाहिए। नींद को खोने का कोई फायदा नही जब आपके पास न तो : एक रोमांटिक साथी,न कोई जॉब , कुछ न हो। पूछो किसी से जो सोना चाहता है पर सो नही सकता। मुझे नही याद है मैं पिछले दिनों कब शांतिपूर्वक सोया। मैं एक फुटबॉल का खिलाडी था, लेकिन जो इस देश के लिए कुछ नही कर पाया।

    मैं उस समय बहुत छोटा था यह समझने के लिए कि मुझे खेल में असली मौका पाने के लिए देश के बाहर किसी विदेशी अंडर-18 क्लब में शामिल हो जाना चाहिए। मेरे एक दोस्त ने मुझे एक निजी टूर्नामेंट में खेलने के लिए बुलाया, मैंने सोचा इसमें गलत क्या हो जायेगा। इस टूर्नामेंट ने सबकुछ पलट कर रख दिया। मुझे उस घटना का हर एक पल याद है। मैंने देखा मेरे घुटने दूसरे प्रकार से मुड़े और मैंने तड़क की आवाज सुनी, उसके बाद मैं बेहोश हो गया। जब मैं होश में आया तो मैं हॉस्पिटल में था। मेरे परिवार ने मुझे बताया कि मुझे घुटने के ‘महंगे’ ऑपरेशन की जरूरत है।

    यह सवाल ही नही था कि मैं खेल पाउँगा कि नही। मैंने सिर्फ 'महंगा' शब्द सुना। और मैं सही था। वे मुझे दिन और रात अपने 'मदद पूर्ण' तरीके से यह याद कराते रहतेकि उन्होंने मुझ पर कितना खर्च किया और मैं उन्हें कुछ नही लौटा सकता। धीरे - धीरे मेरी पीड़ा और पीड़ादायक हो गई। मेरा उत्साह खो गया, मेरे दोस्त खो गए, और मेरी नींद खो गई। धीरे-धीरे करके रात बीतने लगी और मेरे जानने के पहले ही मैं अनिद्रा का शिकार हो गया। उसी समय एक सुसाइड हेल्पलाइन शुरू हुई थी, मैं सच में किसी से बात करना चाहता था। मैंने उन्हें बुलाया। धीरे धीरे और लगातार मेरे तनाव को कुछ सुलझाया गया। एक कैरियर के रूप में फुटबॉल संभव नहीं था, लेकिन मुझे एक खेल विश्लेषक के रूप में एक नौकरी मिल गई। मै घर से दूर चला आया, मेरा परिवार बदला नहीं जा सकता था।

    मैं आज भी कुछ रात बिना सोये काटता हूँ पर अब यह पहले से बेहतर है।

  • 28 Dec
    Shiva Raman Pandey

    मेरी पकौड़ा जैसी नाक

    JAB MERA KOI  ANG ACHHA NAHI HOTA

    हम में से बहुत से लोग अपने शरीर को लेकर असंतुष्ट रहते हैं। हम लम्बे, गोरे और पतले होना चाहते हैं। लेकिन तला हुआ नाश्ता करते समय वजन नियंत्रण के बारे में हम सोचना भी नहीं चाहते । वजन नियंत्रण तो फिर भी हम खान -पान में बदलाव कर ठीक कर सकते हैं ,परन्तु जब आप खुद के शरीर के किसी अंग को लेकर चिंतित हों और उसे ठीक करने के लिए किसी भी हद तक जाएँ तब यह चिंता का विषय हो जाता है । ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ ।

    अगर आप मेरे दोस्तों से मिलेंगे और यह पता करें कि उन सबसे मैं सामान्यतः कौन सी बात करता हूँ तो आप पाएंगे कि उन सबसे मैंने अपनी नाक के बारे में उनकी राय पूछी है। "यह सीधी है या मुड़ी हुई है ?","क्या आपको पूरा भरोसा हैं कि यह सीधी है ?"

    मैं नहीं जानता कि कब से नाक के बारे में मेरी इस सनक की शुरुआत हुई। शायद इसकी शुरुआत तब हुई जब मैं किशोर था। मुझे याद है जब मैं छोटा था, मेरे पिताजी कहते थे, कि अगर मैं शोर करूँगा तो वे मेरी नाक पर मारेंगे और इसे टेढ़ा कर देंगे। कहने की आवश्यकता नहीं है कि मैं उनसे इतना डरता था की उनके सामने एक शब्द भी नहीं बोल सकता था।

    शुरू में मैं आईने में बार - बार सिर्फ यही देखता था कि " क्या प्रतिबिम्ब बदल गया है ?"उसके बाद धीरे-धीरे मैंने लोगों से पूछना शुरू किया क्योंकि मुझे इस पर विश्वास नही था कि जो मैं देख रहा हूँ वह सही है। कुछ लोग मुझसे सहमत होते और कुछ असहमत भी होते थे ,यह सब बहुत भ्रामक था।

    एक दिन अपने रूप को लेकर उतावलेपन की हद में मैंने हथौड़े से अपनी नाक को इसके स्थान पर वापस लाने का निर्णय किया। मेरे कमरे का साथी उसी समय वहाँ आया ,जब मैं अपनी नाक को हानि पहुँचाने वाला ही था, और फिर वह मुझे हॉस्टल के इमर्जेंसी रूम में ले गया, कुछ पल के बाद कॉलेज के परामर्शक मुझे देखने आयीं। उन्होंने मुझे बताया कि मुझे ‘बॉडी डिमॉर्फिक डिसऑर्डर'body dysmoprhic disorder है जिसमे यह धारणा होती है कि शरीर का कोई अंग सही नही है।

    धीरे-धीरे, उन्होंने मेरे इस व्यवहार के लिए मुझसे मेरे बचपन में बीते हुए पलों के बारे में पूछा । मेरे पिता का मेरे प्रति व्यवहार कैसा था ? वह शायद इसलिए कि वह जान सकें की कौन से ऐसे कारण है जिनसे मेरी परवरिश प्रभावित हुई थी, और मेरे इस विकार को बढ़ावा मिला था। हमने जो आक्रामकता

    अपने पिता की ओर से महसूस की थी उसे सुलझाया और धीरे- धीरे अपने रूप के बारे में मेरे विचारों से मुक्ति भी पा ली। मैं अभी भी चिकित्सा में हूँ और मेरा उपचार ख़त्म नहीं हुआ है। लेकिन इन दिनों मुझे बहुत अच्छा लगता है।